Difference between revisions of "Letter written on 10 Jul 1961 om"

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written in the early afternoon of 10th July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
 
This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written in the early afternoon of 10th July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
  
 
Osho's salutation in this letter is once again "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, which had been normal before "पूज्य मां", Pujya Maan, took over for a few months. It has a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (6) in a circle in the top right corner and a pale blue figure of unknown significance.  
 
Osho's salutation in this letter is once again "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, which had been normal before "पूज्य मां", Pujya Maan, took over for a few months. It has a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (6) in a circle in the top right corner and a pale blue figure of unknown significance.  
  
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प्रणाम। कल रात्रि देर तक कोयल बोलती रही। ताड़ोबा की रात याद होआई। सुनता रहा। सुनता रहा। कुहु – कुहु – कुहु – कुहुउउ....... भूल गया कि कहां हूँ। चांद नहीं था पर होआया – आप नहीं थी...... पर एक क्षण को स्वप्न में नहीं – सच में होआईं थीं। ताड़ोबा स्मृति पर लौट आगया था। हम फिर उस चांद भरी रात में घूमे। वृक्षों की छायाओं में विश्राम भवन के चारों ओर निर्जन-निस्तब्धता को जोड़ते घूमते ही गये – घूमते ही गए। झील सोगई थी और तारे तक सोने को होआये थे तब हम सोये थे।
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कितनी मीठी-सुरभि सी स्मृति मन पर गुंजती रह जाती है? गीत चले जाते हैं ध्वनियां रह जाती हैं – फूल झर जाते हैं बास डोलती रह जाती है। इस सारी सुगंध को बटोर लेना ही जीवन है। कांटें हों तो हों – उन्हें पागल बीनते हैं। फूल चुनलें – फूलों की सुवास चुनलें फिर सब सुन्दर और आनंदमय होआता है।
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प्रभु ने बहुत आनंद और बहुत संगीत कण-कण में भरा है। दृष्टि हो तो दीख आता है। मौन होजायें तो सुन पड़ता है। हमारी बधिरता और अंधापन ही दुख है।
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मैं स्वस्थ हूँ। सबको मेरे विनम्र प्रणाम।
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Revision as of 11:27, 15 February 2020

This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parekh. It was written in the early afternoon of 10th July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is once again "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, which had been normal before "पूज्य मां", Pujya Maan, took over for a few months. It has a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (6) in a circle in the top right corner and a pale blue figure of unknown significance.

Letters to Anandmayee 824.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

दोपहर:
१० जुलाई ‘६१

प्रिय मां,
प्रणाम। कल रात्रि देर तक कोयल बोलती रही। ताड़ोबा की रात याद होआई। सुनता रहा। सुनता रहा। कुहु – कुहु – कुहु – कुहुउउ....... भूल गया कि कहां हूँ। चांद नहीं था पर होआया – आप नहीं थी...... पर एक क्षण को स्वप्न में नहीं – सच में होआईं थीं। ताड़ोबा स्मृति पर लौट आगया था। हम फिर उस चांद भरी रात में घूमे। वृक्षों की छायाओं में विश्राम भवन के चारों ओर निर्जन-निस्तब्धता को जोड़ते घूमते ही गये – घूमते ही गए। झील सोगई थी और तारे तक सोने को होआये थे तब हम सोये थे।

कितनी मीठी-सुरभि सी स्मृति मन पर गुंजती रह जाती है? गीत चले जाते हैं ध्वनियां रह जाती हैं – फूल झर जाते हैं बास डोलती रह जाती है। इस सारी सुगंध को बटोर लेना ही जीवन है। कांटें हों तो हों – उन्हें पागल बीनते हैं। फूल चुनलें – फूलों की सुवास चुनलें फिर सब सुन्दर और आनंदमय होआता है।

प्रभु ने बहुत आनंद और बहुत संगीत कण-कण में भरा है। दृष्टि हो तो दीख आता है। मौन होजायें तो सुन पड़ता है। हमारी बधिरता और अंधापन ही दुख है।

मैं स्वस्थ हूँ। सबको मेरे विनम्र प्रणाम।

रजनीश
के
प्रणाम


See also
(?) - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.