Letter written on 12 Apr 1963 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 12th April 1963 in the afternoon. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. A few of the hand-written marks seen in other letters can be found, a black tick mark and a faint, nearly readable mirror-image number in the bottom right corner which could be 180. In addition, there is a mark that has appeared fairly often in this context, a red tick mark, but on this occasion it is complicated by a red "X" overlapping. This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 42 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 214, running to two pages.

The PS reads: "Received your letter after return from Indore, I won't be able to come in this month. Ask my forgiveness also from Parakh Ji : it is not possible to go to Rajasthan also, now. Would come in May only after holidays. Rest OK. Pranam to all. I am in bliss." As noted at Letter written on 2 Mar 1963 am in the PS - in line with Osho's suggestion - it seems that in the letter received from Ma, Parakh Ji might have asked to visit Guruji Shree Madukar Ji at Beawar in Rajasthan - along with him in April itself - but Osho would go in May only after the holidays.

आचार्य रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय ११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

दोपहर :
१२ अप्रेल १९६३

प्रिय मां,

जीवन साधना में बीज क्या है और फलित क्या है यह जानना अत्यंत अपरिहार्य है। प्रारंभ और परिणाम को पहचानना जरूरी है। कार्य और कारण को न जाने हुए जो चलता है वह भूल करता है। चलना ही केवल पर्याप्त नहीं है। अकेले चलने से ही कोई कहीं नहीं पहुँचता है। दिशा और साधना-विधि का सम्यक्‌ होना जरूरी है।

साधना में केंद्रीय भी कुछ है; कुछ परिधिगत भी है। केंद्र पर प्रयास हो तो परिधि अपने से सम्हल जाती है। उसे प्रथक सम्हालने का कारण नहीं है। वह केन्द्र की ही अभिव्यक्ति है। वह फैला हुआ केन्द्र ही है। इससे परिधि पर प्रयास व्यर्थ होते हैं। अंग्रेजी में कहावत हैः ‘झाड़ी के आसपास पीटना।’ परिधि पर उलझना ऐसा ही है।

क्या है केन्द्र? क्या है परिधि?

ज्ञान केंद्र है : शील परिधि है। ज्ञान प्रारंभ है : शील परिणाम है। ज्ञान बीज है : शील फलित है। पर साधारणतः लोगों का चलना विपरीत है। शील से चलकर वे ज्ञान पर पहुँचना चाहते हैं। शील को वे ज्ञान में परिणित करना चाहते हैं।

पर शील अज्ञान में पैदा नहीं किया जासकता। शील पैदा ही नहीं किया जासकता है। पैदा किया हुआ शील शील नहीं है। वह मिथ्या आवरण है जिसके तले कुशील दब जाता है। चेष्ठित शील आत्म वंचना है। अंधेरे को दबाना-छिपाना नहीं है। उसे मिटाना है। कुशील पर शील के कागजी फूल नहीं चिपकाने हैं। उसे मिटाना है। जब वह नहीं है, तब जो आता है वह शील है। अज्ञान में जोर जबरदस्ती लाया गया शील घातक है क्योंकि उसमें जो नहीं है वह ज्ञात होता है कि है। और इस भांति जिसे लाना है उसका आंख से ओझल होजाना होजाता है।

अज्ञान में सीधे शील लाने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि अज्ञान की अभिव्यक्ति ही कुशील है। कुशीलता अज्ञान ही है। किसी बुद्ध ने कहा हैः ‘अण्णाणी किं काही?’ (जो अज्ञान में है वह क्या कर सकता है।)

शील नहीं, ज्ञान लाना है। ज्ञान ही शील बन जाता है।

आगम कहते है :

‘नाणस्स सव्वस्स पगासणाए, अण्णाण मोहस्स विवञ्जणाए
रागस्स दोसस्स य संखसणं, एगंतसोक्खं समुवेई मोक्खं।।’

(ज्ञान सर्व को प्रकाशित करता है। उसके उदय से ही अज्ञान और मोह का नाश होता है। उससे ही राग और द्वेष का क्षय होता है। उससे ही मुक्त दशा उपलब्ध होती है।‌)

ज्ञान केन्द्र है उसके आने से शेष सब अपने आप आजाता है। और ज्ञान का अर्थ पर विचार संग्रह नहीं है। ज्ञान का अर्थ पांडित्य नहीं, प्रज्ञा है। ज्ञान का अर्थ आत्म ज्ञान है। मैं जिस क्षण शांत और शून्य हूँ उस क्षण वह ‘जो है’ प्रगट होजाता है। जो शून्यता में भीतर से आता है वही ज्ञान है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: आपका पत्र इंदौर से लौटकर मिला। मैं इस माह तो नहीं आसकूँगा। पारख जी से भी क्षमा मांगलें : राजस्थन जाना भी अभी संभव नहीं है। छुट्टियों के बाद मई में ही आऊँगा। शेष शुभ। सबको प्रणाम। मैं आनंद में हूँ।

Letters to Anandmayee 886.jpg


See also
Krantibeej ~ 042 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.