Letter written on 12 Aug 1961

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 12th August 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is just plain "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (15) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a possible mirror-image pale blue "40".

Letters to Anandmayee 837.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

१२ अगस्त ‘६१

मां,
दोपहर। धूप तीखी होआई है। बर्षा के बाद सूरज कैसा क्रोध में तपता है! वृक्षों के तले थोड़ी छाया है : बड़ी सुखद और कभी कभी हवा के लहराते ठंडे झोके भी आते हैं।

एक सन्यासी साथ हैं। शरीर को उन्होंने तपाया है : हड्डियां ही भर रह गई हैं। संपत्ति, सुरक्षा सब का त्याग किया है। ईश्वर को पाना चाहा था पर वह नहीं मिला है।

ईश्वर को पाने में संपत्ति-परिवार-गृह बाधा नहीं हैं। बाधा और ही है। इससे सब छोड़ो पर वह नहीं मिलता है। उसे पाने में रुकावट है : ‘मैं’ का बोध। “मैं हूँ” तबतक ईश्वर नहीं हो सकता है। “मैं करोड़पति हूँ” इससे जितनी रुकावट है, “मैं त्यागी हूँ” या “मैं ज्ञानी हूँ” इनमें भी उससे कम नहीं है।

‘मैं’ सिमित करता है और विराट से विच्छिन्न कर देता है। दुख की गांठ, अज्ञान की ग्रंथि वही है। उसके जाते ही प्रभु नहीं मिलता वरन् हम स्वयं ही हो जाते हैं।

‘मैं’ को छोड़ देना आस्तिकता है : ‘मैं’ को त्याग देना ही सन्यास है।

रजनीश
के
प्रणाम


See also
Letters to Anandmayee ~ 12 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.