Letter written on 12 Jan 1963 am

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Letterhead reads (in Devanagari):

Acharya Rajneesh [larger and messier and to the right of and above the rest below]
Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

It was written in the morning of 12th January 1963 and signed with "Rajneesh ke pranaam". It is not known to have been previously published. The recipient's name is Manubhai Desai. The wiki has images of two other letters written to him at Letter written on 26 May 1963 (Manubhai) and Letter written on 23 May 1964, the latter being typed rather than handwritten.

(मनु भाई)

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महा कोशल कला महाविद्दालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म० प्र०)

प्रिय मनुभाई,
स्नेह। आपका पत्र पाकर आनंद हुआ है। मैं तो प्रतीक्षा में ही था। आत्मिक जीवन के प्रति आपका झुकाव है तो उसतक पहुंचना कठिन भी नहीं है। वह तो श्वांस लेने जैसा ही आसान है। भागवत चैतन्य निरंतर हमारे निकट है। हम उसमें ही हैं। एक क्षण को भी कोई उससे विमुक्त नहीं है। और कुछ भी करके हम उससे दूर नहीं होसकते हैं ; कारण ; वह हमारा स्वाभाव है -- स्वरूप है। इससे उसे पाना नहीं है। वह तो उपलब्ध ही है। केवल, उसके प्रति आंख खोलनी है। केवल शांत और मौन होना है ताकि 'जो है,' वह प्रगट होसके -- मेरे शांत होते ही वह उद्--घटित होजाता है। अशांति ही फासला है ; शांत होते मैं उसमें ही हूँ।

इस शांति को ही केन्द्र मानकर चलना है। यही व्दार है। यही मार्ग है। ध्यान के लिए जो मेरा आग्रह है वह इसके लिए ही है। ध्यान का अर्थ है विचार -- विसर्जन का प्रयोग। विचार-विसर्जित होते ही शांति का व्दार खुलता है और हम जो हैं उसमे पहुंचना होजाता है। इस प्रयोग को करते चलें। धीरे धीरे विचार -मुक्ति आती है। शांति आती है और शून्य आता है। और फिर जो घटित होता है वह शब्द में नहीं बंधता है। उसे पालेना सबकुछ पालेना है।

मेरे सब प्रियजनों को मेरे प्रणाम कहना। धीरू भाई,बाड़ीलाल भाई,रतिलाल भाई, मणिभाई, कन्हैयालालभाई और सबको। जिनके नाम मुझे स्मरण नहीं हैं उनको भी। आप सबका प्रेम स्मरण आताहै और दो दिन में ही नंदुरबार भी मेरा एक घर बन गया है।

प्रभातः
१२ जनवरी १९६३

रजनीश के प्रणाम

Letter-12-Jan-1963.jpg
Partial translation
"Dear Manu Bhai,
Love - I am happy to receive your letter.
...
I am remembering you all with love and only in two days, Nandurbar has also become one home for me."
(Note: It seems that Osho is referring to his visit to Nandurbar from 23-25 December 1962 as per tour / event plan written to Ma AM: Letter written on 12 Dec 1962.)
See also
Letters to Manubhai Desai ~ 01 - The event of this letter.