Letter written on 12 Mar 1963 pm

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 12th March 1963 in the evening. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. Regarding hand-written marks, the letter has both black and red tick marks and there also appears to be a faint mirror-image number in the bottom right corner, but it is barely visible, never mind readable. This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 59 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 207.

The PS reads: "I am very much engaged - that's why getting late for the letters. From morning till evening people keep surrounding."

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

प्रिय मां,

मैं कल कहा हूँ :

सत्य को जानन चाहते हो तो विचार मत करो। शास्त्र और शब्द व्यर्थ हैं। उस भांति सत्य के संबंध में जाना जासकता है लेकिन सत्य को जानने का वह मार्ग नहीं है।

शब्द से सत्ता नहीं आती है। सत्ता का द्वार शून्य है।

शब्द से निःशब्द में छलांग लगाने का साहस ही धार्मिकता है।

विचार पर को जानने का उपाय है। वह स्व को नहीं देता है। स्व उसके पीछे भी जो है। स्व सबके पूर्व है। स्व से हम सत्ता में संयुक्त होते हैं। विचार भी पर है। वह भी जब नहीं है तब ‘जो है’ वह होता है। उसके पूर्व मैं ‘अहं’ हूँ : और उसमें ‘ब्रह्मं’ हूँ।

सत्य में – सत्ता में स्व-पर मिट जाता है। वह भेद भी विचार में और विचार का ही था।

चेतना के तीन रूप हैं : (१) वाह्‌य-मूर्च्छित – अंतर्‌ मूर्च्छित। (२) वाह्‌य-जाग्रत – अंतर-र्मूर्च्छित। और (३) वाह्‌य-जाग्रत- अंतर जाग्रत। पहला रूप मूर्च्छा – अचेतना का है। वह जड़ता है। वह विचार-पूर्व स्थिति है। दूसरा रूप अर्ध मूर्च्छा – अर्ध चेतना का है। वह जड़ और चेतन के बीच है। वह विचार की स्थिति है। तीसरा रूप अमूर्च्छा – पूर्ण चेतना का है। वह पूर्ण चैतन्य है और विचारातीत है।

सत्य को जानने के लिए केवल विचाराभाव ही नहीं पाना है। वह तो जड़ता में, मूर्च्छा में जाना है। धर्म के नाम से प्रचलित बहुत सी क्रियायें मूर्च्छा में ही लेजाती हैं। शराब, सेक्स और संगीत भी मूर्च्छा में ही लेजाते हैं। मूर्च्छा में पलायन है। वह उपलब्धि नहीं है।

सत्य को पाने को विचार-शून्यता + चैतन्य पाना होता है। उस स्थिति का नाम ही समाधि है।

रात्रि
१२ मार्च १९६३

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: मैं बहुत व्यस्त हूँ इसलिए पत्रों में देरी होरही है। सुबह से सांझ तक लोग घेरे हूए हैं।

Letters to Anandmayee 879.jpg


See also
Krantibeej ~ 059 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.