Letter written on 14 Sep 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 14th September 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the top right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (130) and replaced by a pink number, 132.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 113 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition), on p 156.

In PS Osho writes: "Your letter is received. How much I am wishing to come! But there is a problem of leaves. Today even I got the ticket cancelled after getting the same. Send letters regularly until the health is not well - with that only 'will be persuading the mind!"

Letters to Anandmayee 925.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
एक कहानी पढ़ता था :
एक विश्रामालय में दो व्यक्ति आराम कुर्सियों पर बैठे हुए थे। एक युवा था, एक वृद्ध। जो वृद्ध था, वह आंखें बंद किये था पर बीच बीच में मुस्कुरा उठता था। और कभी कभी हाथ से और चेहरे से ऐसा इशारा करता था जैसे कुछ हटा रहा है। युवक से बिना पूछे न रहा गया था। वृद्ध ने एक बार आंखें खोलीं तो उसने पूछ ही लिया : ‘इस अत्यंत कुरूप विश्राम गृह में ऐसा क्या है जो आपको मुस्कुराहट ला देता है?’ वृद्ध बोला : “मैं अपने से कुछ कहानियां कह रहा हूँ : उनमें ही हंसी आ जाती है।” उस युवक ने पूछा : ‘और हाथ से हटाते क्या हैं?’ वृद्ध हंसने लगा : बोला : “उन कहानियों को जिन्हें बहुत बार सुन चुका हूँ!”

युवक ने कहा : “आप भी क्या कहानियों से मन समझा रहे हैं?” वृद्ध इसे सुन बहुत जोर से हंसने लगा। बोला : “एक दिन समझोगे कि पूरा जीवन ही कहानियों से अपने को समझा लेने का नाम है!”

निश्चित ही एक दिन ज्ञात होता है कि जिसे जीवन समझा था वह एक सपना था।

कल यही एक जगह कहा हूँ। इस कथा से, इस स्वप्न से, जाग जाना मुक्ति है।

१४.९.६२

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: आपका पत्र मिला है। कितना आने को मन कर रहा है! पर छुट्टियों की असुविधा है। आज तो टिकिट भी बुलाकर वापिस कर दिया है। स्वास्थ्य जबतक ठीक नहीं है, तबतक नियमित पत्र देती रहें : उससे ही मन समझा लूँगा!


See also
Krantibeej ~ 113 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.