Letter written on 15 Dec 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 15th December 1962 from Chhatarpur (MP). Osho reminds Ma of the tour program referring to the previous letter, Letter written on 12 Dec 1962 and insists to accompany him to Bombay and Nandurbar.

The letterhead reads (in Devanagari):

Acharya Rajneesh [in a large, messy font to the right of and above the rest below]
Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: black and red tick marks and a mirror-image number in the bottom right corner, actually two numbers, one unreadable and crossed out, the other 157.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 77 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 184).

The PS reads: "After speaking at Satna, have come here in the morning. You have to come to Bombay and Nandurbar with me - in this regard my letter must have been received. Only this concern is there in the mind that how your health is now? Send letter and meet me at Bhusawal at 5 o'clock in the morning on 23. Convey my humble pranam to all. Love to Sharda."

Letters to Anandmayee 951.jpg

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

छतरपुर
१५.१२.६२

प्रिय मां,
एक युवक ने कल रात्रि पूछा था : ‘मैं अपने मन से लड़ रहा हूँ पर शांति उपलब्ध नहीं होती है। मैं क्या करूँ मन के साथ कि शांति पासकूँ?’

मैंने कहा : “अंधेरे के साथ कोई भी कुछ नहीं कर सकता है। वह है ही नहीं। वह केवल प्रकाश का न होना है। इसलिए, उससे लड़ना अज्ञान है। ऐसा ही मन है : वह भी नहीं है। उसकी भी कोई स्व-सत्ता नहीं है। वह आत्म-बोध का अभाव है : ध्यान का अभाव है। इसलिए उसके साथ भी कुछ नहीं किया जासकता। अंधेरा हटाना हो तो प्रकाश लाना होताहै और मन को हटाना हो तो ध्यान लाना होता है। मन को नियंत्रित नहीं करना है वरन्‌ जानना है कि वह है ही नहीं। यह जानते ही उससे मुक्ति होजाती है।“

उसने पूछा : ‘यह जानना कैसे हो?’

“यह जानना साक्षी-चैतन्य से होता है। मन के साक्षी बनें। जो है उसके साक्षी बनें। कैसा होना चाहिए इसकी चिन्ता छोड़ दें। जो है – जैसा है उसके प्रति जागें – जागरूक हों। कोई निर्णय न लें – कोई नियंत्रण न करें –कोई संघर्ष में न पड़ें। बस, मौन होकर देखें। देखना ही – यह साक्षी होना ही मुक्ति बन जाताहै। साक्षी बनते ही चेतना दृश्य को छोड़ दृष्टा पर स्थिर होजाती है। इस स्थिति में अकम्प प्रज्ञा की ज्योति उपलब्ध होती है और यही ज्योति मुक्ति है।“

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: मैं कल रात्रि सतना बोलकर, सुबह यहां आया हूँ। बम्बई और नंदुरबार मेरे साथ चलना है – इस आशय का मेरा पत्र तो मिल ही गया होगा। यही चिन्ता मन में है कि पता नहीं आपका स्वास्थ्य अब कैसा है? पत्र दें और भुसावल २३ तारीख को सुबह ५ बजे मुझें मिलें। सबको मेरे विनम्र प्रणाम कहें। शारदा को स्नेह।


See also
Krantibeej ~ 077 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.