Letter written on 16 Dec 1970 (YPrem)

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Osho wrote many letters in Hindi to Ma Yoga Prem which were published in various letter collections. This one is dated 16th December 1970 and was published in Antarveena (अंतर्वीणा) as letter #48.

The letterhead is a typical one from the relatively short Churchgate period, similar in design to the long-time Kamala Nehru Nagar letterhead used before Osho moved from Jabalpur to Mumbai. It has a simple all-lower-case "acharya rajneesh" and a two-colour Jeevan Jagriti Kendra logo. His address is in a third colour, a pale blue, and all-caps. The whole letter is written in black ink.

acharya rajneesh

27 C C I CHAMBERS CHURCHGATE BOMBAY-20 PHONE 293782

प्रिय योग प्रेम,
प्रेम। हवा के झोंकों में कंपती दिये की ज्योति की भांति है मन।

कंपेगा।

दुविधा में पड़ेगा।

खंड-खंड होता रहेगा।

तू इसके पार हो।

उससे दूर हो।

उससे ऊपर उठ।

उसे पीछे छोड़--नीचे छोड़।

तू मन नहीं है।

तू तो वही है जो कि मन को भी जानता है।

उसके कम्पनों को जानता है।

उसकी दुविधाओं को जानता है।

इस जानने (Knowing) में ही ठहर।

इस दृष्टा भाव में ही रमण कर।

तू तो यह साक्षी (witness) ही बन।

और फिर इस अतिक्रमण से मन शांत होजाता है।

एैसे ही जैसे हवा के झोंके बंद होगये हों तो दिये की लौ नहीं कंपती है।

मन से स्वयं का तादात्म्य (indentity) ही हवा के झोंकों का काम करता है।

इधर टूटा तादात्म्य --उधर हुईं आंधियां बंद।

और जहां आंधियां नहीं हैं, वहीँ आनंद है।

रजनीश के प्रणाम

१६/१२/१९७०

Letter-Dec-16-1970-Yprem.jpg


See also
Antarveena ~ 048 - The event of this letter.