Letter written on 16 Jan 1971 (Kusum)

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Osho wrote many letters in Hindi to Ma Kusum Bharti and her husband Kapil, then of Ludhiana. Most were addressed to Kusum, but always mentioning Kapil too. 27 were published in Prem Ke Swar (प्रेम के स्वर). Sannyas Wiki has images of all but one of those published in PKS, plus three unpublished ones, plus one in English published in The Gateless Gate.

This letter is dated 16th January 1971 and was published in Prem Ke Swar (प्रेम के स्वर) as letter #23. The letterhead is very much in the style of the one from the short-lived Churchgate period, but it is already from Woodland, Osho's principal home during the Bombay era.

Prem Ke Swar 23.jpg

acharya rajneesh

A-1 WOODLAND PEDDAR ROAD BOMBAY-26 PHONE: 382184

प्यारी कुसुम,
प्रेम। एक मछली ने एक दिन मछलियों की रानी से पूछाः "मैं सदा से सागर के संबंध में सुनती आरही हूँ पर यह सागर है क्या ? और है भी या नहीं? और है तो कहां है?"

मछलियों की रानी हंसी और बोलीः "पागल! तू सागर में ही जीती है, तैरती है, स्वांस लेती है -- तेरा सारा अस्तित्व ही सागर में है ! सागर ही तेरे भीतर है और सागर ही तेरे बाहर है। सागर से ही तू जन्मी है, सागर से ही तू निर्मित है और अंततः सागर में ही लीन होजाना तेरी नियति है।"

मछली ने सुना पर शायद सुना नहीं !

मनुष्य ही कहां सुनता है -- सो वह तो थी बेचारी मछली !

या सुना भी तो मछली कुछ समझी नहीं !

मनुष्य ही कहां समझता है ?

उसने चारों ओर देखा -- पर सागर कहीं दिखाई नहीं पड़ा !

सोचा सागर शायद अदृश्य है !

आह ! मछलियां भी कितना मनुष्यों जैसा ही सोचती हैं ?

और फिर यह भी सोचा कि शायद मैं अपात्र हूँ और इसलिए ही सागर से मिलन नहीं होता है !

और मैं सोचता हूँ कि वह मछली थी या मनुष्य ?

तुझसे भी पूछता हूँ : तू भी बता : वह मछली थी या मनुष्य ?

रजनीश के प्रणाम

१६/१/१९७१

पुनश्चः कपिल को प्रेम।
असंग को आशीष।


See also
Prem Ke Swar ~ 23 - The event of this letter.
Letters to Kusum and Kapil - Overview page of these letters.