Difference between revisions of "Letter written on 17 Jun 1964"

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Yukrand 1Oct1969 pages 28-29.jpg

The letter is dated 17th June 1964 and addressed to Lala Sundarlal Jain, a son of Lala Motilal Jain, the founder of the major Indological publishing house, Motilal Banarsidass. The salutation is a less common one of those times, "चिदात्मन्", roughly, "Conscious Soul".

The wiki has no image of the letter but we have made a transcription of the text from its first known publication, in the Oct 1, 1969 issue of Yukrand (युक्रांद, Indian magazine), image right, text below. That issue of Yukrand has five letters addressed to Sundarlalji, introduced thusly:

पत्र प्रेरणा
(ला० सुन्दरलाल जी, बंगलो रोड-जवाहर नगर दिल्ली-७ को प्राचार्य रजनीश जी द्वारा लिखे गये कुछ पत्र)

It appears also to have been published in Prem Ke Phool (प्रेम के फूल), a collection of early letters, as the text description of Prem Ke Phool ~ 021, the letter on this date in the 1964 Timeline, matches closely a loose translation of the transcription below. And the full translation turns up in the CD-ROM's version of A Cup of Tea as letter #19.

Transcription:

चिदात्मन् ।
आपके पत्र मिले। मैं बाहर था । अतः शीघ्र प्रत्युत्तर संभव नहीं हो सका। अभी अभी लौटा हूं, राणकपुर में शिविर लिया था, वह शिविर केवल राजस्थान के मित्रों के लिये था। इस लिए अापको सचित नहीं किया था. पाँच दिन का शिविर था, और कोई ६० शिविरार्थी थे-शिविर अभूत पूर्व रूप से सफल रहा है और महत् परिणाम दिखाई पड़े हैं। उन परिणामों से संयोजक मित्रों का साहस बढ़ा है, और वे जल्दी ही अखिल भारतीय स्तर पर एक शिविर आयोजित करने का विचार कर रहे हैं। उसमें आपको पाना ही है।
यह जानकर अति आनंदित हूं कि ध्यान पर आपका कार्य चल रहा है, केवल मौन होना है। बस मौन हो जाना ही सब कुछ है। मौन का अर्थ वाणी के अभाव से ही नहीं - मौन का अर्थ है, विचार का अभाव । चित्त जब निस्तरंग होता है, तो अनंत से संबंधित हो जाता है। शान्त बैठ कर विचार प्रवाह को देखते रहें-कच्छ करें नहीं; केवल देखें, वह केवल देखना ही विचारों को विसजित कर देता है । दर्शन का जागरण विचार विकार से मुक्ति है । और जब विचार नहीं होते हैं तो चैतन्य का आविर्भाव होता है । यही समाधि है । सभी मित्रों को मेरा प्रेम कहें।
१७ जून १९६४