Letter written on 18 Aug 1963 pm

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on plain paper in the evening of 18th August 1963, from Indore while Osho is camping there for the talks on 18 and 19 as planned - which is mentioned by him in the PS of Letter written on 15 Aug 1963. Also it's worth noting that Paryushan Festival was scheduled between 16-24 Aug in 1963 as per Jain calendar - so Osho's tour program must have been planned by organizers at Indore and Bombay (as per letter of 15 Aug) to deliver his talks especially on this annual festival. Osho always delivered talk during this festival every year till he moved to Poona - 1.

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom or Mother. Of the hand-written marks seen in other letters, a black tick mark is seen up top, and bottom right has a faint mirror-image number, 197. Osho's experiments with coloured inks seen in some other recent letters continue with this one; it is mostly black, but has one sentence in red for emphasis. Some writing is showing through from the back side can be PS, but we have no direct image of it.

The letter has been published in Jeevan-Darshan (जीवन दर्शन) (letters) as letter #2, Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 33 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 237-238.

प्रिय मां,

मैं तुम्हें देखता हूँ। तुम्हारे पार जो है उसे भी देखता हूँ। यह तुम्हारी देह कैसी पारदर्शी होगई है!

सच ही देह कितनी ही ठोस क्यों न हो उसे तो नहीं ही छिपा पाती है जो कि पीछे है!

पर हम आंखें ही न खोलें तो दूसरी बात है। फिर तो सूरज भी नहीं ही है! सब खेल आंखों का है। तर्क और विचार से कोई प्रकाश को नहीं जानता है। वास्तविक आंखों की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती है।

आंखें चाहिए। आत्मिक को देखने के लिए दृष्टि जगानी होती है।

और जो दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे उसे पहले अपनी देह के पीछे झांकना होता है।

जहां तक मैं अपने गहरे में देखता हूँ वहीं तक अन्य देहें भी पारदर्शी होजाती हैं। जितनी दूर तक मैं अपनी जड़ता में चैतन्य का आविष्कार कर लेता हूँ उतनी ही दूर तक समस्त जड़ जगत्‌ मेरे लिए चैतन्य से भर जाता है। जिस दिन मैं समग्रता में अपने चैतन्य को, अपने आत्म को जानूँगा उसी दिन जगत्‌ नहीं रह जाता है। जो है सब आत्म होजाता है।

इससे रोज कह रहा हूँ : इससे हर एक से कह रहा हूँ : ‘एक बार देखो कि कौन तुम्हारे भीतर बैठा है? इस हड्डी-मांस की देह में कौन आच्छादित है? कौन है आबद्ध तुम्हारे इस वाह्‌य रूप में?’

इस क्षुद्र में कौन विराट खेल खेल रहा है?

कौन है यह चैतन्य? क्या है यह चैतन्य?

पूछो : ‘मैं कौन हूँ?’ पूछो और पूछो। पूछो कि यह प्रश्न चेतना की रंध्र रंध्र में गूंज उठे। प्राण स्पंदित होजावें : श्वांस श्वांस यही पूछने लगे। एक ही प्रश्न जल उठे प्राणों में। प्रश्न ही रह जाये और कुछ नहीं। सब जल जाये इस प्रश्न में – विचार, वासना, ज्ञान, अस्तित्व।

तुम मिट जाओ और रह जाये केवल प्रश्न, केवल प्यास; दिये की अकंपित लौ की भांति।

और फिर प्रश्न भी बुझ जाता है। जैसे सारे तिल-बाती को जलाकर लौ स्वयं बुझ जाती है। प्रश्न की राख से उत्तर उठता है। प्रश्न का बुझ जाना ही उत्तर है।

और तब दीखता है : अदेही, अमृत, नित्य, बुद्ध स्वरूप। फिर स्वयं में सब और सब में स्वयं होजाता है।

रजनीश के प्रणाम

(प्रवास से:
इंदौर (म प्र.)
रात्रि : १८ अगस्त १९६३.)

Letters to Anandmayee 904.jpg


See also
Krantibeej ~ 033 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.