Letter written on 18 Mar 1963

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 18th March 1963. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. Of the hand-written marks seen in other letters, there is a black tick mark but no red one, and a faint but readable mirror-image number in the bottom right corner, 174. This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 25 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 208.

The PS reads: "I am going to talk at Indore and Ratlam on Mahavir Jayanti. There is no letter since many days. Write : how is the health? My pranam to all."
Mahavir Jayanti is celebrated on Hindu month Chaitra 13th (Trayodashi) every year. In 1963 as per Hindu Calendar was on Saturday, 6 Apr 1963 - that means Osho plans to visit Indore and Ratlam on 6 April for the talks.

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

प्रिय मां,

प्रार्थना क्या है? आत्म-विस्मरण! नहीं, प्रार्थना आत्म-विस्मरण नहीं है। वह, जिसमें भूलना और डूबना और खोना है, मादकता का ही एक रूप है। वह उपाय प्रार्थना नहीं, पलायन है। शब्द में, संगीत में खोया जासकता है। ध्वनि-सम्मोहन में, नृत्य में जो है उसका विस्मरण होसकता है। यह विस्मरण और बेहोशी सुखद भी मालुम होसकती है पर यह प्रार्थना नहीं है। यह मूर्च्छा है जब कि प्रार्थना सम्यक्‌ चैतन्य में जागरण का नाम है।

प्रार्थना क्या कोई क्रिया है? क्या कुछ करना प्रार्थना है? नहीं, प्रार्थना क्रिया नहीं, वरन्‌ चेतना की एक स्थिति है। प्रार्थना की नहीं जाती है; प्रार्थना में हुआ जाता है। प्रार्थना मूलतः अक्रिया है। जब सब क्रियायें शून्य हैं और केवल साक्षी चैतन्य शेष रह गया है; ऐसी स्थिति का नाम प्रार्थना है। प्रार्थना शब्द से करने की ध्वनि निकलती है : ध्यान शब्द से भी करने की ध्वनि निकलती है पर वे दोनों शब्द क्रियाओं के लिए नहीं, चेतना-स्थिति के लिए प्रयुक्त हुए हैं। शून्य में, मौन में, निःशब्द में होना प्रार्थना है; ध्यान है।

एक प्रार्थना सभा में कल यह कहा हूँ।।

किसी ने बाद में पूछा : ‘फिर हम क्या करें?’

मैं कहाः ‘थोडे समय को कुछ भी न करें। बिल्कुल विश्राम में अपने को छोड़दें। शरीर और मन दोनों को चुप होजाने दें। चुपचाप मन को देखते रहें वह अपने से शांत और शून्य हो जाता है। इसी शून्य में सत्य का सान्निध्य उपलब्ध होता है। इसी शून्य में वह प्रगट होता है जो भीतर है और वह भी जो बाहर है। फिर बाहर और भीतर मिट जाते हैं और केवल वही रह जाता है जो है। इस शुद्ध ‘है’ की समग्रता का नाम ही ईश्वर है।‘

रजनीश के प्रणाम

१८ मार्च १९६३


पुनश्‍च: मैं महावीर जयंती पर इंदौर और रतलाम बोल रहा हूँ। बहुत दिन से पत्र नहीं है। लिखना : स्वास्थ्य कैसा है? सबको प्रणाम।

Letters to Anandmayee 880.jpg


See also
Krantibeej ~ 025 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.