Letter written on 18 Sep 1961

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 18th September 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is just plain "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (21) in a circle in the top right corner and a red tick mark, plus it is following a trend set by Letter written on 2 Sep 1961 pm: A second number found on the backs of many letters, but seen as faint and mirror-image because of that, has been moved to the front side of the letter ("47" in this case, in the bottom right corner).

Letters to Anandmayee 843.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

१८ सित. १९६१.

मां,
दोपहर। नील आकाश में शुभ्र बदलियों के टुकड़े तैर रहे हैं। धूप की सुनहरी चादर दूर दूर तक पहाड़ियों को ढांके है। एक छोटी सी तलैया के किनारे आ बैठा हूँ। दो मछुए उस किनारे मछलियां फांस रहे हैं।

एक स्मरण आता है। दो हजार साल पहिले ऐसे ही एक दिन एक तालाब के किनारे से चलते जीसस ख्रीष्ट एक मछुए के पास रुक गए थे। उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा था : “मित्र क्या मछलियां ही फांसने में सारा जीवन बिता दोगे?” ईसा की आंखों में मछुये ने झांका होगा : वे कह रही थीं : “मैं तुम्हें स्वर्ग का राज्य फांसने वाला मछुआ बना सकता हूँ।”

जीवन क्षुद्र बातों में ही बीत जाता है। जिस अवसर से विराट को पाया जा सकता है वह यूं ही खोदिया जाता है। बहुत अंधेरा है और बहुत अंधापन है। उस सागर तट पर जहां हीरे भी हैं हम कंकड़ ही बीनते रह जाते है।

इस अपव्यय की ओर जाग जाना ही आध्यात्मिक जीवन की ओर पहला चरण बन जाता है।

रजनीश के प्रणाम


See also
Letters to Anandmayee ~ 18 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.