Letter written on 19 Feb 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 19 Feb 1962.

This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 63 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 98 (2002 Diamond edition) with incorrect date: 10 Feb 1969 pm.

Letters to Anandmayee 970.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
रात पानी पड़ा है। उसका गीलापन अभी तक है और मिट्टी से सौंधी सुगंध उठ रही है। सूरज काफी ऊपर उठ आया है और गायों का एक झुंड जंगल जारहा है। उनकी काठ की घंटियां बड़ी मधुर होकर बज रही हैं। मैं थोड़ी देर तक उन्हें सुनता रहा हूँ : अब गायें दूर निकल गई हैं और घंटियों की फीकी प्रतिध्वनि ही बाकी रह गई है।

इतने में कुछ लोग मिलने आये हैं : पूछ रहे हैं मृत्यु क्या है?

मैं कहता हूँ : जीवन को हम नहीं जानते हैं इसलिए मृत्यु है। स्व-विस्मरण मृत्यु है। अन्यथा मृत्यु नहीं है केवल परिवर्तन है। ‘स्व’ को न जानने से एक कल्पित स्व हमने निर्मित किया है। यही है हमारा ‘मैं’ – “अहंकार”। यह है नहीं केवल भासता है। यह झूठी इकाई ही मृत्यु में टूटती है। इसके टूटने से दुख होता है क्योंकि इसी से हमने अपना तादात्म्य स्थापित किया था। जीवन में ही इस भ्रांति को पहचान लेना मृत्यु से बच जाना है। जीवन को जानलो और मृत्यु समाप्त होजाती है। जो है वह अमृत है : उसे जानते ही नित्य, शाश्वत जीवन उपलब्ध होजाता है।

कल एक सभा में यही कहा हूँ : स्व-ज्ञान जीवन है : स्व-विस्मरण मृत्यु है।

१९.२.१९६२

रजनीश के प्रणाम

Partial translation
"Yeasterday in one assembly I have said: self knowledge (remembrance) is life – self obliviousness is death."
See also
Krantibeej ~ 063 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.