Letter written on 19 Feb 1963

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 19th February 1963. The letterhead has been seen before in Letter written on 15 Dec 1962 among letters to her and in Letter written on 12 Jan 1963 am to Manubhai. It has his name in a much larger and messier font to the right of and above the rest:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of new kinds of hand-written marks on the letter: on each of its two pages there is a black tick mark in the upper right corner; there are faint figures in the bottom right corner of each which are number 169 on 1st page and on 2nd page it is 168 showing through the page. Below letterheads there are a 1 and 2 in parentheses to indicate first and second page, made by Osho and are part of the manuscripts.

We can note that this letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 76 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 200-201. Hovewer, Bhavna book has the date as 17 Feb, but the 19 can be clearly seen in the image of the letter. One further small mystery: each of the pages is on a separate piece of letterhead, not on the reverse side. But a couple of lines of writing can be seen on the reverse of the first page, which can be read with the help of mirror as - 'रहा। वे दोनों आंधी, पानी में चलते रहे। सेंट मेरिनो गांव के दिये दिखाई पड़ने लगे थे। तभी लियो ने पूछा, ‘फिर वास्तविक साधु कौन है?’ - but these lines are actually crossed out by two long back strokes over them and Osho seems to decide to write on the fresh new page as it may run longer which can hinder reading the text in the front side.

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

(१)

१९.२.’६३

प्रिय मां,

‘साधुता क्या है?’ कोई पूछ्ता था।

यह प्रश्न अनेकों के मन में है। राजनगर में चार सौ साधु-साध्वियों के बीच था। वहां भी यह प्रश्न उठा था। वस्त्र और वाह्‌य रूप से साधुता का सम्बंध होता तो यह प्रश्न उठता ही नहीं। निश्चिय ही साधुता वाह्‌य तथ्य नहीं है; कुछ आंतरिक सत्य है। यह आंतरिक सत्य क्या है?

साधुता अपने में होना है। साधारणतः, मनुष्य अपने से बाहर है। एक क्षण भी वह अपने में नहीं है। सब के साथ है पर वह अपने साथ नहीं है। यह स्व से अलगाव ही असाधुता है। स्व में लौटना – स्वरूप में प्रतिष्ठित होना – स्व-स्थ होना साधुता है। आध्यात्मिक अस्वास्थ्य असाधुता है : स्वास्थ्य साधुता है।

मैं बाहर हूँ तो सोया हुआ हूँ। वाह्‌य पर मूर्च्छा है। पर पकड़े हुए है। पर ही ध्यान में है। स्व ध्यान के बाहर है। यही निद्रा है। महावीर कहे हैं : ‘सुत्ता अमुणी’ (जो सोता है सो अ-मुनि है।)। इस पर की परतंत्रता से स्व की स्वतंत्रता में जागना साधु होना है।

यह साधुता पहचानी कैसे जाती है?

यह साधुता शांति से, आनंद से, सम्यक्त्व से पहचानी जाती है।

एक साधु था : संत फ्रांसिस। वह अपने शिष्य लियो के साथ यात्रा पर था। वे सेंट मेरिनो जा रहे थे। राह में आंधी और बर्षा आई। वे भींग गये और कीचड़ से लथपथ हो गये। रात घिर आई थी और दिनभर की भूख और थकान ने उन्हें पकड़ लिया था। गांव अब भी दूर था और आधी रात के पूर्व पहुंचना संभव नहीं था। तभी फ्रांसिस ने कहाः ‘लियो, वास्तविक साधु कौन है? वह नहीं जो अंधों को आंखें देसकता है – बीमारों को स्वास्थ्य दे सकता है और मृतों को भी जिला सकता है। वह वास्तविक साधु नहीं है।’ थोड़ी देर सन्नाटा रहा और फिर फ्रांसिस ने कहा : ‘लियो, वास्तविक साधु वह भी नहीं है जो पशुओं और पौधों और पत्थरों की भाषा समझ ले। सारे जगत्‌ का ज्ञान भी जिसे उपलब्ध हो; वह भी वास्तविक साधु नहीं है।’ फिर थोड़ी देर सन्नाटा

Letters to Anandmayee 873.jpg

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

(२)

रहा। वे दोनों आंधी, पानी में चलते रहे। सेंट मेरिनो गांव के दिये दिखाई पड़ने लगे थे। संत फ्रांसिस ने फिर कहा : ‘और वह भी वास्तविक साधु नहीं है, जिसने अपना सब कुछ त्याग दिया है।’ अब लियो से रहा न जा सका। उसने पूछा, ‘फिर वास्तविक साधु कौन है?’ संत फ्रांसिस ने कहा थाः ‘हम मेरिनो पहुंचने को हैं। सराय के द्वार को जाकर हम खटखटायेंगे। द्वारपाल पूछेगा : ‘कौन हो?’ और हम कहेंगे – तुम्हारे ही दो बंधु – दो साधु। और यदि वह कहे : भिखारियों – भिखमंगों – मुफ्तखोरों – यहां से भाग जाओ, यहां तुम्हारे लिये कोई स्थान नहीं है ओर द्वार बंद करले। ‘हम भूखे और थके और कीचड़ से भिड़े आधी रात में बाहर खड़े रहें और फिर द्वार खटखटायें। वह अब की बार बाहर निकलकर लकड़ी से हम पर चोट करे और कहे : बदमाशो, हमें परेशान मत करो। और यदि हमारे भीतर कुछ भी न हो – वहां सब शांत और आनंद बना रहे और उस द्वारपाल में भी हमें प्रभु दीखता रहे – तो यही वास्तविक साधुता है।’

निश्चय ही, सब परिस्थितियों में अखंडित शांति और सरलता को उपलब्ध कर लेना ही साधुता है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: मैं नहीं आसका। क्षमा करना। २ और ३ मार्च दिल्ली बोल रहा हूँ। १ मार्च की रात्रि पंजाब मेल से वहां पहुँचूंगा। दिल्ली का पता नीचे देरहा हूँ। कोई परिचित हों तो उन्हें लिखदें।

श्री सुन्दरलाल जी जैन, पो. बॉ. १५८६,
बंगलो रोड, जवाहर नगर, देल्ली – ६ (फोन : २२७६५५)

Letters to Anandmayee 874.jpg

Osho starts this letter by saying: " 'What is saintliness?' - someone was asking. This question is in the minds of many. In Rajnagar I was amidst four hundreds of sadhus-sadhvies - this question was raised there too. If saintliness is related with the clothes and external appearance then this question would not have been raised." The PS reads: "I couldn't come. Forgive me. Would deliver talks at Delhi on 2 and 3 March. Will reach there on 1st March night, by Punjab Mail. Address of Delhi is given below - inform to anyone who is acquainted (known) - Shree Sunderlal Ji Jain, Po. Box. 1586, Bungalow Road, Jawahar Nagar, Delhi - 6 (Telephone : 227655)."


See also
Krantibeej ~ 076 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.