Letter written on 1 Dec 1963

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 1st December 1963. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the left of and oriented 90º to the rest, which reads:

115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. Of the hand-written marks seen in other letters, only a red tick mark is seen up top. There are no numbers, even on the reverse side, which can be verified in this case since a reverse side image is supplied. Like the last letter, this one is typed rather than hand-written, and in two colours, with three sentences in red.

The letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 247. However, the typed PS on the reverse side did not get published, for whatever reason, even though it is clearly visible, showing through the paper prominently.

In PS Osho writes: "I had been to Omkareshwar (Dist. Khandwa, M.P.) - returned back yesterday only. Though I thought of writing a letter from there itself but couldn’t write. Rest is OK. There is no letter from you : what should I assume?" Osho begins the main letter by saying: 'Returned from (after attending) The World Religion Meet.' So from this and PS we can understand that he would have addressed this meet - most likely to have been organized at Omkaareshwar on 29 Nov. The journey Jabalpur - Khandwa - Jabalpur by train plus road journey Khandwa - Omkareshwar - Khandwa might take 12+ hours one way.

आचार्य रजनीश

११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र:)

प्रिय मां,
एक विश्वधर्म समारोह से लौटा हूँ. वहां जो सुना तो बहुत आश्चर्य हुआ है. सत्य के संबंध में समस्त विचार और धारणायें व्यर्थ हैं यह कहनेवाले लोग भी चर्चा तो धारणाओं की करते हैं.और, इन बौद्धिक विचारणाओं में भी मताग्रह होता है.

सत्य यदि बुद्धि अतीत है तो सत्य का कोई संप्रदाय नहीं हो सकता है.

अविक्षिप्त चित्त्त में सत्यसाक्षात होता है. विचार तो अशांत, विक्षिप्त चित्त की ही उत्पत्ति हैं. विचार तो विकार ही हैं. उनपर आग्रह अज्ञान है. उनमें स्त्यासत्य का निर्णय व्यर्थ है. उनमें नहीं, उनके अतिक्रमण पर सत्यानुभूति अवतरित होती है.

इसलिये, सत्य के लिये कोई विवाद संभव नहीं है. कोई तर्क संभव नहीं है. कोई प्रमाण संभव नहीं है. प्रकाश के लिये क्या प्रमाण है : सिवाय आंख के? सत्य के लिये भी कोई प्रमाण नहीं है सिवाय प्रज्ञा. प्रज्ञा बुद्धि की लहरों के पीछे जो गहराई है उसीका नाम है. वहां विचार नहीं केवल विवेक है.

विचारणाओं के धुंये के पार जो निर्धूम ज्ञानग्नि है वही प्रज्ञा है.

इस गहराई की अनुभूति धर्म है.

इस गहराई में पर, विजातीय, अन्य कुछ भी नहीं है. केवल स्वभाव है. स्वभाव धर्म है.

स्वभाव की चर्चा अर्थहीन है : सार्थकता है उसमें उतरने में, डूबने में. धर्म प्रत्येक को बुलाता है : जैसे सागर सरिताओं को पुकारता है. जो स्वयं को उसमें खोने का साहस करते हैं वे सतह पर अपने को खोकर एक ऐसी गहराई में स्वयं को पालेते हैं जहां फिर किसी भांति का खोना नहीं है. उसे पाना है जो खोया न जासके. जो खो सकता है वह मैं नहीं हूँ.

+++

सबको मेरे प्रणाम.

रजनीश के प्रणाम
रजनीश के प्रणाम

१ दिसम्बर १९६३.

Letters to Anandmayee 911.jpg

पुनश्च:
ओंकारेश्वर गया था. कल ही लौटा हूँ. वहीं से पत्र लिखने का सोचा था पर नहीं लिख सका. शेष शुभ है.

तुम्हारा पत्र नहीं : क्या समझूं?

Letters to Anandmayee 912.jpg


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 158 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.