Letter written on 21 Jun 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 21 June 1962.

This letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 138-139 (2002 Diamond edition).

In PS Osho writes: "Received telegram from Shree Parakh Ji and Shree Bhikhamchand Ji. (I) would have been happy to if (I) could come but the health is not OK - completely. That day when (I) wrote letter to you the health was absolutely fine - then next day problem has arisen. The disorder happened this time, has an interesting history which you can know when you arrive (here). 'hoping that you would go via here on your return from Bhopal - bring Shree Bhikhachand too. Arvind is told about his sickness - that can not be cured. I am taking it for granted about your coming here on return from Bhopal. As I am unable to come hence apologetic - but you yourself would say - seeing me on return - that it was good that I didn't come. Rest, OK. I am getting more indebted to Shree Parakh Ji as I am not able to come even after his inviting again and again. My pranam to all. Write, when you will reach here."

Letters to Anandmayee 1009.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

२१ जून १९६२

प्रिय मां,
कल प्रभात कुछ साध्वियां आईं थी। योग पर उनसे चर्चा हुई है। पूर्वीय संस्कृति ने विश्व को जो श्रेष्ठतम देन दी है, वह योग है। धर्म आते हैं, चले जाते हैं; संप्रदाय बनते हैं मिट जाते हैं; पर योग सनातन है।

यह सनातन योग दो प्रकार का है : शक्ति का और शांति का। शक्ति का योग एकाग्रता से प्रारंभ होता है। उससे मन की प्रलुप्त शक्तियां जागती हैं और मनुष्य को अपने भीतर सिद्धियों का एक नया आयाम उपलब्द्ध होजाता है। यह योग विज्ञान का ही विस्तार है : विज्ञान जो बाहर करता है, शक्तियोग वही कार्य भीतर करता है। यह योग आध्यात्मिक नहीं है। दूसरा योग शांति योग है। इसकी साधना विचार शून्यता की है। इसमें पाना नहीं, खोना है। सब खोकर शून्य उपलबद्ध होता है। यह शून्य निर्वाण है। शांति योग ही, वस्तुत:, आध्यात्मिक है।

शांति-योग को साधना कोई क्रिया, कोई अभ्यास नहीं है। समस्त क्रियायें और समस्त अभ्यास मन के हैं। शांति योग तो मन के अतीत लेचलता है। शान्ति चाहना वासना है; मन से जो भी उठता है, वह सब वासना है। शांति चाह नहीं है – जब कोई चाह नहीं होती है तब जो होता है वह शांति है। इसलिए, शांति को चाहा नहीं जाता है, साधा नहीं जाता है; वरन्‌ मन की क्रियायें जब जब नहीं होती है तब उसे पालिया जाता है : जब मन नहीं होता है, तब वह होआती है।

शक्ति साधना है; शांति सहज उपलब्धि है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: श्री पारख जी और श्री भीखाचन्द जी का तार मिला है। मैं आसकता तो प्रसन्न होता पर स्वास्थ्य एकदम ठीक नहीं है। उस दिन आपको पत्र लिखा तो तबियत बिल्कुल ठीक थी फिर दूसरे दिन से गड़बड़ होगई है। इस बार जो गड़बडी हुई उसका बडा मजेदार इतिहास है आप जब आती हैं तब ही जान सकेंगी। मैं आशा करता हूँ कि आप भोपल से लौटते में यहां होकर जावें – श्री भीखाचन्द को भी लेती आयें। अरविंद को उनकी जो बीमारी बताई है जो उसका इलाज नहीं होसकेगा! भोपाल से लौटते में आने की बात मैं माने ही लेरहा हूँ। मैं स्वयं नहीं आसक रहा हूँ सो क्षमायाची तो हूँ ही पर आप लौटकर देखेंगी तो खुद ही कहेंगी कि नहीं आये सो ठीक ही किया। शेष शुभ। श्री पारख जी बार बार बुला रहे हैं पर मैं आ नहीं पारहा हूँ सो उनका बहुत ऋणी होता जाता हूँ। सबको मेरे प्रणाम। यहां कब पहुँचेगी सो लिखें।


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 067 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.