Letter written on 21 Nov 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 21st November 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: red and black tick marks in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. And after a long string of letters with two and sometimes three numbers, with all but one crossed out, we now revert to the previous norm of just one number, unfortunately not entirely legible, either 147 or 148.

The letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 176). The book has it dated as the 29th, but it is clearly the same letter.

Letters to Anandmayee 940.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
फूल खिलते हैं पर उन्हें कोई देखता नहीं मालुम होता है – पक्षी गीत गाते हैं पर उन्हें कोई सुनता नहीं मालुम होता है – और इसलिए जीवन मिलता है पर उसे कोई जीता नहीं मालुम होता है।

आंखें हैं पर उनसे देखता शायद ही कोई है। ईसा ने एक दिन आंख वालों के बीच कहा था: ‘जिनके पास आंखें हों वे देखें!’ और किसी प्राचीन महर्षि ने कहा है : “मैं अपने दोनों हाथ उठाकर चिल्ला रहा हूँ पर मेरी कोई सुनता नहीं है।“

सुनना इतना क्या कठिन है?

देखना इतना क्या मुश्किल है?

एक धुंधली विचारों की मूर्च्छित धारा ने सब कठिन कर दिया है। मेरी आंखों और सत्ता के बीच विचार प्रवाह की दीवार है। इसने मुझे अपने में बंद कर दिया है। मैं कैदी हूँ – विचारों का कैदी और बिना इस दीवाल में संध बनाये बाहर निकलना असंभव है। और मजा यह है कि पत्थर की दीवार को तोड़ना आसान है पर विचार की दीवार को तोड़ना नहीं! क्यों? कल कोई पूछ रहा था : क्यों? इसलिए कि विचार की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है : वह केवल मेरी मूर्च्छा है। विचार हैं नहीं, इस अर्थ में कि उनसे लड़ा जासके – वे नहीं है, जिस क्षण जाग्रति में यह जाना जाता है उसी क्षण उनसे मुक्ति होजाती है।

एक साधु से किसी ने पूछा था : ‘सत्य पथ का प्रवेश द्वार कहां है?’ वह साधु बोला : “उस पहाड़ी झरने के गीत को सुन रहे हो?” उस व्यक्ति ने कहा : ‘हां, सुन रहा हूँ। ‘साधु बोला था : “यहीं है प्रवेश द्वार।“

शांत, विचार शून्य हम देख सकें, सुन सकें, होसकें और वहीं सत्य का प्रवेश द्वार है।

रजनीश के प्रणाम

२१ नव. १९६२


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 101 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.