Letter written on 21 Sep 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 21st September 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: black and red tick marks in the top right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (132) and replaced by a pink number, 134.

The letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition), on p 157.

In PS Osho writes: "How the health is? How much I am awaiting for the letter?"

Letters to Anandmayee 927.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

२१.९.६२

प्रिय मां,
एक साधु आए थे। सत्य को खोज रहे हैं। सभी खोज में लगे हैं। कोई कुछ खोज रहा है, कोई कुछ पर खोज सभी रहे हैं। जो कुछ और खोज रहे हैं, वे पा भी लें पर जो सत्य को खोज रहा है वह तो उसे कभी भी नहीं पासकता है। क्यों? क्योंकि सत्य तो वही है जो खोज रहा है! जो खोज रहा है उसे ही पाना है तो खोज छोड़ देनी आवश्यक है। जो खोज छोड़ देता है, वह उसे पालेता है।

जीवन स्त्य को पालेने में पाने की आकांक्षा ही बाधा है। पाने की आकांक्षा ही मूल वासना है। संसार पाना छोड़ते हैं तो मोक्ष पाने में लग जाते हैं। वासना वही की वही बनी रहती है। और, सत्य तो यह है कि प्रयास मात्र वासना-जन्य हैं। वह वासना की सक्रिय अभिव्यक्ति है। और वासना संसार है : मोक्ष की, सत्य की वासना भी संसार है।

ह्‌वांग-पो ने कहा है : “खोज से ही तुम उसे खो देते हो। बुद्ध के द्वारा ही बुद्ध को पाने में लगे हो! मन से ही मन को बांधना चाहते हो! तुम यदि युग युग भी प्रयास करो तो भी उसे पाओगे नहीं।“

एक क्षण सब छोड़ो : संसार भी, मोक्ष भी। असत्य भी सत्य भी। गृहस्थी भी, सन्यास भी। और फिर पाया जाता है – खोज छोड़ते ही पाया जाता है – कि अरे! जिसे खोजने दूर गये थे वह तो घर में ही बैठा था।

यही उस साधु से कहा हूँ। पर उसने सुना नहीं। सुन सकें ऐसे कान बहुत कम के पास है!

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: तबियत कैसी है? पत्र की कितनी प्रतीक्षा कर रहा हूँ?


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 084 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.