Letter written on 22 Nov 1963

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 22nd November 1963. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the left of and oriented 90º to the rest, which reads:

115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

This is the first typed letter to Ma duly signed by Osho. Looks, he typed it himself on the mechanical typewriter arranged by Ma. The sentences typed are not ended with normal Hindi '।' instead Osho uses full stop '.' Also the CR (carriage return) is not been used properly for change of the para. And it comes in two colours, ie with three sentences in red. Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. Of the hand-written marks seen in other letters, only a red tick mark is seen up top, with no numbers.

The letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 246. The date is given there as Nov 29, but Osho has typed 22. It is the same letter.

While concluding the letter Osho writes: "I am in bliss. There is no letter from you. Only when Achal came yesterday news were known - knowing that all are well - felt happiness. Convey my pranam to all. Love to Sharda and Sushila. Rajneesh Ke Pranam."

आचार्य रजनीश

११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र:)

प्रिय मां,

सत्य क्रमिक उद्‌घाटन नहीं है. सत्य का विस्फोट होता है.

विकास नहीं क्रांति घटित होती है. ज्ञान क्रमिक है : इसलिए, ज्ञान सत्य में नहीं लेजाता है. ज्ञान वस्तुत: दर्शन में बाधा है. ज्ञान की श्रंखला में सत्य का आगमन नहीं होता है, वरन्‌ उस श्रंखला के विछिन्न होने पर होता है.

विचार की श्रंखला ही मन है. इस श्रंखला का जहां अभाव है वहीं स्त्य का आविर्भाव है.

सत्य को पाने न चलें. कभी रुकें और देखें.

किसी बिल्कुल अनअपेक्षित क्षण में कोई अपरिचित द्वार खुल जाता है.

केवल स्वयं को देखना है. जैसे हम हैं वैसा ही देखना है. आदर्श बीचमें न आवें. शुभ अशुभ की धारणायें बाधा न बनें. स्वयं की न कोई निन्दा हो, न प्रशंसा हो. इसे मैं तटस्थ दर्शन कहता हूँ.

जो है उसे बिना विचार को बीच में लाये देखते ही एक अभिनव मुक्ति बोध होता है.

जैसे एक भार गिर जाता है.

इस भारमुक्त स्थिति में ही सत्य का विस्फोट होता है.

+++

मैं आनंद में हूँ. आपका कोई पत्र नहीं है. कल अचल आये तो समाचार ज्ञात हुये. वहां सब कुशल है यह जानकर प्रसन्न्ता हुई.

सबको मेरे प्रणाम कहें. शारदा, सुशीला को स्नेह.

२२,११,१९६३

रजनीश के प्रणाम

रजनीश के प्रणाम :
Letters to Anandmayee 914.jpg


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 157 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.