Letter written on 22 Oct 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 22nd October 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a red tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (139) and replaced by a pink number, 141.

The letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 166). There the date is represented as 22 Sep, but it is the same letter.

In the PS Osho writes: "Ma, how are you; write? I am going to Gadarwara tomorrow and will stay there up to 31 October. Rest, OK. Pranam to all."

Letters to Anandmayee 933.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
दोपहर शांत है। धूप भली लग रही है और हवाओं में कहीं से शहनाई के स्वर गूंजते आरहे हैं।

एक व्यक्ति अभी अभी गये हैं और एकांत होगया है। जो गये हैं, उनके संबंध में सोच रहा हूँ। उनका अध्ययन विशाल है पर भीतर सब खाली खाली है। कितना वे जानते हैं पर कुछ भी तो नहीं जान पाये हैं! ज्ञान के नीचे फैला अज्ञान डेरा डाल लेता है। बुद्धि से जाना हुआ कभी भी ज्ञान नहीं बन पाता है। अध्ययन विस्तार देता है, गहराई नहीं और ‘जो है’ वह गहराई में है। इस गहराई में उतरने के लिए साहस चाहिए। सुरक्षा छोड़नी पड़ती है। आस्थायें और धारणायें छोड़नी पड़ती हैं : भ्रम छोड़ने पड़ते हैं। यह आंतरिक मानसिक अपरिग्रह न हो तो कोई अपने में नहीं उतर पाता है। यह साहस धार्मिक व्यक्ति का लक्षण है। ज्ञान को छोड़कर अज्ञात में कूंदने का साहस धार्मिकता का प्राण है। ज्ञात सतह है : केन्द्र तो अज्ञात है। केन्द्र पर चलना है तो ज्ञात को छोड़ना अपरिहार्य है।

‘मैं जानता हूँ’ यह भाव ज्ञान के आने में बाधा है। जानने पर तो जाना जाता है कि मैं हूँ ही नहीं। यह ‘मैं जानता हूँ’ बौद्धिक भ्रांति है। विचारों के उधार और पराये और मृत विचारों के, संग्रह से यह भ्रांति पैदा होजाती है। इस मृत ढेर को जो एक और उठाकर रख सकता है और धारणाशून्य, विचार शून्य और मुक्त खड़ा होसकता है : सत्य उसमें अवतरित होजाता है।

सत्य को अपने में आने देने की शर्त शून्य होना है।

२२. १०. ६२

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: मां, कैसी हो लिखना? मैं कल गाड़रवारा जारहा हूँ और ३१ अक्तूबर तक वहां रुकूँगा। शेष शुभ। सबको प्रणाम।


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 092 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.