Letter written on 22 Sep 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 22nd September 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the top right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (133) and replaced by a pink number, 135.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 103 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition), on p 158.

In PS Osho writes: "The letter of Shree Kothari Ji has come - from which, it is known that your health is good. But your letter is not to be found at all?"

Letters to Anandmayee 926.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

२२/९/६२

प्रिय मां,
“मैं साधक हूँ। आध्यात्मिक साधना में लगा हूँ। क्रमशः, गति होती जारही है : एक दिन प्राप्ति भी हो जाने को है।“

एक साधु ने एक दिन मुझसे यह कहा था।

यह साधना भी बाधा है। जो है उसे पाने को अभ्यास क्या करना है। उसे पाना भी तो नहीं, यही जानना है कि वह खोया ही नहीं गया है। और साधना का उपक्रम इस सत्य को छिपा देता है। साधना का अर्थ है कुछ बदलना। ‘मैं जो हूँ, उसे बदलना है। ‘अ’ को ‘ब’ बनाना है। समस्त वासना के मूल में यही द्वन्द्व होता है : यही द्वैत होता है। यह द्वैत ही जगत है और दुख है। कुछ भी बदलना नहीं है : कुछ भी सुधारना नहीं है वरन्‌ जो है उसके प्रति सम्यक्‌ जाग्रति लानी है। कुछ करना नहीं, केवल जागना है। ‘करने’ का भ्रम ही बंधन है। वही अहंकार है।

बन्केई ने कहा है : “तुम जो हो उससे जरा भी कुछ और होने ही आकांक्षा यदि है तो तुम ‘जो है’ उसके विपरीत जा रहे हो” और ‘जो है’, वही मार्ग है। ‘जो है’ उसके प्रति जागते ही जीवन एक सहजता और सौंदर्य से भर जाता है। एक स्वतंत्रता और मुक्ति स्वांस स्वांस में भर जाती है। यह सौंदर्य साधक को कभी उपलब्ध नहीं होता है। उसमें एक हिंसा, एक दमन और कुछ होने की वासना के लक्षण सहजता को नष्ट कर देते हैं। इसलिए, एक कुरूपता समस्त तथाकथित साधुओं में होती है।

फिर क्या करें? कुछ भी नहीं। न करना – कुछ भी न करना – ध्यान है। कर्म में स्व नहीं है, विचार में स्व नहीं है। कर्म और विचार के बाहर होते ही वह आविष्कृत होजाता है। सब छोड़ दो – सब मिट जाने दो – सब विलीन होजाने दो और फिर इस न कुछ में – इस शून्य में जो दीखता है वही सब कुछ है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च:
श्री कोठारी जी का पत्र आया है। उससे ज्ञात हुआ है कि स्वास्थ्य आपका अब ठीक है। पर तुम्हारे पत्र का तो मां, कोई पता ही नहीं है?


See also
Krantibeej ~ 103 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.