Letter written on 23 Aug 1961 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written in the afternoon of 23rd August 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is just plain "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (18) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue mirror-image "43" at the top in the middle.

Letters to Anandmayee 839.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

दोपहर:
२३ अगस्त ‘६१

मां,
पहाड़ियों के नीचे झील के पास बरसात के फूल खिले हैं। झील ढ़ंकी है कमल के पत्तों और सिंगाडे की बेलों से। दो चार खाली डोंगियां झील तट पर बंधी हैं।

सूरज बदलियों के घूंघट में है और हम विश्राम करने आम्रकुँज में रुके हुए हैं।

यह शांति कैसी अद्भूत है : कोई पक्षी कभी गाता है पर शांति उससे तूटती नहीं और गहरा जाती है।

एक रजत धवल केशों वाले बूढ़े मित्र साथ हैं। उनका जीवन अशांति में गया है। सब कुछ है : कोई कमी नहीं है पर वह सब व्यर्थ है क्योंकि शांति नहीं है। शांति कैसे आए; यही पूछने आए हैं। बैठते ही – ठीक से बैठ भी नहीं पाये कि उन्होंने अपना प्रश्न पूछा है।

“मन अशांत है। उसे शांत और स्वस्थ करना चाहता हूँ। कैसे यह होगा?”

मैं कहता हूँ : ”मन और अशांति, मन और अस्वास्थ दो बातें नहीं है। मन ही अशांति है। मन ही अस्वास्थ है। वह जबतक है अशांति नहीं जा सकती है। मन को छोड़ना होता है : वह गया कि हम स्वस्थ – स्व-स्थित हो जाते हैं। मन क्या है? मन है विचार प्रक्रिया। विचार, विचार, विचार – इन सब का जोड़ मन है। मन कोई वस्तु नहीं है, वह केवल एक क्रिया है। विचारों के बीच में रिक्त स्थान हैं : वहीं हम हैं। उस रिक्तता को देखना और उसमें रुकना है। स्व को पाने और पहुँचने का द्वार उस रिक्तता में है। वहां गये कि हम पाते हैं कि मन नहीं है। प्रकाश आते ही जैसे अंधेरा चला जाता है। रिक्तता में उतरते ही, वैसे ही, मन चला जाता है। शून्य में, रिक्त में उतरने की यह स्थिति ही ध्यान है। यह कठीन नहीं है – अभी और इसी क्षण – संभव है। थोड़ा सा जागें और अशांति को नहीं उसे देखें जो कि अशांत है। उसके देखते ही जैसे मेघ से पानी गिरता है वैसे ही चेतना पर शांति बरस जाती है।“

रजनीश के प्रणाम


See also
Letters to Anandmayee ~ 15 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.