Letter written on 24 May 1962 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 24 May 1962 afternoon in Gadarwara.

This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 88 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 219-220 (2002 Diamond edition: year of letter in the book is incorrect - 1963).

The PS of this letter from Gadarwara, reads: "As I have come home, it's all leisure. In Jabalpur I get surrounded - having come here it is known that you are with me for twenty four hours! You are with me, there too - but I am unable to see. But here you only are seen. Got up after sleeping - was reminded hence sat to write the letter."

Letters to Anandmayee 1001.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

गाडरवारा
दोपहर: २४ मई १९६२

प्यारी मां,
कल रात्रि देरतक नदी तट पर था। नदी की धार चांदी के फीते की भांति दूर तक चमकती चली गई है। एक माझी डोंगी को खेता हुआ आया था और देर से बोलते हुए जल-पक्षी चुप हो गये थे।

एक मित्र साथ थे। उन्होंने एक भजन गाया था और फिर बात ईश्वर पर चली गई थी। गीत में भी ईश्वर की खोज की बात थी। जिन्होंने इसे गाया था उनके जीवन के अनेक बर्ष ईश्वर की तलाश में ही गये हैं। मेरा परिचय उनसे कल ही हुआ था। विज्ञान के स्नातक हैं और फिर किसी दिन ईश्वर की धुन ने उन्हें पकड़ लिया था। तब से अनेक बर्ष उसी धुन में गये हैं पर कुछ उपलब्ध नहीं हुआ है।

मैं भजन को सुनकर चुप था। उनकी आवाज मधुर थी और मन को छूती थी। फिर भजन के पीछे हृदय था और उस कारण गीत जीवित होउठा था। मेरे मन में उसकी प्रतिध्वनि गूंज रही थी पर उन्होंने इस मौन को तोड़कर अनायास पूछा था कि ‘यह ईश्वर की तलाश कहीं भ्रम ही तो नहीं है? पहले मैं आशा से भरा था, पर फिर धीरे-धीरे निराश होता गया हूँ।’

मैं फिर थोड़ी देर चुप रहा और बाद में कहा : “ईश्वर की तलाश भ्रम ही है क्योंकि ईश्वर खोजने का प्रश्न ही नहीं है। वह सदा ही उपस्थित है। पर हमारे पास उसे देख सके ऐसी आंखें नहीं हैं इसलिए असली खोज सम्यक्‌ दृष्टी को पाने की है। एक अंधा आदमी था। वह सूरज को खोजना चाहता था। वह खोज गलत थी। सूरज तो है ही : आंखें खोजनी है। आंखें पाते ही सूरज मिल जाता है। साधरणतः, ईश्वर का तलाशी सीधे ईश्वर को खोजने में लग जाता है। वह अपनी आंखों का विचार ही नहीं करता है। यह आधारभूत भूल परिणाम में निराशा लाती है।

मेरा देखना विपरीत है। मैं देखता हूँ कि असली प्रश्न मेरा है और मेरे परिवर्तन का है। मैं जैसा हूं, मेरी आंखें जैसी हैं, वही मेरे ज्ञान की और दर्शन की सीमा है। मैं बदलूँ, मेरी आंखें बदलें, मेरी चेतना बदले तो जो भी अदृश्य है, वह दृश्य होजाता है। और फिर जो अभी हम देख रहे हैं उसकी ही गहराई में ईश्वर उपलब्ध हो जाता है। संसार में ही प्रभु उपलब्ध होजाता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि धर्म ईश्वर को पाने का नहीं, वरन नयी दृष्टि, नयी चेतना पाने का विज्ञान है। प्रभु तो है ही, हम उसमें ही खड़े हैं, उसमें ही जी रहे हैं – पर आंखें नहीं हैं इसलिए सूरज दिखाई नहीं देता है। सूरज को नहीं आंखों को खोजना है।“

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: घर आया हूँ तो फूरसत ही फूरसत है। जबलपुर घिरा रहता हूँ : यहां आकर पता चला है कि तुम तो चौबीस घंटे साथ हो! वहां भी साथ ही रहती हो : मैं नहीं देख पाता हूँ। पर यहां तो तुम ही तुम दीख रही हो। सोकर उठा हूँ : स्मरण आया, सो पत्र लिखने बैठ गया हूँ।


See also
Krantibeej ~ 088 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.