Letter written on 24 Nov 1962 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 24th November 1962 in the afternoon. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are two of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner, with actually more than one number, but the first crossed out a couple of times, leaving the final number 150.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 67 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 177). Note that the date is incorrect in the book, having a wrong month, March instead of November.

The PS reads: "Your letter is received. You are fasting - why didn't write earlier? Because of fear that I would stop - that's incorrect - if the fear would be there you wouldn't be doing it! But now you have already kept, so it is good - praying that your health remains good."

Letters to Anandmayee 944.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
एक प्रवचन कल सुना है। उसका सार था : आत्म-दमन। प्रचलित रूढ़ि यही है। सोचा जाता है कि सबसे प्रेम करना है पर अपने से – अपने से घृणा करनी है। स्वयं अपने से शत्रुता पैदा करनी है तब कहीं आत्म-जय होती है। पर यह विचार जितना प्रचलित है उतना ही गलत भी है। इस मार्ग से व्यक्तित्व द्वैत में टूट जाता है और आत्म-हिंसा की शुरूआत हो जाती है। और हिंसा सब कुरूप कर देती है।

मनुष्य की वासनायें इस तरह दमन नहीं करनी हैं – न कीजासकती हैं। यह हिंसा का मार्ग धर्म का मार्ग नहीं है। इसके परिणाम में ही शरीर को सताने के कितने रूप विकसित हो गये हैं। उनमें दीखती है तपश्चर्या, पर है वस्तुतः हिंसा का रस – दमन और प्रतिशोध का सुख। यह तप नहीं, आत्म-वंचना है।

मनुष्य को अपने से लड़ना नहीं, अपने को जानना है। पर जानना अपने को प्रेम करने से शुरू होता है। अपने को सम्यक्‌ रूपेण प्रेम करना है : न तो वासनाओं के पीछे अंधा होकर दौड़ने वाला अपने को प्रेम करता है – न वासनाओं से अंधा होकर लड़ने वाला अपने को प्रेम करता है। वे दोनों अंधे हैं और पहले अंधेपन की प्रतिक्रिया में दूसरे अंधेपन का जन्म होजाता है। एक वासनाओं में अपने को नष्ट करता है; एक उनसे लड़कर अपने को नष्ट कर लेता है। वे दोनों अपने प्रति घृणा से भरे हैं। ज्ञान का प्रारंभ अपने को प्रेम करने से होता है।

मैं जो भी हूँ उसे स्वीकार करना है – उसे प्रेम करना है और इस स्वीकृति और इस प्रेम में ही वह प्रकाश उपलब्ध होता है जिससे सहज सब कुछ परिवर्तित होजाता है। इससे ही एक अभिनव सौंदर्य का व्यक्तित्व में उदय होता है – एक संगीत का और एक शांति का और एक आनंद का – जिनके समग्रीभूत प्रभाव का नाम आध्यात्मिक जीवन है।

दोपहर:
२४ नव. १९६२

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: आपका पत्र मिला है। उपवास कर रही हैं – पहले क्यों नहीं लिखा? इस डरसे कि मैं रोकूंगा – झूठी बात है डर होता तो करती ही नहीं! पर अब किया ही है तो अच्छा है – स्वास्थ्य अच्छा हो यही प्रार्थना करता हूँ।


See also
Krantibeej ~ 067 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.