Letter written on 24 Sep 1961

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 24th September 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font. There is a PS on the back side of this letter, arranged so that the showing-through is to the side of the main letter, and the two writings do not interfere with each other.

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (22) in a circle in the top right corner and a red tick mark, plus it is following a trend set by Letter written on 2 Sep 1961 pm: A second number found on the backs of many letters, but seen as faint and mirror-image because of that, has been moved to the front side of the letter ("48" in this case, in the bottom right corner).

At the end of Jain's 'Paryushan Parv' of 8 days 'Kshama Vani' and 'Samvatsari Parv' are celebrated. On this day forgiveness (kshama) is sought from all for the possible mistakes / harms might be done to each other. This festival was on 15th Sep as per 1961 calendar. In PS of this letter written after above festival, Osho writes to Ma: "received 'Kshama-Vani' letters from you and Parakhji. I will disappoint only - don't even remember for what to forgive? And why do I seek - that too is not understood (because in asking there is a blame, in case you have angered!). Well it's ok you sent (kshama-vani) - I am not going to send anything."

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रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

२४ सित. १९६१

प्रिय मां,
दोपहर ढ़ल गई है। सांझ का मार्ग आकाश पर बन रहा है। लाल-पीली बदलियां पश्चिम कोने पर फैलती जा रही हैं और पश्चिम में उतरता सूरज कभी दीखता है कभी छुप जाता है।

कुछ मित्र मिलने आए हैं। ईश्वर के तलाशी हैं। एक ही उनकी चिन्ता है : ईश्वर को कैसे पाया जा सकता है?

मैं कहता हूं : “खोज छोड़ दो। जबतक खोज है तबतक उसे नहीं पाया जासकता है। खोज का तनाव ही – पाने की वासना ही बाधा बन जाती है। ईश्वर दूर होता तो उसतक चलना होता तब खोज की बात थी। वह तो भीतर है : निकट से भी निकट वह है। वही है बस। ऐसी स्थिति में चलेंगे तो दूर निकल जायेंगे। रुक जायें। मन में रुक जायें। यही पा लेना है। रुकना ही ध्यान है। ध्यान द्वार है। द्वार खुला प्रभु के दर्शन हो जाते हैं।”

यह छोटी सी बात समझ जाये तो सब समझ में आ जाता है। खोज गई – दौड़ गई – शांति आजाती है। शांति को लाना नहीं पड़ता है। दौड़ की व्यर्थता दीखते ही वह आजाती है। पहिले मन संसार में दौड़ाता है फिर वही मन मोक्ष में दौड़ाने लगता है। मन के रास्ते बड़े सूक्ष्म हैं : जब उसकी यह चाल दीखती है तो सब बंधन गिर जाते हैं। संसार भी गिर जाता है : मोक्ष भी गिर जाता है। इस स्थिति में, न संसार की, न मोक्ष की, परमात्मा प्रगट होता है।

रजनीश के प्रणाम

पुनश्च:
आपका और पारखजी का क्षमा-वाणी पत्र मिला है। मैं तो निराश ही करूँगा। याद ही नहीं पड़ता काहे की क्षमा दूँ? और मांगू – यह भी समझ नहीं आता। (क्योंकि मांगने में आपने क्रोध किया होगा – इसकी लांछना जो है!) खैर – भेजा सो ठीक किया : मैं तो नहीं कुछ भेजने को हूँ। पारखजी को मेरे प्रणाम कहें। शेष शुभ। मैं आनंद में हूँ।


See also
Letters to Anandmayee ~ 19 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.