Letter written on 24 Sep 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 24th September 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a couple of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the top right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. As with some other recent letters, there are actually two numbers there, one crossed out (134) and replaced by a pink number, 136.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 104 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition), on p 159-160.

In PS Osho writes: "How is the health? You are very angry on me, I think; because there is no letter since long time. A letter of Shree Kothari Ji has come - he wants copies of the letters written to you. If copies can be managed give them - or else some arrangement can be made to publish them after few days."

Letters to Anandmayee 928.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

२४/९/६२

प्यारी मां,
एक चीनी प्रबोध कथा है।

एक युवक ने सेंग सान से पूछा था : “मोक्ष की विधि क्या है?”

सेंग सान ने कहा : “तुम्हें बांधा किसने है?”

वह युवक एक क्षण रुका फिर बोला : “बांधा किसीने भी नहीं है।”

“तब,” सेंग सान ने पूछा – “फिर, मुक्ति क्यों खोजते हो?”

“मुक्ति क्यों खोजते हो?” यही कल मैने भी एक युवक से पूछा है। यही प्रत्येक को अपने से पूछना है। बंधन है कहां? जो है उसके प्रति जागो। जो है उसे बदलने की फिक्र छोड़ो। आदर्श के पीछे मत दौड़ो। जो भविष्य में है, वह नहीं; जो वर्तमान है, वही तुम हो। और वर्तमान में कोई बंधन नहीं है। वर्तमान के प्रति जागते ही बंधन नहीं पाये जाते हैं। आकांक्षा, कुछ होने और कुछ पाने की आकांक्षा ही बंधन है। आकांक्षा सदा भविष्य में है। आकांक्षा सदा कल है। वही बंधन है, वही तनाव है, वही दौड़ है, वही संसार है। यह आकांक्षा ही मोक्ष का भी निर्माण करती है। मोक्ष पाने के मूल में वही है। और बंधन मूल में हो तो परिणाम में मोक्ष कैसे होसकता है? मोक्ष की शुरुआत मुक्त होने से करनी होती है। वह अंत ही नहीं, वही प्रारंभ भी है।

मोक्ष पाना नहीं है वरन्‌ दर्शन करना है कि मैं मोक्ष में ही खड़ा हूँ। मैं मुक्त हूँ, यह बोध शांत जाग्रत चेतना में सहज ही उपलब्ध होजाता है। प्रत्येक मुक्त है, केवल इस सत्य के प्रति जागना मात्र है।

मैं जैसे ही दौड़ छोड़ता हूँ – कुछ होने की दौड़ जैसे ही जाती है कि मैं होआता हूँ और ‘होआना’ – पूरे अर्थां में होआना ही मुक्ति है। तथाकथित धार्मिक व्यक्ति इस ‘होआने’ को नहीं पा पाता है क्योंकि वह दौड़ में है – मोक्ष पाने की, आत्मा को पाने की, ईश्वर को पाने की। और जो दौड़ में है – चाहे उस दौड़ का रूप कुछ भी क्यों न हो – वह अपने में नहीं है। धार्मिक होना आस्था की बात नहीं, किसी ध्यान की बात नहीं, किसी क्रिया की बात नहीं : धार्मिक होना तो अपने में होने की बात है।

और यह मुक्ति एक क्षण मात्र में आसकती है : इस सत्य के प्रति सजग होते ही, जागते ही कि बंधन दौड़ में है, आकांक्षा में है, आदर्श में है – अंधेरा गिर जाता है और जो दीखता है उससे बंधन पाये ही नहीं जाते हैं।

सत्य एक क्षण में ही क्रांति कर देता है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: स्वास्थ्य कैसा है? मुझपर बहुत नाराज हैं! सोचता हूँ, क्योंकि एक अरसे से पत्र जो नहीं है। कोठारी जी का पत्र आया हैं। आपको लिखे गये मेरे पत्रों कि प्रति चाहते हैं। प्रति होसके तो दे दें अन्यथा थोड़े दिनों बाद उनके प्रकाशन की ही कोई व्यवस्था की जासकती है।


See also
Krantibeej ~ 104 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.