Letter written on 25 Jun 1963 am

From The Sannyas Wiki
Jump to: navigation, search

This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 25th June 1963 in the morning. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is a simple "मां", Maan, Mom or Mother. There is only one of the hand-written marks seen in other letters, a black tick mark up top and that too a bit odd, with an extra stroke, making it partly doubled, sort of.

The feature of this letter that stands out visually is the colour(s) of the ink. Prior to this letter, all letters have been in all black. This one is mostly blue, with three sentences in red as well, presumably for emphasis.

This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 15 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 228.

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

प्रभात:
२५ जून १९६३

मां,
एक बैलगाड़ी निकलती है। उसके चाक देखता हूँ। धुरी पर चाक घूमते हैं। जो स्वयं थिर है, उस पर चाकों का घूमना है। गति के पीछे स्थिर बैठा हुआ है। क्रिया के पीछे अक्रिया है। सत्ता के पीछे शून्य का वास है!

ऐसे ही एक दिन देखा था धूल का एक बवंडर। धूल का गुब्बारा चक्कर खाता हुआ ऊपर उठ रहा था – पर बीच में एक केंद्र था जहां सब शांत और थिर था!

क्या जगत्‌ का मूल सत्य इन प्रतीकों में प्रगट नहीं है?

क्या समस्त सत्ता के पीछे शून्य नहीं बैठा हुआ है?

क्या समस्त क्रिया के पीछे अक्रिया नहीं है?

शून्य ही सत्ता का केंद्र और प्राण है। उसे ही जानना है। उसमें ही होना है क्योंकि वही हमारा वास्तविक होना है। जो प्रत्येक अपने केंद्र पर है वही प्रत्येक को होना है। कहीं और नहीं, जहां हम हैं, वहीं हमें चलना है।

यह होना कैसे हो?

उसे देखो जो ‘देखता है’ और शून्य में उतरना होजाता है। ‘दृश्य’ से ‘दृष्टा’ की ओर चलना है। दृश्य है रूप, क्रिया, सत्ता। दृष्टा है अरूप, अक्रिया, शून्य। ‘दृश्य’ है पर, अनित्य, संसार, बंधन, अमुक्ति, आवागमन। ‘दृष्टा’ है स्व, नित्य, ब्रह्म, मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण। देखो – जो देखता है, उसे देखो। यही समस्त योग है।

यह रोज कह रहा हूँ या जो भी कह रहा हूँ उसमें यही है।

रजनीश के प्रणाम

Letters to Anandmayee 897.jpg


See also
Krantibeej ~ 015 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.