Difference between revisions of "Letter written on 26 Jul 1961"

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written on 26th July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
 
This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written on 26th July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
  
 
Osho's salutation in this letter is again just a simple, unadorned "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (10) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure which reads "35" in a mirror (Devanagari characters).
 
Osho's salutation in this letter is again just a simple, unadorned "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (10) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure which reads "35" in a mirror (Devanagari characters).
  
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एक चिल बदलियों में चक्कर काट रही है। अकेली – चक्कर, चक्कर, चक्कर। गहरा अकेलापन छाया हुआ है।
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एकाकी होना मनुष्य की पीड़ा है। उससे बचने को ही उसके सब आयोजन है। प्रेम, परिग्रह, परमात्मा सब अकेलेपन से पलायन हैं। पर कितना ही कोई भागे अकेले होने का भाव वापिस आ जाता है। सब तरफ ढांक लो पर कोई छोटा सा छिद्र सब प्रगट कर देता है।
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पलायन हल नहीं लाता है : संघर्ष, अशांति और दुख ही उससे आते हैं। रुकना आवश्यक हैं – ठहरें और देखें। अकेलेपन में गहरें उतर जायें। भागना छोड़ उसके साथ हो लें। आने दें – उसके गले में हाथ डाल लें। एकांत – सब चुप और मौन – बस एक नये जीवन का जन्म हो जाता है।
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अकेला होना जिसे आ गया – जीवन का दुख और भार उसका चला जाता है। इस माध्यम से सहज ही सब कुछ मिल जाता है। प्रारंभ में जो खोना है अंत में वही प्राप्ति है।
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Revision as of 12:17, 15 February 2020

This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parekh. It was written on 26th July 1961. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is again just a simple, unadorned "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (10) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure which reads "35" in a mirror (Devanagari characters).

Letters to Anandmayee 827.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

२६.७.६१

मां,
दोपहर ढ़लने को है। घनी धूप में छोटी छोटी सफेद बदलियां नीले आकश में तैर रही हैं। हवा बंद सी है – कभी कोई झोका सूर्य तप्त वृक्षों को हिला जाता है।

एक चिल बदलियों में चक्कर काट रही है। अकेली – चक्कर, चक्कर, चक्कर। गहरा अकेलापन छाया हुआ है।

एकाकी होना मनुष्य की पीड़ा है। उससे बचने को ही उसके सब आयोजन है। प्रेम, परिग्रह, परमात्मा सब अकेलेपन से पलायन हैं। पर कितना ही कोई भागे अकेले होने का भाव वापिस आ जाता है। सब तरफ ढांक लो पर कोई छोटा सा छिद्र सब प्रगट कर देता है।

पलायन हल नहीं लाता है : संघर्ष, अशांति और दुख ही उससे आते हैं। रुकना आवश्यक हैं – ठहरें और देखें। अकेलेपन में गहरें उतर जायें। भागना छोड़ उसके साथ हो लें। आने दें – उसके गले में हाथ डाल लें। एकांत – सब चुप और मौन – बस एक नये जीवन का जन्म हो जाता है।

अकेला होना जिसे आ गया – जीवन का दुख और भार उसका चला जाता है। इस माध्यम से सहज ही सब कुछ मिल जाता है। प्रारंभ में जो खोना है अंत में वही प्राप्ति है।

रजनीश
के
प्रणाम


See also
(?) - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.