Letter written on 26 Sep 1961 pm

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 26th September 1961 in the evening. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a simple "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (23) in a circle in the top right corner and a red tick mark, plus it is following a trend set by Letter written on 2 Sep 1961 pm of a second number (49) in the bottom right corner.

Letters to Anandmayee 847.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

मां,
नगर सो गया है : मार्ग, मार्ग के किनारे दिनभर के थके मांदे वृक्ष भी सो गये हैं। बर्षा की फुहार पड़कर बन्द हो गई है। काली-मटमैली बदलियां छट रही हैं और पूरब के कोने में सद्यस्नात तारे चमकने लगे हैं।

चांद पर बदलियां दौड़ रही हैं और उसका प्रकाश एक बड़े धब्बे सा मालुम होरहा है।

इन क्षणों में – इन मौन और निस्तब्ध के क्षणों में मैं ईश्वर के आमने-सामने होआता हूं। समय मिट जाता है, अनंतता प्रगट होआती है। समय में मृत्यु है : समय के अतीत जीवन है।

समयातीत स्थिति ही समाधि है।

एक मित्र ने कल ही पूछा था : “इस स्थिति को पायें कैसे?” मैंने कहा: “पाने की दौड़ ही बाधा है। पाने की वांछा की तनाव है; जब चित्त पाने और कुछ होने से मुक्त होता है तब समाधि उतर आती है। समाधि को पाया नहीं जाता है। उसे निमंत्रित भी नहीं किया जाता है। वह तो बिना बुलाया अतिथि है। अपने से ही आ जाती है। दौड़ ही मन है। दौड़ नहीं; मन नहीं। मन का न होजाना समाधि है। संसार छोड़, मोक्ष की दौड़ नहीं दौड़नी है। अशांति छोड़, शांति पाने में नहीं लग जाना है। दौड़ का परिवर्तन नहीं, दौड़ का आमूल विसर्जन आवश्यक है। यह जिस दिन समझ में आजाता है; उस दिन कुछ करना नहीं होता है – बस पाया जाता है कि दौड़ चली गई है और हम शांत होआये हैं। फिर “मैं” शांत हूँ “ऐसा नहीं” “शांति ही है” ऐसा मालुम होता है। मैं मिट जाता है, शांति ही बाकी रह जाती है। ईश्वर को जानना वही है।“

ईश्वर को पाना कितना सरल है, कितना निकट और मजा है हम उसे ही खोये बैठे हैं!

रजनीश के प्रणाम

रात्रि:
२६ सित. १९६१


See also
Letters to Anandmayee ~ 20 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.