Letter written on 27 Dec 1960

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 27th December 1960 on his personal letterhead stationery of the day: The top left corner reads: Rajneesh / Darshan Vibhag (Philosophy Dept) / Mahakoshal Mahavidhalaya (Mahakoshal University). The top right reads: Nivas (Home) / Yogesh Bhavan, Napiertown / Jabalpur (M.P.). Many of his letters on this letterhead have had the number 115 added in by hand before "Yogesh Bhavan" to complete his address; this is not one of them.

As with a number of letters of this vintage, there is a blue number (5) in a circle in the top right corner, but it is crossed out. A further oddity when compared with others of this era is that a red tick mark which appears on some of the others does so here as well, but in a different place, on the right side rather than on the left above Osho's salutation -- "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom.

This letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 70 (2002 Diamond edition).

Letters to Anandmayee 794.jpg

रजनीश                   निवास:
दर्शन विभाग              योगेश भवन, नेपियर टाउन
महाकोशल महाविद्यालय         जबलपुर (म. प्र.)

प्रिय मां,
पद-स्पर्श। आपका आशीष-पत्र। वह भी मिला जो लिखा है और वह भी जो अनलिखा छूट जाता है। अनलिखा तो प्राण है। दीखता शरीर ही है पर अपने में इसका कोई मूल्य नहीं है। वह है मूल्यवान उसके कारण जो पीछे है पर दीखने में नहीं आता है। जीवन के इस महाकाव्‍य में प्रगटीकरण केवल क्षुद्र का है : विराट अप्रगट है। मैं तो उन अक्षरों को पढ़ना सीख गया हूँ जो दीखते नहीं है और वे संदेश मुझे हरक्षण घेरे रहते हैं, प्रगटत: जो कहीं से भी दिये नहीं गये हैं। इस तरह अदृश्य से मैत्री बन रही है और प्रभु का सानिध्य अनुभव हो रहा है।

यह रहस्यानुभव उठते – बैठते – सोते – जागते चित्त-द्वार पर बना रहता है। आंखें बंद न हों तो यह अनुभूति प्रत्येक को होगी। आंखें खोलने की ही बात है। यही है 'दर्शन'। दर्शन मिला तो द्वार खुल जाते हैं : ताले टूट जाते हैं। जगत की बंद किताब अपना अर्थ खोल देती है। राह के किनारे पड़े सारे कंकड़ पत्थर 'उसकी' ही प्रतिमा बन जाते हैं।

मैं इसी आनंद में हूँ। आप कहती हैं : इसे बांटूँ। मेरे रोके क्या यह रूकेगा? यह तो बहेगा ही। यह तो सब तक पहुँचेगा ही। यह 'मेरा' कहां है जो इसे बंद कर लूँगा? मैं तो बांस की बांसुरी बनना चाहता हूँ : स्वर तो उसी के हैं। वह मुझसे गाना चाहता है तो क्या मैं रोक सकता हूँ?

***

सबको मेरे प्रणाम।

शारदा, शांता, प्रदीप और पदम-शांतिलाल एंड कं. को मेरा स्नेह।

आपका अपना
रजनीश
२७ दिस.१९६०


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 013 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.