Letter written on 27 Nov 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 27th November 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are two of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner, with actually two numbers, an unreadable one crossed out and 151.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 82 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 178).

Letters to Anandmayee 945.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
आंख बन्द किये बैठा था। आंखों से देखते देखते मनुष्य आंखें बन्द करके देखना ही भूलता जारहा है। जो आंख से दीखता है वह उसके समक्ष कुछ भी नहीं है जो आंख बन्द करके दीख आता है। आंख का छोटा सा पर्दा दो दुनियाओं को अलग करता और जोड़ता है।

मैं आंखें बंद किये बैठा था कि एक व्यक्ति आये हैं। पूछ रहे हैं कि मैं क्या कर रहा था? और जब मैं कहता हूँ कि कुछ देख रहा था तो वे हैरान से हैं : शायद, इसलिए कि सोचते होंगे कि आंख बन्द करके देखना भी क्या देखना कहा जासकता है!

आंख खोलता हूँ तो सीमा में आजाता हूँ : आंख मोड़ता हूँ तो असीम के द्वार खुल जाते हैं। इस ओर दृश्य दीखते हैं : उस ओर दृष्टा ही दीख आता है।

एक फकीर स्त्री थी : राबिआ। एक सुन्दर प्रभात में किसी ने उससे कहा था : ‘राबिआ, भीतर झोपड़े में क्या कर रही हो यहां आओ बाहर; देखो, प्रभु ने कैसे मनोरम प्रभात को जन्म दिया है।’ राबिआ ने भीतर से ही कहा था : “तुम बाहर जिस प्रभात को देख रहे हो, मैं भीतर उसके ही बनाने वाले को देख रही हूँ : मित्र, तुम ही भीतर आजाओ और जो वहां है उसके सौंदर्य के आगे बाहर के किसी सौंदर्य का कोई अर्थ नहीं है।“

पर कितने हैं जो आंख बंद करके भी बाहर ही नहीं बने रहेंगे? अकेले आंख बंद करने से ही आंख बन्द नहीं होती है। आंख बंद है पर चित्र बाहर के ही बहे जाते हैं। पलक बंद हैं पर दृश्य बाहर के ही उभरे जारहे हैं। यह आंख का बंद होना नहीं है। आंख के बंद होने का अर्थ है : शून्यता। स्वप्नों से, विचारों से मुक्ति। विचार और दृश्य के विलीन होने से आंख बंद होती है और फिर जो प्रगट होता है वह शाश्वत चैतन्य है : वही है सत्, वही है चित्, वही है आनंद।

इन आंखों का सब खेल है : आंख बदली और सब बदल जाता है।

२७.११.६२

रजनीश के प्रणाम


See also
Krantibeej ~ 082 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.