Letter written on 27 Sep 1963 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 27th September 1963 in the afternoon. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the left of and oriented 90º to the rest, which reads:

115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are none of the hand-written marks seen in other letters. The ink used is mostly black, with three sentences in red. The letter published in Jeevan-Darshan (जीवन दर्शन) (letters) as letter #1, Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter #3 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 249 (2002 edition; date in the books is incorrect - "7 Dec 1963 om"). PS left out in both books.

While concluding the letter Osho writes: "I am in bliss. You are coming to Multai - this imagination gives happiness. Rajneesh Ke Pranam" The PS reads: "I had just finished writing this letter when the telegram arrived. This is not good - I only thought of Multai with you - now it would be felt lonely there! What untimely falling sick by Parakh Ji? - he could have, even after a day or so? Write what has happened - I am worried."

आचार्य रजनीश

११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

प्रिय मां,
एक मंदिर गया था। पूजा होरही थी। मूर्तियों के सामने सिर झुकाये जा रहे थे। कुछ वृद्ध साथ थे; बोले : “धर्म में लोगों की अब श्रद्धा न रही।” मैंने पूछा : “धर्म ही कहां है?”

मनुष्य भी कैसा आत्म वंचक है! अपने ही हाथों से बनाई मूर्तियों को भगवान समझ स्वयं को धोखा दे लेता है! मन से रचित शास्त्रों को सत्य समझकर तृप्ति कर लेता है!

मनुष्य के हाथों और मनुष्य के मन से जो भी रचित है वह धर्म नहीं है। मंदिरों में बैठी मूर्तियां भगवान की नहीं, मनुष्य की ही हैं और शास्त्रों में लिखा हुआ मनुष्य की अभिलाषाओं और विचारणाओं का प्रतिफलन है, सत्य का अन्तर्दर्शन नहीं। सत्य को मूर्त में बांधना संभव नहीं है। वह असीम, अनन्त और अमूर्त है। उसकी न कोई मूर्ति है; न कोई धारणा है; न कोई रूप है; न कोई नाम है।

उसे पाने के लिए सब मूर्तियां और सब मूर्त धारणायें छोड़ देनी पड़ती हैं। मन निर्मित कल्पनाओं के सारे जाल तोड़ देने पड़ते हैं। वह असृष्ट तब प्रगट होता है जब चेतना मनुष्य सृष्ट कारा से मुक्त होजाती है।

वस्तुतः, उसे पाने को मंदिर बनाने नहीं, मिटाने पड़ते हैं। मूर्तियां गढ़नी नहीं, भंजन करनी पड़ती हैं! मन से मूर्तियों के हटते ही वह अमूर्त प्रगट हो जाता है। वह तो था ही। केवल मूर्तियों में दब गया था। जैसे किसी कक्ष में सामान रख देने से ‘खाली स्थान’ दब जाता है। सामान हटाओ और वह जहां था वही हैं! ऐसा ही है सत्य – मन को खाली करो और वह है।

xxx

मैं आनंद में हूँ। मुल्ताई आरही हैं : यह कल्पना सुख देरही है।

दोपहर :
२७ सित. १९६३

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: पत्र लिखकर चुका ही था कि तार आगया है। यह तो अच्छा न किया! मैं तो मुल्ताई की तुम्हारे साथ ही कल्पना किया था अब वहां बहुत अकेला-अकेला लगेगा! पारख जी को भी बीमार होने की यह क्या असमय सूझी? एकाध दिन बाद भी तो होसकते थे? लिखना क्या हुआ है : चिंतित हूँ।

Letters to Anandmayee 909.jpg


See also
Krantibeej ~ 003 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.