Letter written on 28 Mar 1963 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 28th March 1963 in the morning. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. Of the hand-written marks seen in other letters, it has a black tick mark and a faint, almost-readable mirror-image number in the bottom right corner, which looks enough like 177 to accept provisionally that that's what it is. This letter has been published in Jeevan-Darshan (जीवन दर्शन) (letters) as letter #5, Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 10 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 211.

The PS reads: "Jaya Bahin has written that she has already written two letters to you, but there is no reply. Reply to her. Rest OK. My pranam to all."

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

प्रिय मां,

‘मैं ईश्वर-भीरू नहीं हूँ।

मैं किसी अर्थ में श्रद्धालु भी नहीं हूँ।

मैं किसी धर्म का अनुयायी भी नहीं हूँ।’

कल जब मैंने यह कहा तो किसी ने पूछा : ‘फिर क्या आप नास्तिक हैं?’

‘मै न नास्तिक हूँ, न आस्तिक हूँ। वे भेद सतही और बौद्धिक हैं, सत्य से और सत्ता से उनका कोई सम्बंध नहीं है। सत्ता ‘है’ और ‘न है’ में विभक्त नहीं है। वह भेद मन का है। इसलिए, नास्तिकता और आस्तिकता दोनों मानसिक हैं। आत्मिक को वे नहीं पहुँच पाती हैं। आत्मिक विधेय और नकार दोनों का अतिक्रमण कर जाता है। ‘जो है’ वह विधेय और नकार के अतीत है। या फिर, वहां दोनों एक हैं और उनमें कोई भेद रेखा नहीं है।

‘आस्तिक को आस्तिकता छोड़नी होती है, नास्तिक को नास्तिकता तब कहीं वे सत्य में पहुँचते हैं। मन की कोई भी धारणा उस मुक्ति के जगत्‌ में बंधन है।

‘जो न आस्तिक है, न नास्तिक है उसे मैं धार्मिक कहता हूँ। धार्मिकता भेद से अभेद में छलांग है।

‘विचार जहां नहीं, निर्विचार है; विकल्प जहां नहीं, निर्विकल्प है; शब्द जहां नहीं, शून्य है – वहां धर्म में प्रवेश है।‘

रजनीश के प्रणाम

प्रभात:
२८ मार्च १९६३


पुनश्च: जया बहिन ने लिखा है कि वे आपको दो पत्र देचुकीं लेकिन आपका कोई उत्तर नहीं है। उन्हें उत्तर दें। शेष शुभ। सबको प्रणाम।

Letters to Anandmayee 883.jpg


See also
Krantibeej ~ 010 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.