Letter written on 29 Nov 1969

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Osho wrote many letters in Hindi to Ma Kusum Bharti and her husband Kapil, then of Ludhiana. Most were addressed to Kusum, but always mentioning Kapil too. 27 were published in Prem Ke Swar (प्रेम के स्वर). Sannyas Wiki has images of all but one of those published in PKS, plus three unpublished ones, plus one in English published in The Gateless Gate.

This letter was published in Prem Ke Swar (प्रेम के स्वर) as letter #11. The letterhead is a typical one of those days, showing a simple all-lower-case "acharya rajneesh" at "kamala nehru nagar" in "jabalapur (m. p.)", with his 4-digit phone number and a two-colour Jeevan Jagriti Kendra logo.

The date this letter was written is not 100% established. On the face of it, it is one of the rare ones which do not have any date. Since Osho's signature comes right to the edge, there is a possibility that the date, which is usually right under his signature, somehow got "snipped" off, but otoh the letter's image looks intact. Another source, Shailendra's pdf of the whole book, has the date as 29th November 1969, and since that fits in with the consistent pattern of chronological order of the letters in PKS, that has been provisionally adopted here.

acharya rajneesh

kamala nehru nagar : jabalpur (m.p.). phone : 2957

प्यारी कुसुम,
प्रेम। तेरे सब पत्र मिल गये हैं। वे भी जो तू भेजती है, और वे भी जो तू नहीं भेजती है।

आह ! प्रभु के लिए तेरी व्याकुलता कैसी तीव्र है ?

ऐसी व्याकुलता से ही तो किसी मीरा का जन्म होता है।

उसके मंदिर के व्दार पर दीगई तेरी दस्तकें मुझे भलीभांति सुनाई पड़ रही है।

उसके मंदिर का कोना-कोना भी तेरी निशब्द पुकार से गूंज रहा है ।

उसके मंदिर की सीढियाँभी तेरे आंसुओं की वर्षा में धुल गई हैं।

तू प्यास ही बनती जारही है।

तू प्रार्थना ही बनती जारही है।

और तभी उसके व्दार खुलते हैं, जब पुकारनेवाला पूरी तरह मिट जाता है,और बस पुकार ही शेष रह जाती है।

इसके व्दार तो खुलेंगे ही।

लेकिन उसके पूर्व प्रार्थी को मिट जाना पड़ता है।

प्रार्थी का होना ही प्रार्थना में सबसे बडी बाधा है।

शायद, उसके व्दार तो खुले ही हैं लेकिन प्रेमी की मौजदगी में वे बंद दिखाई पड़ते हैं।

वाह ! क्या प्रेमी ही प्रियतम के मिलन में अवरोध नहीं है ?

फिर, प्रत्येक चीज के पकने का भी एक समय है।

प्रेम भी पकता है। प्रार्थना भी पकती है।

और उनके पकते ही प्रेमी खोजाता है।

और तबतक है प्रतीक्षा और प्रतीक्षा और प्रतीक्षा।

निश्चय ही तू पूछेगी कि प्रतीक्षा का क्या अर्थ है ?

प्रतीक्षा का अर्थ है : धर्यपूर्ण - अधैर्य !

कपिल को प्रेम। असंग को आशीष।

रजनीश के प्रणाम

Prem Ke Swar 11.jpg


See also
Prem Ke Swar ~ 11 - The event of this letter.
Letters to Kusum and Kapil - Overview page of these letters.