Difference between revisions of "Letter written on 2 Aug 1961 om"

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written on 2nd August 1961 in the afternoon. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
 
This is one of hundreds of letters Osho wrote to [[Ma Anandmayee]], then known as Madan Kunwar Parekh. It was written on 2nd August 1961 in the afternoon. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.  
  
 
Osho's salutation in this letter is just plain "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (12) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure which reads "37" in a mirror (Devanagari characters). In addition, there is a small blue tick mark right at the top.
 
Osho's salutation in this letter is just plain "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (12) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure which reads "37" in a mirror (Devanagari characters). In addition, there is a small blue tick mark right at the top.
  
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अतीत और भविष्य का अस्तित्व मन में है। मन है स्मृति, मन है कल्पना, मन है विचार – विकृति। मन जबतक है वर्तमान नहीं होता है। मन मिटे तो वर्तमान प्रगट होजाता है जैसे कि बदलियां हटते ही निरभ्र नीलाकाश के दर्शन होते हैं।
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एक मित्र आये हैं। मैं उनसे कहा हूँ : “सत्य पाना है तो मन को छोड़ना पड़ता है। छोड़दें मन फिर सत्य अपने से आजाता है। उसे खोजने कहीं जाना नहीं है। वह तो है ही। वह साथ ही है। वह तो हम स्वयं ही हैं। मन बाधा है। विचार बाधा हैं। बाधा हटी – पर्दा हटा कि हम उसके मंदिर में पहुँच जाते हैं।“
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Revision as of 12:26, 15 February 2020

This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parekh. It was written on 2nd August 1961 in the afternoon. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is just plain "मां", Maan, Mom or Mother. It has a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: a blue number (12) in a circle in the top right corner, a red tick mark and a pale blue figure which reads "37" in a mirror (Devanagari characters). In addition, there is a small blue tick mark right at the top.

Letters to Anandmayee 830.jpg

रजनीश
११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

दोपहर:
२ अगस्त ‘६१

मां,
वर्षा पड़ रही है। आकश मेघाच्छन्न है: भूरे-मटमैले बादलों ने सब ढ़क रखा है। वृक्षों के शाखा-पल्लव हवा के झकोरों में कांप-कांप जाते हैं। रास्ते निर्जन से हैं। कोई इक्का-दुक्का निकल जाता है। घनी-चुप्पी – वर्षा का टप-टप-गीत – सूनता हूँ – देखता हूँ। अतीत मीट जाता है। भविष्य मीट जाता है। बच रहता है केवल वर्तमान। वर्तमान ही है। वह समय की धारा के बाहर है। वह समय का अंग नहीं है। अनंत-अनादि है वह। शाश्वत-नित्य सत्ता का वास उसमें है।

मनुष्य मृत है क्योंकि वह वर्तमान में नहीं है।

वर्तमान, जीवन का – सत्य का – प्रभु का, द्वार है। उसमें जो जागता है वह प्रभु-राज्य को पाजाता है।

अतीत और भविष्य का अस्तित्व मन में है। मन है स्मृति, मन है कल्पना, मन है विचार – विकृति। मन जबतक है वर्तमान नहीं होता है। मन मिटे तो वर्तमान प्रगट होजाता है जैसे कि बदलियां हटते ही निरभ्र नीलाकाश के दर्शन होते हैं।

एक मित्र आये हैं। मैं उनसे कहा हूँ : “सत्य पाना है तो मन को छोड़ना पड़ता है। छोड़दें मन फिर सत्य अपने से आजाता है। उसे खोजने कहीं जाना नहीं है। वह तो है ही। वह साथ ही है। वह तो हम स्वयं ही हैं। मन बाधा है। विचार बाधा हैं। बाधा हटी – पर्दा हटा कि हम उसके मंदिर में पहुँच जाते हैं।“

वह बाहें फैलाये हमारे आलिंगन को उत्सुक खड़ा है।

रजनीश
के
प्रणाम


See also
(?) - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.