Letter written on 2 Jul 1963 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 2nd July 1963 in the morning. The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is a simple "मां", Maan, Mom or Mother. There are a couple of the hand-written marks seen in other letters, a black tick mark up top and a faint sort of readable mirror-image number bottom right, 191, with what appears to be 192 crossed out.

The same colours of ink, mostly blue with some red, are used as in the previous letter, where they were introduced. Prior to that, all his letters had been written entirely in black. In this one, only the last sentence is in red, "इससे कहता हूं ज्ञान और ज्ञान में भेद है". In the PS he mentions a speaking date in Allahabad "tomorrow".

This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 37 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 229.

The PS reads: "At your behest I wrote (sent letter) to Gadarwara. Dadda is considering to come to Chanda. His letter has come that he would spare time to reach (there). Rest OK. I would be delivering talk at Allahabad, tomorrow."

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

प्रभात:
२ जुलाई १९६३

मां,
ज्ञान और ज्ञान में भेद है। एक ज्ञान है केवल जानना, जानकारी, बौद्धिक समझ और एक ज्ञान है अनुभूति, प्रज्ञा, जीवन्त प्रतीति। एक मृत तथ्यों का संग्रह है एक जीवित सत्य का बोध। दोनों में बहुत अंतर है : भूमि और आकाश का। वस्तुतः, बौद्धिक ज्ञान कोई ज्ञान ही नहीं है। वह केवल अज्ञान को छिपा लेना मात्र है। शब्दों के जाल में और विचारों के धुयें में जो अज्ञान है वह विस्मृत हो जाता है। यह स्थिति अज्ञान से भी घातक है। बाहर से आया ज्ञान अज्ञान पर पर्दा बन जाता है।

ज्ञान को भीतर से आना है। उसके लिए पर्दे बनाने नहीं तोड़ने हैं। और जब ज्ञान भीतर से आता है तो क्रांति होजाती है। फिर आचरण उसके अनुसार ढ़ालना नहीं होता है, वह अपने से ढल जाता है।

एक कथा पढ़ी थी। दो मुनि वन से गुजर रहे थे। वे शरीर की दृष्टि से पिता-पुत्र थे। पुत्र आगे था, पिता पीछे। मार्ग बीहड़ था और अचानक सिंह का गर्जन हुआ। पिता ने पुत्र से कहा : ‘तुम पीछे आजाओ; खतरा है।’ पुत्र हंसने लगा और आगे ही चलता रहा। पिता ने दुबारा कहा। सिंह सामने आ गया था। पुत्र बोला : “मैं शरीर नहीं हूँ तो खतरा कहां है? आप भी तो यही कहते हैं न?” पिता ने कहा : ‘पागल, पीछे आजा।’ पर पुत्र हंसता रहा और सिंह का हमला भी होगया। वह गिर पड़ा था पर उसे दीख रहा था कि जो गिरा है वह ‘मैं’ नहीं हूँ। शरीर वह नहीं है। वह आनंद से भरा था। जो पिता कहता था वह उसे दीख भी रहा था। और यह अंतर महान्‌ है। पिता दुखी था और मोहग्रस्त और वह स्वयं केवल दृष्टा रह गया था। उसे न दुख था, न पीड़ा थी। वह अविचल और निर्विकार था क्योंकि जो भी हो रहा था वह उसके बाहर था।

इससे कहता हूँ ज्ञान और ज्ञान में भेद है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: आप की आज्ञानुसार गाडरवारा लिखा था। दद्दा चांदा आने का विचार कर रहे हैं। समय निकालकर वे पहुँचेगे ऐसा उनका पत्र आया है। शेष शुभ। मैं कल अलाहाबाद बोलने जारहा हूँ।

Letters to Anandmayee 898.jpg


See also
Krantibeej ~ 037 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.