Letter written on 2 Mar 1963 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written in the morning of 2nd March 1963 from Delhi. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

The salutation is "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, The letter's hand-written marks are few: a black tick mark in the upper right corner and a faint but readable mirror-image number (171) in the bottom right corner. This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 66 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 204-205.

In this letter written in the morning of 2nd March from Delhi, Osho says: "Dear Ma, Yesterday I have said: ..." It indicates that this talk was delivered to the people who might have gathered at the instance of the organizer Shree Sunderlal in the evening of 1st March when Osho arrives - as informed in PS. The PS reads: "Your letter had been received. How you felt by mine not coming (there) - is known even without saying (it). Though nothing is written in the letter - yet this non-written also, is telling everything. Yesterday evening I came to Delhi and in the morning of 4 March - will be returning back from here. The letter of Shree Shobhacandra Ji Bharill was received from Beawar. It was written that Guru Ji of Shree Parakh Ji - 'Shree Madhukar Ji' - is also in Beawar and wants to meet me. Shree Parakh Ji might have written letter to him. Whenever in May and June Shree Parakh Ji feels OK - we can visit there to meet him."

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

प्रभात:
देहली
२ मार्च १९६३

प्रिय मां,
कल कहा हूँ : “मनुष्य जिसे जगत्‌ कहता है, वह सत्ता की सीमा नहीं है। वह केवल मनुष्य की इंद्रियों की सीमा है। इन इंद्रियों के पार असीम विस्तार है। इस असीम को इंद्रियों से कभी भी पूरा पूरा नहीं पाया जासकता है; क्योंकि इंद्रिया खंड को देखती हैं, अंश को देखती हैं और जो असीम है, अनंत है वह खंडित और विभाजित नहीं होता है। जो असीम है उसे मापने के लिए कोई सीमित साधन काम नहीं दे सकता है। जो असीम है वह केवल असीम से ही पकड़ा जा सकता है।

“: पर क्षुद्र और सीमित दिखते मनुष्य में असीम भी उपस्थित है। इंद्रियों पर उसकी परिसमाप्ति नहीं है। वह इंद्रियों में है पर इंद्रियां ही नहीं हैं। वह इंद्रियातीत आयाम में भी फैला हुआ है। वह जितना दीखता है : वहां उसकी समाप्ति - सीमा नहीं, शुरुआत है। वह अदृश्य है। दृश्य के घेरे में अदृश्य बैठा हुआ है। इस अदृश्य को वह अपने भीतर पाले तो जगत्‌ के समस्त अदृश्यों को पालेता है क्योंकि समस्त भाग और खंड दृश्य के हैं; अदृश्य अखंडित है। एक और अनेक वहां एक ही है। और इसलिए एक को ही पालेने से सब पालिया जाता है। “कहा है महावीर नेः ‘जे एगं जाणई से सव्वं जाणई।’ एक को जाना कि सब जाना। यह एक भीतर है। यह एक दृश्य नहीं, दृष्टा है। इससे इसे पाने का मार्ग आंख नहीं है। आंख बंद करना इसका मार्ग है। आंख बंद करने का अर्थ है : दृश्य से मुक्ति। आंख बंद हो और भीतर दृश्य बहते हों तो भी आंख खुली ही है। दृश्य दृष्टि में न हों और आंख खुली हो तो भी आंख बंद है। दृश्य न हो और केवल दृष्टि – केवल दर्शन रह जावे तो दृष्टा प्रगट होजाता है। “जिस दर्शन से दृष्टा दीखे वह सम्यक्‌ दर्शन है। यह दर्शन जबतक नहीं तबतक मनुष्य अंधा होता है। आंखें होते हुए भी आंख नहीं होती हैं। इस दर्शन से चक्षु मिलते हैं; वास्तविक चक्षु, इंद्रियातीत चक्षु और सीमायें मिट जाती हैं; रेखायें मिट जाती हैं ओर जो है – आदि-अंतहीन विस्तार – ब्रह्म – वह उपलब्ध होता है।

“यह उपलब्धि ही मुक्ति है क्योंकि प्रत्येक सीमा बंधन है। प्रत्येक सीमा परतंत्रता है। सीमा से ऊपर होना स्व-तंत्र होना है।”

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च : तुम्हारा पत्र मिल गया था। मेरे न आने से तुम कैसा अनुभव की हो सो न कहे भी ज्ञात है। पत्र में तो कुछ भी नहीं लिखा है पर यह न लिखना भी तो सबकुछ कह देता है! कल सांझ देहली आया हूँ और ४ मार्च की सुबह यहां से वापिस होऊँगा। श्री शोभाचन्द्र जी भारिल्ल का ब्‍यावर से पत्र मिला था। लिखा था कि श्री पारख जी के गुरुजी श्री मधुकर जी भी ब्यावर हैं और मुझसे मिलना चाहते हैं। श्री पारख जी ने उन्हें पत्र लिखा होगा। मई और जून में श्री पारख जी जब ठीक समझे मिलने जाया जा सकता है।

Letters to Anandmayee 876.jpg


See also
Krantibeej ~ 066 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.