Letter written on 30 Jan 1961 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 30th January 1961 in the morning and PS in the afternoon, on his personal letterhead stationery of the day: The top left corner reads: Rajneesh / Darshan Vibhag (Philosophy Dept) / Mahakoshal Mahavidhalaya (Mahakoshal University). The top right reads: Nivas (Home) / Yogesh Bhavan, Napiertown / Jabalpur (M.P.). Many of his letters on this letterhead have had the number 115 added in by hand before "Yogesh Bhavan" to complete his address, but not this one.

This letter has the red tick mark that has been found in some other letters, and what may be a pale blue number 39. Osho's usual salutation, "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom, has also been used here. And the letterhead has been printed on paper with a watermark, "JUPITER BOND". Second sheet is PS ("पुनश्च", punashch), where Osho reminds and insists Ma for coming to village (Gadarawara) on 17th Feb for a wedding.

The date of first part has been put up top, along with what appears to be "प्रभात", prabhat, morning or daybreak (see discussion).

This letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 78 and 77 (2002 Diamond edition).


Letters to Anandmayee 804.jpg

रजनीश                   निवास:
दर्शन विभाग               योगेश भवन, नेपियर टाउन
महाकोशल महाविद्यालय         जबलपुर (म. प्र.)

३० जन. ६१
प्रभात

प्रिय मां,
बसंत-गीत फैला है। सब सुन्दर हो उठा है। बूढ़े दरख्त हरे होगये हैं और सूखी टहनियों पर जादू की तरह नई कोपलें निकल आई हैं। फूल ही फूल – प्रभु की पूरी महिमा के साथ पौधे दुल्हिनें बने खड़े हैं।

इस सुन्दर अभिव्यक्ति में भी जो 'उसे' नहीं देखपाता है वह उसे और कभी नहीं देख सकता है।

इस सबके पीछे उसके खेल को मेरी आंखें पकड़ लेती हैं और तब एक अद्भुत आनंद प्राणों पर छाजाता है।

वह है एकदम निकट – उत्सुक, मिलने को बहुत बहुत आतुर हम ही दूर खड़े हैं। वह आमंत्रण देता है और हम बहरे हैं। वह रुप-रंग में खिलताहै और बुलाताहै पर हम है अंधे कि देख नहीं पाते हैं।

आंख खोलते ही वह द्वार पर मिल जाता है, दूर नहीं जाना होता। यह सामने जो कली फूल बन रही है – इसे देखती हैं : दो पंखुरियां खुल गई हैं; तीसरी बस खिलने को है – और पास ही उसकी अंगुलियां भी हैं! कितना आहिस्ता आहिस्ता वह कली को फूल बना देता है!

मैं उससे रोज कहता हूँ : ओ अपरिचित तू कितना परिचित है!

***

सबमें बैठे उस प्रभु को मेरे प्रणाम कहें।

प्रभु में आपका
रजनीश


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रजनीश                   निवास:
दर्शन विभाग               योगेश भवन, नेपियर टाउन
महाकोशल महाविद्यालय         जबलपुर (म. प्र.)

३०.१.६१
दोपहर

पुनश्च:
मां। गांव चलना है १७ फर. की संध्या। १८ और १९ को विवाह है। आप कम से कम दो दिन पूर्व आजायें। ज्यादा पहले आयें तब कहना ही क्या? दद्दा कल आए हैं और आपको बहुत बहुत आग्रह करने को कहा है। मैंने कहा : "आग्रह नहीं करूँगा : तो भी उन्हें आना ही पड़ेगा। अब वे पराई नहीं हैं।" यशोधरा जी का पत्र आज मिला है। संभव है कल उन्हें उत्तर दूँ। कब आती हैं – किस बस पर खड़े होकर मुझे प्रतीक्षा करनी होगी – इस सबकी सूचना पूर्व ही दे दें।

बस। आज अब इतना ही।

रजनीश के प्रणाम

Partial translation
"PS:
Ma, we have to go to (our) village in the evening of 17 Feb. The wedding is on 18th and 19th. You please come minimum two days before. And if you come still earlier than that – what to say (what a pleasure)! Dadda has come yesterday and has told to insist you much (to come). I said: “Even if I do not insist she has to come – now she is not an outsider (stranger).” The letter of Yashodhara Ji is received today. Probably I will reply to her tomorrow. When you are coming – for which bus I will have to wait – send the prior information about all these.
It’s enough – today for now.
Rajneesh Ke Pranam"
See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 018 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.