Letter written on 30 Nov 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 30th November 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are two of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner, 152.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 81 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 179).

The PS reads: "Inform Shree Shukla Ji if he is there, that an invitation of his friend Shree Ratilal Chaturbhuj Gosaliya has come from Nandurbar. And it becomes possible then I am planning to speak there for two days during the holidays of December, still it would be better if Shree Shukla Ji reaches there during those days. Convey my humble pranam to all. Write about how your health is, now. There is no letter from you for many days."

Letters to Anandmayee 946.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

प्रिय मां,
एक कहानी है। एक अविवाहित युवती को पुत्र उत्पन्न होगया था। उसके प्रियजन घबड़ा गये थे। उन्होंने उससे गर्भ का कारण पूछा था। वह बोली कि गांव के बाहर ठहरे हुए साधु ने उसका शील भंग किया है। उसके क्रोधित प्रियजनों ने साधु को घेरकर बहुत बुरा-भला कहा। उस साधु ने सब शांति से सुना और कहा : “ऐसा है क्या?” वह केवल इतना ही बोला था और बच्चे को पालने का भार उसने अपने ऊपर लेलिया था। पर घर लौटकर उस लड़की को पश्चाताप हुआ और उसने यथार्थ बात कहदी। उसने बता दिया कि साधु को तो उसने इसके पूर्व कभी देखा ही नहीं था : लड़के के असली पिता को बचाने के लिए ही उसने झूठी बात कहदी थी। उसके परिवार के लोग बहुत दुखी हुए। उन्होंने जाकर साधु से क्षमा मांगी। साधु ने सारी बातें शांति से सुनी और कहा, “ऐसा है क्या?”

जीवन में शांति आजाये तो यह सारा जगत्‌ और जीवन एक अभिनय से ज्यादा कुछ भी नहीं रह जाता है। मैं केवल एक अभिनेता होजाता हूँ : बाहर कहानी चलती जाती है और भीतर शून्य घिरा रहता है। इस स्थिति को पाकर ही संसार की दासता से मुक्ति होती है। मैं दास हूँ क्योंकि जो भी बाहर से आता है उससे उद्विग्न होता हूँ। कोई भी बाहर से मेरे भीतर को बदल सकता है। मैं इस भांति परतंत्र हूँ। बाहर से मुक्ति होजावें – बाहर कुछ भी हो पर मैं भीतर वही रह सकूँ जो कि हूँ तो स्व का और स्वतंत्रता का प्रारंभ होता है।

यह मुक्ति शून्य उपलब्धि से शुरू होती है। शून्य होना है। शून्य अनुभव करना है। उठते, बैठते, चलते, सोते जानना है कि मैं शून्य हूँ और इसका स्मरण रखना है। शून्य को स्मरण रखते रखते शून्य होना होजाता है। स्वांस स्वांस में शून्य भर जाता है। भीतर शून्य आता है तो बाहर सरलता आ जाती है। शून्यता ही साधुता है।

कल कोई साधु की परिभाषा पूछता था तो यह सब मैंने उसे कहा था।

रजनीश के प्रणाम

३० नवंबर १९६२


पुनश्च: श्री शुक्ला जी वहां हों तो उन्हें कहदें कि उनके मित्र श्री रतिलाल चतुर्भुज जी गोसलीया का नंदुरबार से निमंत्रण आया है और संभव हुआ तो दिसम्बर की छुट्टियों में मैं वहां दो दिन के लिए वहां बोलने का विचार कर रहा हूँ पर यदि शुक्ला जी उन दिनों वहां पहुँच जावें तो बहुत सुखद होगा। सबको मेरे विनम्र प्रणाम कहें। आपका स्वास्थ्य अब कैसा है सो लिखें। बहुत दिनों से आपका कोई पत्र नहीं है।


See also
Krantibeej ~ 081 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.