Letter written on 3 Dec 1962

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 3rd December 1962. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.)" in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are two of the hand-written marks that have been observed in other letters: a black tick mark in the upper right corner and a mirror-image number in the bottom right corner, 153, with the original 151's final 1 changed to a 3.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 80 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) (2002 Diamond edition, p 180).

The PS reads: "Letter of Shree Parakh Ji is received. Nothing is decided for the holidays, yet - will write when decided."

Letters to Anandmayee 947.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

३ दिसम्बर ‘६२

प्रिय मां,
कल एक मंदिर के द्वार पर खड़ा था। धूप जल रही थी और वातावरण सुगंधित था। फिर पूजा की घंटी बजने लगी और आरती का दीप मूर्ति के सामने घूमने लगा। कुछ भक्त जन इकठ्ठे थे। वह सब आयोजन सुन्दर था और एक सुखद तंद्रा पैदा करता था लेकिन उस आयोजन से धर्म का कोई संबंध नहीं है।

किसी मंदिर, किसी मस्जिद, किसी गिरजे का धर्म से कोई संबंध नहीं है। किसी पूजा, किसी अर्चना का धर्म से कोई नाता नहीं है और सब मूर्तियां पत्थर हैं और सब प्रार्थनायें दीवालों से कीगई बातचीत के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।

लेकिन इन सब से सुख मिलता मालूम होता है और वही खतरा है; कारण, उसी के कारण प्रवंचना प्रारंभ होती है। उस सुख के भ्रम में ही सत्य होने का आभास पैदा होता है। सुख मिलता है मूर्च्छा से – अपने को भूल जाने और स्व की वास्तविकता से पलायन करने से। योन-सुख और मादक द्रव्यों का सुख भी ऐसे ही पलायन से मिलता है। धर्म के नाम पर मूर्च्छा के सब प्रयोग भी मादक द्रव्यों जैसा ही मिथ्या सुख लाते हैं। सुख धर्म नहीं, क्योंकि वह दुख का अंत नहीं, केवल विस्मृति है।

फिर धर्म क्या है?

धर्म स्व से पलायन नहीं, स्व के प्रति जागरण है। इस जागरण का किसी बाह्य आयोजन से कोई वास्ता नहीं है। यह तो भीतर चलने और चैतन्य को उपलब्ध करने से संबंधित है।

मैं जागूं और साक्षी बनूँ – जो है उसके प्रति चेतन बनूँ – बस धर्म इतने से ही संबंधित है।

धर्म अमूर्च्छा है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: श्री पारख जी का पत्र मिला है। छुट्टियों का अभी कुछ निश्चय नहीं है : निश्चय होने पर लिखूंगा।


See also
Krantibeej ~ 080 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.