Letter written on 4 Aug 1962 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 4th August 1962 in the morning. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: black and red tick marks in the top right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. However, there are actually two numbers there, one crossed out (122) and replaced by a pink number, 124.

The letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो), on p 147 (2002 Diamond edition). Note that Osho's dating does not include the "am" but the text of the letter begins, "It is morning".

In the PS Osho writes: "No letter, so send."

Letters to Anandmayee 917.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

४ अगस्त १९६२

प्यारी मां,
सुबह है। आकाश शांत है। एक पक्षी के गीत को छोड़ और सब मौन है। इस मौन में न मालुम कौन चेतना में आ बसता है। न मालुम किस आयाम में द्वार खुल जाते हैं। न मालुम मनुष्य का कैसे अतिक्रमण होजाता है।

मनुष्यता भी कैसी एक पतली सी सतह है : जरा डूबो और वह पीछे छूट जाती है।

मैं अब काम करता हूँ, चलता हूँ, उठता हूँ, बैठता हूँ, सोता हूँ, पर वह गहराई साथ नहीं छोड़ती है। एक शून्य है जो निरंतर साथ है : परिधि पर लहरें है और इन लहरों में घिरा केन्द्र पर एक अनंत शून्य है। जीवन की सब क्रियाओं के बीच मैं एक शून्य हूँ। प्रतीत होता है कि बोल तो रहा हूँ पर जैसे कोई और बोल रहा है : लिख तो रहा हूँ पर जैसे कोई और लिख रहा है। सब बहुत दूर कहीं हो रहा है और मैं अलिप्त और असंग कहीं और हूँ।

यह भी दीखता है कि स्व की यह अलिप्तता, यह असंगता सदा ही ऐसी ही रही है। कल रात्रि अंधेरे में बैठा था। घर अंधेरा था। कक्ष अंधेरा था फिर प्रकाश किया तो कक्ष प्रकाश से भर गया था। प्रकाश आया तो, अंधेरा था तो पर कक्ष तो वही है, वैसा ही है। ज्ञात हो अज्ञात हो स्व तो वही है, वैसा ही है।

संसार है, पर कुछ है भीतर जो संसार के बाहर है। इस कुछ को जानना ही मुक्ति है।

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च: पत्र नहीं, सो देना।


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 075 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.