Letter written on 4 Jan 1961

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 3rd January 1961 with PS written on 4th January 1961 on his personal letterhead stationery of the day: The top left corner reads: Rajneesh / Darshan Vibhag (Philosophy Dept) / Mahakoshal Mahavidhalaya (Mahakoshal University). The top right reads: Nivas (Home) / Yogesh Bhavan, Napiertown / Jabalpur (M.P.). Many of his letters on this letterhead have had the number 115 added in by hand before "Yogesh Bhavan" to complete his address, but not this one.

Unusual features of the marks on this letter include the date being written above the letter and the lack of a blue number in a circle in the top right corner. And, like the previous letter, its red tick mark is also on the right side rather than on the left above Osho's salutation, "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. Finally, there IS a pale blue, stylized, non-circled "6" in the middle, just above the text of the letter.

Second sheet is PS, which have is a layout headed apparently with the word "परिशिष्ट", parishisht, "Appendix", followed by three sections: "to Shanta", "to Parakh ji" and "to Mom". It must be stressed that these readings are tentative and may not be correct, save the last. The paper, fwiw, has a backwards watermark. Finally, there IS a pale blue, non-circled two-figure thingie in the middle right which MAY be a backwards number (87), possibly from having got imprinted from another letter due to inadequate storage. But really this is just a guess.

This letter has been published, in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 72 and 71 (2002 Diamond edition).

Letters to Anandmayee 795.jpg

रजनीश                   निवास:
दर्शन विभाग               योगेश भवन, नेपियर टाउन
महाकोशल महाविद्यालय         जबलपुर (म. प्र.)

३ जनवरी १९६१

प्रिय मां,
संध्या। उदास अंधेरे को उतरते देखता हूँ। थके पक्षी नीड़ो को लौट चुके। कभी कोइ भूला पक्षी पर फड़फड़ाता है। घरों के ऊपर धुंआ लटक रहा है। मैं बगिया में हूँ। फूलों की हंसती क्यारियां कालिमा में डूब रही हैं।
एक दिन ऐसे ही मनुष्य डूब जाता है। जीवन अंधेरे में कहां खोजाता है – ज्ञात भी नहीं पड़ता। उसके पूर्व के क्षण बहुत कीमती हैं। एक एक क्षण बहुमूल्य है। सूर्योदय और सूर्यास्त के इस खेल में अपने को खोया भी जासकता है; पाया भी जासकता है।
गीत और रूदिन दोनों मनुष्य के हाथ में हैं। सब कुछ स्वयं पर निर्भर है।
यह जीवन अपना ही निर्माण है।
इसे हम एक आनंद-उत्सव बनालें – इसके लिए यह अवसर है।

याद आता है। आप पूछी थीं, 'मैं आनंद में अकेला कब तक खोया रहूँगा?'
मैं अखंड आनंद होना चाहता हूँ। उसे पालूँ तभी तो दे सकता हूँ? यूं सबके भीतर वह छिपा है। आंखें फिराने की बात है। जो आंखें बाहर देखती रहती हैं, उन्हें भीतर लौटाना होता है। भीतर वही बैठा है जिसकी ढूंढडोड बाहर चल रही है। खूब छिपकर बैठा है। बढ़िया आंख मिचौली है।
यह दीख आता है तो संध्या टूट जाती है। प्रभात ही प्रभात फिर शेष रह जाता है।

***

आपका पत्र मिला है। बहु सुखद। चांदा के मेरे कार्यक्षेत्र बनने की बात लिखी है। आप वहां है तो क्षेत्र तो बन ही गया। यह भी क्या भगवान को बताना पड़ेगा! यह तो मैं ही बता देता! फिर भी मुझसे पहिले इसने बताया सो ठीक ही किया। उसके हाथ उद्घाटन होना निश्चय ही शुभ है।
पिछले पत्र के लिये राह देखनी पड़ी। जानकर ही दिखाई है। मैं सोचता था कि राह आप देखेंगी – खूब मजा रहेगा। राह देखने में भी बड़ा सुख है – है न?
सबको मेरे प्रणाम।

रजनीश के प्रणाम


Letters to Anandmayee 796.jpg

रजनीश                   निवास:
दर्शन विभाग               योगेश भवन, नेपियर टाउन
महाकोशल महाविद्यालय         जबलपुर (म. प्र.)

परिशिष्ट :
शांता को –
मां लिखी हैं कि मेरे लिए सूत कात रही हो। मजबूत कातना खूब कि बंधू तो छूट न पाउँ! और अभी नहीं मिल पाई हो इससे दुखी मत होना – जितना राह देखकर मिलोगी उतना ही सुखद होगा। मेरा बहुत बहुत स्नेह।

पारखजी को —
मां लिखी हैं कि आप मेरी भेजी किताबें ध्यान से पढ़ रहे हैं। इसे जानकर मैं बहुत खुश हूँ। आपसे मिलना एक गहरा आनंद मेरे लिए रहा है। आप अधिकांशत: चुप थे पर बातें तो सबसे ज्यादा आपसे ही हुई हैं! मां के निर्माण में भी आपकी लिखावट को पढ़ लिया हूँ। वह छिपी नहीं रह सकती है। मौन और शांत एक आदमी क्या कर सकता है, यह अनुभव मुझे हुआ। इतना सुखद – इतना मुक्त दाम्पत्य जीवन मैंने कहीं और नहीं देखा है। इससे निश्चय ही आपको धन्यता अनुभव होनी चाहिए। मैं जितने समय आपके यहां रहा मेरे मन में यही प्रार्थना प्रभु से चलती रही कि काश! भारत का प्रत्येक परिवार ऐसा जीवन जीसके। प्रभु की घनी अनुकंपा आप पर है।

मां को —
आप लिखी हो कि मेरे "पत्र की राह में पलकें राह पर लगी रहीं यद्यपि मैं जानती हूँ कि यह पागलपन के सिवाय और क्या है?" बढ़िया बात लिखी। पागल तो पक्की हो। नहीं तो जीवन में प्रेमही कैसे कर पातीं? प्रेम तो पागल ही कर पाते हैं और जो प्रेम नहीं कर पाते उन्हें क्या कोई जीवित कहेगा? दो ही तरह के लोग दुनिया में हैं : पागल और मृत। तो तुम सदा पागल ही रहना।

रजनीश के प्रणाम
४ जनवरी १९६१


See also
Bhavna Ke Bhojpatron ~ 014 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.