Letter written on 5 Jul 1963 om

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 5th July 1963 in the afternoon from Sachcha Baba Ashram, ARAIL, Allahabad while on journey. It appears from this and the PS of Letter written on 2 Jul 1963 am, that Osho might be returning back after his two days halt at Allahabad, and the talk by a sadhu quoted in this letter might be the one at the said Ashram. (The train route being some 370 km and 8 hours between Jabalpur - Allahabad, he might have reached by forenoon of 3rd July.)

The letterhead has "Acharya Rajneesh" in a large, messy font to the right of and above the rest, which reads:

Darshan Vibhag [Department of Philosophy]
Mahakoshal Kala Mahavidyalaya [Mahakoshal Arts University]
115, Napier Town
Jabalpur (M.P.)

Osho's salutation in this letter is a simple "मां", Maan, Mom or Mother. There are a couple of the hand-written marks seen in other letters, a black tick mark up top and a faint but readable mirror-image number bottom right, 192.

This letter is written all in blue ink, as Osho experiments with colour. Emphasis is achieved with underlines.

This letter has been published in Jeevan-Darshan (जीवन दर्शन) (letters) as letter #4, Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 17 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 230, which has the date as the 4th, but 5th is clearly what is written in the letter.

आचार्य रजनीश

दर्शन विभाग
महाकोशल कला महाविध्यालय
११५, नेपियर टाउन,
जबलपुर (म. प्र.)

दोपहर:
५ जुलाई १९६३

मां,
एक साधु बोल रहे थे : ‘प्रभु को पुकारो। उसका नाम स्मरण करो। निरंतर बुलाने से वह अवश्य सुनता है।’

मैंने मन में सोचा : क्या कबीर के शब्द इन तक नहीं पहुँचे हैं? कबीर ने कहा है, ‘क्या ईश्वर बहरा हो गया है?’

फिर उन्हें कहते सुना : ‘दस आदमी सो रहे हें। किसी ने पुकारा : ‘देवदत्त।’ तो देवदत्त उठ आता है। ऐसा ही प्रभु के सम्बंध में भी है। उसका नाम पुकारो तो वह अवश्य सुनता है।’

यह सुन मुझे हंसी आने लगी थी। मैंने कहा : “पहली बात तो यह कि प्रभु नहीं, हम सो रहे हैं। वह तो नित्य जाग्रत है। उसे नहीं हमें ही जागना है। फिर सोये हुए जाग्रत को जगावें तो बड़े मजे की बात है! उसे पुकारना नहीं, उसकी ही पुकार हमें सुननी है। यह मौन से होगा। इसलिए, परिपूर्ण मौन ही एकमात्र प्रार्थना है। “दूसरी बात यह कि उसका कोई नाम नहीं है। न कोई उसका रूप है। इसलिए उसे बुलाने और स्मरण करने का कोई उपाय नहीं है। सब नाम, सब रूप मनुष्य कल्पित हैं। वे सब मिथ्या हैं। उनसे नहीं, उन्हें छोड़कर सत्य तक पहुँचना होता है।

रजनीश के प्रणाम

(प्रवास से:
सच्चा बाबा आश्रम
अरैल : अलाहाबाद)

Letters to Anandmayee 899.jpg


See also
Krantibeej ~ 017 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.