Letter written on 7 Aug 1962 xm

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written on 7th August 1962, around midnight. Unusually, it also has a PS dated separately, on 9th August in the afternoon. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

Osho's salutation in this letter is a fairly typical "प्रिय मां", Priya Maan, Dear Mom. There are a few of the hand-written marks that have been observed in other letters: black and red tick marks in the top right corner and a mirror-image number in the bottom right corner. However, that number consists of not only an unusually bright and clear number (123), but that number has been crossed out and replaced by an even brighter pink number, 121.

The letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 114 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो), on p 148-149 (2002 Diamond edition). Note that in the book they have the date of the PS as the 8th, but it is the same letter.

In PS Osho writes: "Your letter has been received. How much love do you pour in it - even then it seems that you might hardly be satisfied! This letter is written on 7 Aug - sending it today on 9 Aug - so excuse me. (Afternoon 9 August 1962)"

Letters to Anandmayee 916.jpg

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)

अर्धरात्रि:
७ अगस्त १९६२

प्रिय मां,
रात्रि आधी होने को है। आकाश आज बहुत दिन बाद खुला है। तारे बेतरतीब छितरे हैं। सब नहाया नहाया मालुम होता है और आधा पीला सा चांद पश्चिम क्षितिज में डूबता जाता है।

संध्या आज केन्द्रीय कारागार में बोला हूँ। कोई १ӏӏ हजार कैदी हैं। उनसे बातें करते करते वे कैसे सरल हो जाते हैं। उनकी आंखों में कैसी पवित्रता झलकने लगती है – उसका स्मरण आरहा है। आकाश में फैले तारे उनकी आंखों में झलक आये पवित्र आसुओं से मालुम होरहे हैं!

मैं कहा हूँ : “प्रभु की दृष्टि में कोई पापी नहीं है। प्रकाश की दृष्टि में जैसे अंधेरा नहीं है। इसलिए, मैं तुमसे कुछ छोड़ने को नहीं कहता हूँ। मैं मिट्टी छोड़ने को नहीं कहता हूँ : मैं तो हीरे पाने को कहता हूँ। हीरे पालो : मिट्टी तो अपने आप छूट जाती है। जो तुमसे छोड़ने को कहते हैं वे नासमझ हैं। जगत में केवल पाया जाता है। एक नयी सीढ़ी पाते हैं तो पीछली सीढ़ी अपने आप छूट जाती है। छोड़ना नकारात्मक है। उसमें पीड़ा है, दुख है, दमन है। पाना सत्तात्मक है। उसमें आनंद है। क्रिया में छोड़ना पहले दिखता है पर वस्तुतः पाना पहले है। पहले पहिली सीढ़ी ही छूटती है पर उसके पूर्व ही दूसरी सीढ़ी पा ली गई होती है! उसे पाकर ही, उसे पाया जानकर ही पहली सीढ़ी छूटती है। इससे, प्रभु को पाओ तो जो पाप जैसा दिखता है वह अनायास चला जाता है।

“सच ही, उस एक के पाने से सब पालिया जाता है। उस सत्य के आते ही सब स्वप्न अपने से ही विलीन होजाते हैं। स्वप्नों को छोड़ना नहीं है, जागना है। जो स्वप्नों से लड़ने में लगता है वह उन्हें मान लेता है। भारत स्वप्नों को मानता ही नहीं हैं। इससे ही हम कह सके हैं : अहम्‌ ब्रह्मास्मि। ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ : यह जिनका उदघोष है उनके लिए अंधेरे की कोई सत्ता ही नहीं है।

“मित्र, इसे जानो। जानो कि अंधेरा है नहीं। जानो कि उसमें प्राण ही नहीं है। और जो उसे जान लेता है उसके लिए प्रकाश के द्वार खुल जाते हैं।”

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च:
तुम्हारा मिल गया है। कितना प्रेम तुम उसमें भरती हो, मां? फिर भी लगता है कि तुम्हें उसमें शायद ही तृप्ति होती होगी! सबको मेरे प्रणाम कहें। पत्र लिखा है ७ अग. को भेज रहा हूँ आज ९ अगस्त को सो क्षमा करना।
(दोपहर: ९ अगस्त १९६२)


See also
Krantibeej ~ 114 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.