Letter written on 8 Jan 1963 am

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This is one of hundreds of letters Osho wrote to Ma Anandmayee, then known as Madan Kunwar Parakh. It was written in the morning of 8th January 1963. The letterhead has a simple "रजनीश" (Rajneesh) in the top left area, in a heavy but florid font, and "115, Napier Town, Jabalpur (M.P.) in the top right, in a lighter but still somewhat florid font.

The salutation is a simple "मां", Maan, Mom, There are two hand-written marks, a red tick mark in the upper right and a pale mirror-image number in the bottom right corner. And actually, there are two numbers there, 159 and one crossed out, which looks like 157.

This letter has been published in Krantibeej (क्रांतिबीज) as letter 72 (edited and trimmed text) and later in Bhavna Ke Bhojpatron Par Osho (भावना के भोजपत्रों पर ओशो) on p 187-188. About half of its fairly lengthy PS has been left out of the book.

The PS reads: "(1) Your letter is received. How much delighted I am after knowing that you have achieved in the life - what you were in search for. I am also a witness for the bliss that is descending on you. That would keep increasing day by day and that experience of what ultimate signification of being is; would be realized. For that I am praying to god. (2) My blessings to Shanta's son and I am wishing for him to become a gem, really. (3) Address of Jaya Bahin is as follows: Shreemati Jaya Bahin, C/o: Shree Manilal Anderjee, 271, Feeyar Road, Bombay - 1." Actual name of the road name may be 'FRERE' Road - which now is changed as 'Ganpatrao Kadam Marg'.

रजनीश

११५, नेपियर टाउन
जबलपुर (म. प्र.)

मां,

‘ईश्वर क्या है?’

यह प्रश्न कितनों के मनों में नहीं है। कल एक युवक पूछ रहे थे। और यह बात ऐसे पूछी जाती है जैसे कि ईश्वर कोई वस्तु है, खोजने वाले से अलग और भिन्न और जैसे उसे अन्य वस्तुओं की भांति पाया जासकता है। ईश्वर को पाने की बात ही व्यर्थ है और उसे समझने की भी क्योंकि वह मेरे आर-पार है : मैं उसमें हूँ और ठीक से कहें तो ‘मैं’ है ही नहीं, केवल वही है।

ईश्वर ‘जो है’ उसका नाम है। वह सत्ता के भीतर कुछ नहीं है; स्वयं सत्ता है। उसका अस्तित्व भी नहीं है : वरन्‌ अस्तित्व ही उसमें है। वह ‘होने’ का, अस्तित्व का, अनाम का नाम है।

इससे उसे खोजा नहीं जाता है क्योंकि मैं भी उसी में हूँ। उसमें तो खोया जाता है और खोते ही उसका पाना है।

एक हिन्दु कथा है। एक मछली सागर का नाम सुनते सुनते थक गई थी। एक दिन उसने मछलियों की रानी से पूछा : ‘मैं सदा से सागर का नाम सुनती आई हूँ पर यह सागर है क्या? और कहां है?’ उस रानी ने कहा : ‘सागर में ही तुम्हारा जन्म है, जीवन है और जगत्‌ है। सागर ही तुम्हारी सत्ता है। सागर ही तुममें है और तुम्हारे बाहर है। सागर से तुम बनी हो और सागर में ही तुम्हारा अंत है। सागर तुम्हें प्रतिक्षण घेरे हुए है।’

ईश्वर प्रत्येक को प्रतिक्षण घेरे हुए है। पर हम मूर्च्छित हैं इससे उसका दर्शन नहीं है। मूर्च्छा जगत्‌ है, संसार है; अमूर्च्छा ईश्वर है।

प्रभात:
८ जनवरी १९६३

रजनीश के प्रणाम


पुनश्च : (१) तुम्हारा पत्र मिला है। यह जानकर कितना प्रसन्न हूँ कि तुम्हें जीवन में जिसकी खोज थी उसका पाना होगया है। जो आनंद तुम पर उतर रहा है उसका साक्षी मैं भी हूँ। वह दिन दिन बढ़ता जायेगा और जो होने की चरम सार्थकता है उस अनुभूति का दर्शन होगा। ईश्वर से उसके लिए प्रार्थना करता हूँ।

(२) शांता के सुपुत्र को मेरे शुभाषीश। वह सच ही रत्न बने ऐसी कामना करता हूँ।

(३) जया बहिन का पता निम्न है :

श्रीमती जया बहिन, द्वारा, श्री मणीलाल अंदेरजी,

२७१, फीयर रोड़,

बम्बई – १

Letters to Anandmayee 954.jpg


See also
Krantibeej ~ 072 - The event of this letter.
Letters to Anandmayee - Overview page of these letters.