Manuscripts ~ Phool Aur Phool Aur Phool, Bhag 2 (फूल और फूल और फूल, भाग 2)

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Flowers and Flowers and Flowers

year
1967
notes
39 sheets plus 2 written on reverse.
Sheet numbers showing "R" and "V" refer to "Recto and Verso".
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see also
Osho's Manuscripts


sheet no original photo enhanced photo Hindi transcript
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(1)
एक मित्र ने पूछा है ‘समाज में इतनी हिंसा क्यों हैं?’
हिंसा के मूल में महत्वाकांक्षा है। वस्तुतः तो महत्वाकांक्षा ही हिंसा है। मनुष्य चित्त दो प्रकार का हो सकता है। महत्वाकांक्षी और गैर-महत्वाकाक्षी। महत्वाकांक्षी-चित्त से राजनीति जन्मती है और गैर-महत्वाकांक्षी-चित्त से धर्म का जन्म होता है। धार्मिक और राजनैतिक--चित्त के ये दो ही रूप हैं। या कहें कि स्वस्थ और अस्वस्थ।
स्वस्थ चित्त में हीनता नहीं होती है। और जहां आत्महीनता नहीं है, वहां महत्वाकांक्षा भी नहीं हैं। क्योंकि, महत्वाकांक्षा आत्महीनता के बोध को मिटाने के प्रयास से ज्यादा और क्या है? लेकिन, आत्महीनता ऐसे मिटती नहीं हैं और इसलिए महत्वाकांक्षा का कहीं अंत नहीं आता है। आत्महीनता का अर्थ है आत्मबोध का अभाव। स्वयं को न जानने से ही वह होती है।
आत्म-अज्ञान ही आत्महीनता है। क्योंकि जो स्वयं को जान लेता है, वह सब प्रकार की हीनताओं और महानताओं से मुक्त हो जाता है। ऐसी स्थिति ही स्वस्थ स्थिति है। स्वस्थ यानी स्वयं में स्थित। और जो स्वयं में नहीं है वही अस्वस्थ है। और जो स्वयं में नहीं होता है, वह निरंतर पर से तुलना में रहता है। पर से जो तुलना है, उसी से हीनभाव और फिर महत्वाकांक्षा का निर्माण होता है। और महत्वाकांक्षा द्वंद्व और हिंसा में ले जाती है। राजनीति इसका साकार रूप है। इसलिए ही राजनीति से विनाश फलित होता है।
स्वस्थ चित्त से होता है सृजन। अस्वस्थ चित्त से विनाश। मनुष्य का दुख यही है कि वह अब तक राजनैतिक चित्त के घेरे में ही जिया है। और धार्मिक चित्त को हम पैदा नहीं कर पाए हैं। धर्म के नाम पर कई संगठन और संप्रदाय हैं, वे भी सब राजनैतिक ही हैं। इससे ही इतनी घृणा है, हिंसा है और इतने युद्ध हैं। और इससे ही जीवन इतना अशांत, अराजक और विक्षिप्त है।
एक छोटी सी नाव में बैठे तीन व्यक्ति विवाद कर रहे थे। उनकी चर्चा का विषय था कि पृथ्वी पर सबसे पहले उनमें से किसका व्यवसाय प्रारंभ हुआ? उनमें से एक सर्जन था, दूसरा इंजीनियर और तीसरा राजनैतिक। सर्जन ने कहा ‘बाइबिल कहती है कि ईव का निर्माण आदम की एक पसली को निकाल कर किया गया था। और क्या इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि शल्य चिकित्सक का व्यवसाय सर्वाधिक प्राचीन है?’
इस पर इंजीनियर मुस्कुराया और बोला ‘नहीं, साहब, नहीं। उसके भी पूर्व जबकि सब ओर मात्र अराजकता थी, उस अराजकता में से ही पृथ्वी का निर्माण केवल छः दिनों में किया गया था। वह चमत्कार इंजीनियरिंग का ही था। और अब क्या और भी प्रमाणों की आवश्यकता है यह सिद्ध करने को कि मेरा ही व्यवसाय प्राचीनतम है?’
राजनीतिज्ञ अब तक चुप था। वह हंसा और बोला ‘लेकिन मेरे मित्र, यह भी तो बताओ कि अराजकता किसने पैदा की थी?’
वह अराजकता आज भी है। और उसको पैदा करने वाला चित्त भी है। और, शायद वह चित्त अपने चरम विकास को भी पहुंच गया है। वह चित्त युद्ध पर युद्ध पैदा करता आया है। कहते हैं कि विगत 3 हजार वर्षों में सारी पृथ्वी पर कोई 15 हजार युद्ध उसने पैदा किए हैं। और अब वह अंतिम युद्ध की तैयारी कर रहा है। अंतिम इसलिए नहीं कि फिर मनुष्य युद्ध नहीं करेगा, अंतिम इसलिए कि फिर मनुष्य के बचने की कोई संभावना ही नहीं हैं।
लेकिन मैं पूछता हूं कि क्या मनुष्य को युद्धों से नहीं बचाया जा सकता है? क्या जागतिक आत्मघात अपरिहार्य है?
नहीं, मनुष्य को निश्चित ही बचाया जा सकता है। लेकिन सवाल युद्धों का नहीं, सवाल राजनैतिक चित्त से मुक्ति का है। राजनैतिक चित्त से मुक्त हुए बिना मनुष्यता इस अस्वस्थ स्थिति से मुक्त नहीं हो सकती है।
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(2)
मैं एक छोटे से गांव में गया था। वहां एक नया मंदिर बन कर खड़ा हो गया था और उसमें मूर्ति प्रतिष्ठा का समारोह चल रहा था। सैकड़ों पुजारी और संन्यासी इकट्ठे हुए थे। हजारों देखने वालों की भीड़ थी। धन मुक्तहस्त से लुटाया जा रहा था। और सारा गांव इस घटना से चकित था। क्योंकि जिस व्यक्ति ने मंदिर बनाया था और इस समारोह में जितना धन व्यय किया था, उससे ज्यादा कृपण व्यक्ति भी कोई और हो सकता है, यह सोचना भी उस गांव के लोगों के लिए कठिन था। वह व्यक्ति कृपणता की साकार प्रतिमा था। उसके हाथों एक पैसा भी कभी छूटते नहीं देखा गया था। फिर उसका यह हृदय परिवर्तन कैसे हो गया था? यही चर्चा और चमत्कार सबकी जुबान पर था। उस व्यक्ति के द्वार पर तो कभी भिखारी भी नहीं जाते थे। क्योंकि वह द्वार केवल लेना ही जानता था। देने से उसका कोई परिचय ही नहीं था। फिर यह क्या हो गया था? जो उस व्यक्ति ने कभी स्वप्न में भी न किया होगा, वह वस्तुतः आंखों के सामने होते देख कर सभी लोग आश्चर्य से ठगे रह गए थे।
एक वृद्ध ने मुझसे भी पूछा ‘इसके पीछे रहस्य क्या है? क्या वह व्यक्ति बिल्कुल बदल गया है?’
मैंने उत्तर में एक घटना बताईः
एक छोटे से बच्चे ने रूपए का एक सिक्का गटक लिया था। उसे निकालने के लिए सब उपाय व्यर्थ हो गए थे। उसकी मां अपने पति से बार-बार कह रही थी ‘जल्दी करो और चिकित्सक को बुलाओ।’ पति ने एक-दो बार सुना और वह सिक्का निकालने की कोशिश करते-करते ही बोला ‘चिकित्सक? नहीं। मैं सोचता हूं कि धर्मगुरु को ही बुला लेना कहीं ज्यादा उचित है?’
पत्नी तो हैरान हो गई और बोली ‘धर्मगुरु? क्या तुम सोचते हो कि मेरा बच्चा बच नहीं सकेगा, जो धर्मगुरु को बुलाना चाहते हो?’
पति ने कहा ‘नहीं। इसलिए नहीं। बल्कि इसलिए कि किसी से भी रूपया निकलवा लेने में धर्मगुरुओं से ज्यादा कुशल और कोई नहीं होता है।’
फिर मैंने कहा ‘यह मत सोचना कि उस व्यक्ति का लोभ समाप्त हो गया। उसने मुझसे भी जानना चाहा है कि मंदिर बनवाने का परलोक में क्या फल होता है? यह सब दान-धर्म भी उसके लोभ का ही फैलाव है। यह उसकी पूर्व-वृत्ति का विरोध नहीं, वरन उसका ही और विस्तार है। जीवन हाथ में होता है तो लोभ धन जोड़ता है। और जब मृत्यु निकट आती है तो लोभ धर्म जोड़ता है। यह सब एक ही चित्त का खेल है। धर्मगुरु लोभ को नई दिशा दे देते हैं। वे धर्म के सिक्कों का प्रलोभन खड़ा कर देते हैं।
और मरता क्या न करता! लोभ की तृप्ति का और कोई मार्ग न देख वह अदृश्य सिक्कों को ही इकट्ठा करने में लग जाता है। निश्चय ही इसके लिए धर्मपुरोहितों को बदले में दृश्य सिक्के देने पड़ते हैं। ऐसे धर्मगुरु धन जोड़ते हैं और तथाकथित धार्मिक हो गया व्यक्ति धर्म जोड़ता है। और मृत्यु से लौट कर चूंकि कभी कोई नहीं आता, इसलिए यह पता भी नहीं चल पाता है कि खोए दृश्य सिक्कों के बदले में अदृश्य सिक्के मिलते भी हैं या नहीं?
और इस कारण धर्मगुरु का व्यवसाय अखंड बना रहता है। मृत्यु धर्मगुरु की बड़ी सहयोगिनी है। वही उसके धंधे का मूलाधार है। उसकी छाया में ही उसका शोषण चलता है।
वह व्यक्ति जरा भी नहीं बदला है। केवल उसके हाथों से जीवन बह चुका है। वह बूढ़ा हो गया है और मृत्यु की पद-ध्वनि उसे सुनाई पड़ने लगी है। और यह तो सर्वविदित ही है कि जहां मृत्यु है वहां धर्मगुरु है। वे तो मृत्यु के व्यवसायी ही हैं।’


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ओशो द्वारा लिखकर काट दिया गया
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(3)
एक अद्भुत स्वप्न मैंने देखा हैः
मैं एक भिखारी हूं और एक धनपति के द्वार पर खड़ा हूं। वह व्यक्ति अकूत धनराशि का मालिक है। लेकिन मुझसे भी बड़ा अगर कोई भिखारी है तो वही है। क्योंकि उसके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं हैं। उसकी धन की भूख का अंत ही नहीं हैं। धन उसे प्राणों से भी अधिक प्यारा है। वह उसके लिए प्राण खो सकता है, लेकिन प्राणों के लिए भी धन खोने का विचार नहीं कर सकता।
कहते हैं कि एक बार जंगल में उसे डाकुओं ने पकड़ लिया था और उससे पूछा था कि प्राण बचाने हैं या धन? तो उसने कहा था ‘प्राणों का मूल्य ही क्या है! और धन है तो सब कुछ है। आप प्राण ले लो लेकिन धन नहीं--धन बुढ़ापे में काम आता है।’
आह! ऐसा है वह व्यक्ति, और मैं उसके द्वार पर भीख मांगने खड़ा हूं। यह आशा के विपरीत ही आशा करना है।
और जो भीख मांगनी है, वह भी अजीब है। मैं केवल उसके पास स्वर्ण की जो अकूत राशि है, उसे देखना भर चाहता हूं। क्या वह इसके लिए राजी होगा? अब तक उसकी स्वर्णराशि देखने में कोई भी समर्थ नहीं हो सका है। लेकिन शायद मैं सफल हो जाऊं, क्योंकि उसे राजी करने की विधि भी मैं अपने साथ लेता आया हूं।
एक स्वर्ण मुद्रा मेरे पास है। वह मुझे वर्षों पहले कहीं पड़ी हुई मिल गई थी। उसे मैं रोज देख लेता हूं और खुश हो लेता हूं। बस यही उसका उपयोग है; जैसा कि सभी स्वर्ण मुद्राओं का होता है। और इसलिए मैंने सोचा है कि यदि इस स्वर्ण मुद्रा के बदले में उस धनपति की अकूत स्वर्ण मुद्राएं मुझे देखने को मिल जाएं तो मैं उन्हें इकट्ठी ही देख लूं और खुश हो लूं। सदा देखने के रोग से भी छुटकारा हो और इस एक स्वर्ण मुद्रा को सम्हालने की चिंता से भी मुक्ति मिले।
और जैसा कि मैंने सोचा था, वही हुआ है। मुझे देखते ही द्वार बंद कर लिए गए हैं। वह धनपति बूढ़ा स्वयं ही द्वार बंद कर रहा है। लेकिन, मैंने अपनी स्वर्ण मुद्रा निकाल कर सीढ़ियों पर पटक दी है। उसकी ध्वनि से बंद द्वार पुनः खुल गए हैं। वह बूढ़ा उस मुद्रा को बहुत ललचाई हुई आंखों से देख रहा है। और फिर सौदा तय हो गया है। वह उस स्वर्ण मुद्रा के बदले में अपने खजाने में मुझे ले जाने को तैयार हो गया है।
उसने सोचा हैः मैं केवल देखना ही तो चाहता हूं। और मात्र देखने के बदले में एक स्वर्ण मुद्रा पा लेनी, शत-प्रतिशत लाभ का सौदा है!
वह मुझे अपने तलघर में ले जाता है। निश्चय ही अकूत स्वर्ण उसके पास है। मेरी तो आंखें ही उस स्वर्ण पर नहीं टिक रही हैं। फिर मैं सब देख कर हंसने लगा। तो उस बूढ़े ने पूछा हैः ‘क्यों? हंसते क्यों हो?’
मैंने कहा है ‘मित्र, अब मेरे पास भी उतना ही धन है जितना कि आपके पास है।’
वह बूढ़ा चौक गया है और पूछ रहा हैः ‘यह कैसे हो सकता है! भिखारी तो हो ही--कहीं पागल भी तो नहीं हो?’
मैंने कहाः ‘आप इस धन का क्या उपयोग करते हैं? ज्यादा से ज्यादा इसे देखने का ही न! अब मैंने भी इसे देख लिया है--जी भर कर देख लिया है। तो क्या अब मैं भी उतना ही धनी नहीं हूं जितने कि आप हैं?’
चलते-चलते मैंने उस बूढ़े से पुनः कहा हैः ‘ठीक से सोचना कि भिखारी कौन है और पागल कौन है?’
वह बूढ़ा रो रहा है और फिर हंस भी रहा है।
उसने अपना खजाना खुला ही छोड़ दिया है।
और यह क्या... वह मेरे साथ ही हो लिया और कह रहा हैः ‘मैं अब न भिखारी हूं और न पागल ही हूं।’
और आश्चर्य से मेरी नींद खुल जाती है। और मैं सोचता ही रह जाता हूं कि वह व्यक्ति स्वप्न में इस भांति स्वस्थ हो सका तो क्या जाग्रत में जो विक्षिप्त हैं, वे स्वस्थ नहीं हो सकते हैं?


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(4)
परमात्मा ने मनुष्य को अपनी ही शक्ल में बनाया था। ऐसा मैंने सुना है। लेकिन, मनुष्य को देख के ऐसा प्रतीत होता है कि यह अफवाह भी मनुष्य की ही उड़ाई हुई है।
क्योंकि मनुष्य तो परमात्मा से जितना प्रतिकूल हो सकता है, उतना ही प्रतिकूल है।
या यह भी हो सकता है कि परमात्मा ने तो मनुष्य को अपने ही अनुरूप बनाया हो लेकिन बाद में मनुष्य ने उसमें सुधार कर लिया हो!
मनुष्य में परमात्मा की चीजों में सुधार कर लेने की गहरी बीमारी जो है। और इसे ही वह प्रगति कहता है।
यह भी कहा जाता है कि परमात्मा ने मनुष्य को देवताओं से थोड़ा ही नीचे बनाया था। शायद, इस नीचे होने को प्रारंभ मानकर वह नीचे से नीचे जाते-जाते इतना नीचे पहुंच गया है कि अब पशु भी कहीं ऊंचे पड़ गए हैं।
मनुष्य ने स्वयं ही अपनी दुर्गति भलीभांति कर ली है।
और उसने यह सब इतनी बुद्धिमत्ता से किया है कि परमात्मा भी शायद उसे दोषी नहीं ठहरा सकता है।
इसलिए शायद परमात्मा स्वयं को ही दोषी मान कर कहीं छिप गया है। दोषी वह है भी। मनुष्य को बनाने का दोष तो उसके ऊपर है ही! और मनुष्य इसके लिए कभी भी माफ नहीं कर सकता।
मनुष्य इसलिए ही परमात्मा से कई तरह के बदले लेता रहा है। स्वयं के विनाश में भी वह अपने सृष्टा से बदला ही ले रहा है।
वह पशु नहीं बनाया गया है, इसका बदला भी वह पशु से बदतर बन कर ले रहा है।
एक अद्भुत घटना मुझे स्मरण आती हैः
एक आदमी ने किसी पहाड़ी होटल के मालिक को लिख कर पूछा था कि क्या उसका कुत्ता भी उसके साथ होटल में ठहर सकता है?
उसे लौटती डाक से निम्न उत्तर उपलब्ध हुआः
प्रिय महानुभाव,
मैं होटल के व्यवसाय में विगत 30 वर्षों से हूं। और कुत्तों के संबंध में मेरा अनुभव अत्याधिक सुखद है। होटल में ठहरे किसी भी कुत्ते के कारण आज तक मुझे कभी पुलिस को नहीं बुलाना पड़ा है। आज तक किसी कुत्ते ने शराब पीकर भी होटल में कोई उत्पात का दृश्य खड़ा नहीं किया है। और न ही किसी कुत्ते ने मुझे झूठा चेक या जाली रूपए पकड़ा कर ही धोखा दिया है। न ही किसी कुत्ते ने धूम्रपान से होटल की किसी चीज को जलाया है। और न कोई कुत्ता किसी दूसरे की पत्नी को भगाकर यहां आकर ठहरा है। और न ही अब तक मैंने किसी कुत्ते के सूटकेस में होटल का कोई सामान ही पाया है। स्वभावतः कुत्ते के प्रति मेरे मन में बहुत श्रद्धा है और मैं आपके कुत्ते का हार्दिक स्वागत करता हूं।
पुनश्चः और यदि आपका कुत्ता आपके संबंध में भी भले आदमी होने का प्रमाण पत्र देने को राजी हो तो आप भी उसके साथ यहां आ सकते हैं।


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(5)
अधर्म सदा ही धर्म की आड़ खोजता है। ऐसे उसे सुरक्षा मिल जाती है।
खोटे सिक्के असली सिक्कों के नाम के बिना एक इंच भी तो नहीं चल सकते हैं!
परमात्मा के मंदिर हैं लेकिन उनमें आवास शैतान का है। शैतान ने बहुत पहले ही स्वयं को छिपाने की पूरी आयोजना कर ली है। कौन जाने दीए तले अंधेरा इसलिए ही छिपता हो कि ऐसे वह भी प्रकाश समझा जा सकता है!
असत्य सत्य के वस्त्र अकारण ही तो नहीं ओढ़ता है?
और घृणा प्रेम के शब्द व्यर्थ ही तो नहीं बोलती है?
मैंने सुना हैः
एक साधु सत्य पर बोल रहा था। उसने अपने प्रवचन के प्रारंभ में ही कहाः ‘मित्रो! मेरा आज का विषय हैः सत्य। और इसके पूर्व कि मैं बोलना शुरू करूं मैं एक बात आपसे जान लेना चाहता हूं कि आप में से कितने व्यक्तियों ने मैथ्यू का 69 वां अध्याय पढ़ा है?’
उस सभा भवन में जितने भी व्यक्ति थे, उनमें से केवल एक को छोड़ कर सबने अपने-अपने हाथ स्वीकृति में ऊपर उठा दिए थे। वह साधु इस पर हंसा था और बोला थाः ‘ठीक है। मित्रो, ठीक है! आप ही वे लोग हैं जिनसे मुझे बोलना है। क्योंकि मैथ्यू का 69 वां अध्याय जैसा कोई अध्याय ही नहीं हैं।’
और जब सभा समाप्त हो गई तो वह साधु उस व्यक्ति के पास गया था जिसने कि हाथ ऊपर नहीं उठाया था। निश्चय ही वह व्यक्ति अद्भुत था। क्योंकि ऐसे धार्मिक और सच्चे व्यक्ति धर्मसभाओं में कहां उपलब्ध होते हैं?
साधु ने उससे पूछाः ‘मित्र! यहां कैसे आ गए? ऐसे व्यक्ति तो धर्म-मंदिरों में कभी दिखाई नहीं पड़ते हैं। और आप में बड़ा नैतिक साहस है--आप भीड़ से भिन्न सत्य के पक्ष में भी हो सकते हैं! आपने असत्य हाथ नहीं उठाया, मैं इसके लिए आपका धन्यवाद करता हूं।’
वह आदमी डरा हुआ था। बोलाः ‘क्षमा करिये। मैं असल में सो गया था। अन्यथा ऐसे कैसे हो सकता था कि मैं हाथ न उठाता। मैं तो सदा सबके साथ हूं।’
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(6)
मैं मनुष्य के संबंध में सोचता हूं तो मुझे एक घटना याद आ जाती हैः
एक छोटे से बच्चे अलबर्ट के बाबत उसके बाल मंदिर के सारे अधिकारी चिंतित थे। वह जो भी बनाता था, सदा काले रंग में ही उसे रंगता था। वह काली गायें बनाता, काले मनुष्य, काले कुत्ते और काले मकान और एक दिन तो उसने एक काला सागर बनाया था जिसकी काली लहरें काले ही तट से टकरा रहीं थी। यही नहीं, ऊपर भी काला सूरज था और उसमें काली किरणें निकल रहीं थीं। चित्र में सभी कुछ काला ही काला था। और पहचानना भी कठिन था कि क्या-क्या है?
इससे उसके अध्यापकों का विचार में पड़ जाना स्वाभाविक ही था। क्योंकि, काले रंग का यह अतिशय मोह जरूर ही चित्त की किसी दुखी और उदास स्थिति का द्योतक था।
उस बच्चे की गृहस्थिति की खोजबीन की गई, लेकिन वहां तो सब कुछ ठीक था।
उसके साथियों से पूछा गया लेकिन कोई भी कारण नहीं मिलता था। वह तो सब भांति सामान्य और स्वस्थ था।
और तब अंततः एक मनोवैज्ञानिक से सलाह ली गई। मनोवैज्ञानिक ने सभी तरह के परीक्षण और विश्लेषण किए, लेकिन परिणाम कुछ भी न निकला। उसमें दुख या उदासी या आत्मविनाश की कोई भी वृत्ति न थी।
और अंततः जब वे थक कर सब निराश ही हो गए थे तो एक दिन उन्होंने काले रंग के प्रति मोह का कारण उससे ही पूछा; तो वह बोला कि मेरी रंग की डब्बी के सारे रंग खो गए हैं और केवल काला रंग ही मेरे पास शेष बचा है!
क्या ऐसा ही मनुष्य के संबंध में भी तो नहीं हो गया है? उसके ऊपर न मालूम क्या-क्या थोपा जाता रहा है और उसके संबंध में न मालूम कितने-कितने प्रकार के ऊहापोह और अनुमान किए जाते रहे हैं।
धर्मों ने, दर्शनों ने, विचारकों ने उसकी उसकी स्थिति के लिए क्या-क्या नहीं कहा है और उसे बदलने के लिए क्या-क्या योजनाएं नहीं प्रस्तुत की हैं।
समाज और राज्य भी उसे बदलने और बनाने के लिए क्या-क्या नहीं कर चुके हैं।
लेकिन एक बात सदा ही भूली जाती रही है। मनुष्य से स्वयं उसके संबंध में किसी ने भी कुछ नहीं पूछा है।


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(7)
विश्व युद्ध के बादल आकाश में हैं। और वे रोज घने से घने होते जा रहे हैं। मनुष्यता किसी बड़ी दुर्घटना के करीब है। और इस दुर्घटना में समस्त जाति की समाप्ति भी हो सकती है। लेकिन, हम ऐसे चले जा रहे हैं कि जैसे कहीं कोई खतरा ही नहीं हैं। और शायद हमारी यह बेहोशी ही सबसे बड़ा खतरा है। और हम बेहोशी में भी आंखें बंद कर लेने की सलाह देने वाले मार्गदर्शक भी हैं।
एक साधु से मैं यह कह रहा था। वे हंसे थे और बोले थेः ‘संसार तो ऐसे ही चलता रहता है। बस अपनी आंखें बंद कर लो। आंखें बंद कर लेने में ही सुख है।’
आह! यह सुख कितना महंगा पड़ा है। और ऐसे सुख लेने वालों के ही कारण जीवन अब कितना दुखमय है।
यह सुख है या कि निद्रा है?
यह सुख है या कि सुरा है?
यह सुख अफीम के नशे से कहां भिन्न है?
निश्चय ही माक्र्स ऐसे धर्म को ‘अफीम का नशा’ कहने में अक्षरशः सही था।
जीवन से भागने वालों के लिए आंख बंद कर लेना बहुत पुराना उपाय है। शुतुरमुर्ग भी इस उपाय को जानता है और संन्यासी भी जानते हैं। शुतुरमुर्ग शत्रु को देख रेत में मुंह गाड़ लेता है और सोचता है कि शत्रु नहीं हैं। उसके लिए न दिखाई पड़ना, न होने का सबूत हो जाता है।
और संन्यासी का भी तर्क क्या यही नहीं हैं?
और शराबी का भी तर्क क्या यही नहीं हैं?
एक मधुशाला से आधी रात गए दो मित्र बाहर निकले थे। वे दोनों खूब पिये हुए थे। वे अपनी कार में आ कर बैठे और घर की ओर चले। उनमें से ही एक कार चला रहा था। कार तीर की भांति सड़कों को चीरते हुए भाग रही थी। जरूर ही वे 60-70 की रफ्तार पर थे। दूसरे साथी ने घबड़ा कर कहाः ‘यह क्या कर रहे हो? क्या दुर्घटना करनी है? मेरा तो साहस छूटा जा रहा है।’ लेकिन चलाने वाले ने कहाः ‘घबड़ाने की क्या जरूरत है? मैं जैसे आंख बंद किए हूं वैसे ही तुम भी कर लो। आंखें बंद कर लेने से घबड़ाकर बिल्कुल ही नहीं मालूम होती है। और बड़ा सुख मिलता है।’
जीवन से आंखें बंद कर लेना आत्मघाती पलायन है। यह धर्म नहीं हैं।
धर्म पलायन नहीं है। धर्म तो जीवन पर विजय है। और विजय ने भागने वालों को कब वरा है?
जीवन का अत्यंत जागरूकता से, खुली आंखों से, सामना करना ही धर्म है। धर्म जब तक आंखें बंद करने वाला है, तब तक वह अधर्म की शरण है। आंखें बंद कर लेने की शिक्षा ने जगत को जितना नुकसान पहुंचाया है, उतना और किस ने पहुंचाया है?
वह शिक्षा बेहोशी और निद्रा की शिक्षा है।
और बेहोशी में मनुष्य वृक्ष की उन्हीं शाखाओं को काटता रहा है जिन पर कि वह बैठा है।
जीवन के प्रति चाहिए होश--चेतना--जागरूक बोध, क्योंकि तभी हम स्वयं को परिवर्तित कर सकते हैं। धर्म की क्रांति सचेतन व्यक्तित्व में ही फलित हो सकती है।
और व्यक्ति है इकाई। वह बदले तो ही समाज भी बदल सकता है। इसलिए, मैं व्यक्ति को आंखें बंद कर लेने को नहीं, वरन उन्हें पूर्णतया खोलने को कहता हूं। क्योंकि, मैं पृथ्वी पर अंधों का नहीं, आंख वालों का समाज देखना चाहता हूं।


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(8)
जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना क्या है? क्या यही नहीं कि मनुष्य को यह भी पता नहीं है कि वह कौन है? और स्वयं को न जानना, जीवन को ही न जानना है। और अपरिचित जीवन भी क्या जीवन है? अंधेरे में किसी भी भांति जिये जाने का नाम तो जीवन नहीं है। जीवन तो ज्ञान के प्रकाश में ही वस्तुतः जीवन बनता है।
मैं जब स्वयं को जानता हूं, तभी मैं हूं। अन्यथा मेरा होना या न होना बराबर ही है।
ज्ञान अस्तित्व को अर्थ देता है।
और अज्ञान है अर्थहीनता। अज्ञान में अर्थवत्ता हो भी कैसे सकती है?
जिसे मैं जानता ही नहीं हूं, वह अर्थवान या साभिप्राय कैसे हो सकता है? और जो अर्थहीन है वह अरुचिकर हो जाता है। वह ऊब बन जाता है। वह व्यर्थ और कोरी पुनरुक्ति प्रतीत होने लगता है। और इस अर्थहीन पुनरुक्ति से मुक्त होने का मन हो तो क्या कोई आश्चर्य है?
लेकिन यह मुक्ति दो प्रकार की हो सकती है। यह मुक्ति आत्मघात की दिशा ले सकती है या आत्म साधना की। आत्मघात में जीवन का अंत करने की तत्परता होती है और आत्म साधना में जीवन को जानने की।
अतंतः मनुष्य के सामने दो ही विकल्प हैंः या तो स्वयं को समाप्त करो या स्वयं को जानो।
कामू ने ठीक ही कहा है कि आत्मघात ही मनुष्य के लिए सबसे बड़ी दार्शनिक समस्या है।
लेकिन समाप्त करना क्या कोई हल है? और अर्थहीन जीवन की समाप्ति में कौन सा अर्थ हो सकता है? वह भी तो अर्थहीन हो गया! वह विकल्प मिथ्या है। वह स्वयं को जानने से बचने का ही उपाय है। वह तो जीवन की समस्या से आत्यंतिक पलायन है। तथाकथित संन्यास भी आंशिक रूप से आत्मघाती जीवन दृष्टि का ही प्रयोग है।
वास्तविक दिशा है आत्म साधना की, आत्म ज्ञान की। उससे अर्थहीनता विलीन हो जाती है और जीवन अपनी पूर्ण अर्थवत्ता में प्रकट होता है। जो मनुष्य, या जो युग आत्मज्ञान की दिशा खो देता है वह अनिवार्यतः आत्मघात में संलग्न हो जाता है।
क्या हम एक ऐसे ही युग में नहीं रह रहे हैं?
न्यूयार्क के एक ऊंचे भवन की 17 वीं मंजिल से एक युवक कूदने को तैयार खड़ा था। 16 वीं मंजिल पर भीड़ इकट्ठी थी और उसे समझा रही थी। लेकिन वह आत्महत्या के लिए बिल्कुल ही सन्नद्ध था। एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति ने उससे कहा ‘बेटे, अपने मां-बाप का तो विचार करो।’
वह युवक बोला ‘न मेरी मां है, न बाप है।’
वृद्ध ने कहा ‘तो अपनी पत्नी और बच्चों का ख्याल करो।’
युवक ने कहा ‘न पत्नी हैं, न बच्चे हैं।’
लेकिन वृद्ध हार मानने को राजी न था। उसने कहा ‘तो अपनी प्रेयसी का तो ध्यान रखो।’
वह युवक चिल्लाया ‘मैं स्त्रियों को घृणा करता हूं।’
अतंतः हार कर वृद्ध ने कहा ‘तो अपना ही विचार करो।’
और उसको पता है कि उस युवक ने क्या कहा? उसने कहाः ‘काश! मुझे यही पता होता कि मैं कौन हूं!’
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(9)
हम घने अंधकार में हैं। और यह अंधकार रोज-रोज बढ़ता ही जाता है। और आश्चर्य तो यही है कि अपने ही हाथों से इसे हम बढ़ाते हैं। आलोक से विमुख हो जाने का यह परिणाम है। सूर्य की ओर हम पीठ देकर खड़े हैं। जीवन के पथ पर धर्म है सूर्य, और जो धर्म की ओर पीठ कर लेता है वह अपने ही हाथों अंधकार में डूबा जाता है।
किसी द्वार पर एक शब्द-कोष बेचने वाला विक्रेता खड़ा था। वह शब्द-कोष बिना बेचे उस द्वार से हटने को राजी न था। गृहणी ने उसे टालने को कहा ‘बंधु, मुझे शब्द-कोष नहीं चाहिए। शब्द-कोष मेरे पास है। देखते नहीं हैं, वह सामने ही मेज पर रखा हुआ है।’
इस पर वह विक्रेता हंसा और बोलाः ‘देखें, आप मुझे मूर्ख न बना सकेंगी। वह शब्द-कोष नहीं, धर्मशास्त्र है।’
गृहणी तो जैसे हैरान रह गई। बात सत्य थी। वह धर्मशास्त्र ही था! एक क्षण तो वह कुछ पूछ ही न सकी। फिर सम्हल कर उसने कहाः ‘यह आप कैसे कह सकते हैं?’
वह विक्रेता बोलाः ‘देवी जी, यह बतलाना एकदम आसान है। ग्रंथ पर इकट्ठी धूल से क्या सब कुछ स्पष्ट नहीं हो जाता है?’
धर्म उपेक्षित है। और धर्म पर हमारी उपेक्षा की धूल जम गई है। और परिणाम है हमारा रास्ता अंधकार पूर्ण हो गया है।
धर्म पर से उपेक्षा की धूल झाड़नी है। और जैसे ही कोई यह कर पाता है, वैसे ही उसका जीवन आलोकित हो जाता है। लेकिन यह प्रत्येक को ही स्वयं के लिए करना होता है। मैं यह आपके लिए नहीं कर सकता हूं। क्योंकि, उपेक्षा आपकी है। वह आपकी दृष्टि है। उसे आपने ही निर्मित किया है और आप ही उसे नष्ट कर सकते हैं।
धर्म प्रकाश है। लेकिन वह प्रकाश उसे ही उपलब्ध होता है, जो कि उसे स्वयं में द्वार देता है।
मैं उपेक्षा से भरा हूं तो वह द्वार बंद है। और मैं जिज्ञासा में हूं तो वह द्वार खुल जाता है। वस्तुतः जिज्ञासा ही द्वार है। और उपेक्षा का जन्म या जिज्ञासा की हत्या दो प्रकार से होती है। एक है अंधी आस्तिकता, जो आंख बंद करके सब कुछ स्वीकार कर लेती है। और दूसरी है अंधी नास्तिकता, जो कि आंख बंद कर सब कुछ अस्वीकार कर देती है। और अंधेपन में जिज्ञासा कहां? खोज कहां?
अंधी आस्तिकता और अंधी नास्तिकता, दोनों ही जीवन सत्य के प्रति उपेक्षा बन जाती हैं। सत्य के प्रति जिज्ञासा तो केवल उसमें ही होती है जो कि न अंध स्वीकार में है, न अंध अस्वीकार में; वरन जानने को सदा ही स्वतंत्र, उन्मुख और उत्सुक है। ऐसे चित्त के द्वार बंद नहीं होते हैं। ऐसा चित्त खुला चित्त है। और खुले चित्त में सत्य का आगमन होता है।
सत्य ही धर्म है।
सत्य ही प्रकाश है।
सत्य ही प्रभु है।
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(10)
मैं कौन हूं? क्या इसका कोई समुचित उत्तर आपके पास है?
नहीं, मित्र! नहीं है। नहीं है। नहीं है।
क्योंकि, जो स्वयं को जान लेता है, वह सत्य को उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि, जो स्वयं को जान लेता है, वह आनंद को उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि, जो स्वयं को जान लेता है, वह अमृत को उपलब्ध हो जाता है।
लेकिन फिर भी जीवन यात्रा में हमारा अपना परिचय तो है ही! मैं यह हूं या वह हूं। मैं राजा हूं या रंक। इस पद पर हूं या उस पद पर। शिक्षित हूं या अशिक्षित। मेरा यह नाम है या वह। यह उपाधि है या वह। ऐसा ही कुछ जोड़-तोड़ हमारा परिचय है। निश्चय ही यह परिचय बहुत ऊपरी है और इससे वह बिल्कुल अस्पर्शित ही रह जाता है जो कि मैं हूं।
वह कौन है जो मैं हूं--यह तो हमें ज्ञात नहीं हैं, लेकिन उसने जो वस्त्र पहन रखे हैं, उनसे हमारी पहचान जरूर है। और वस्त्रों की हम पहचान को ही हम स्वयं का जानना माने हुए हैं। इससे ही इन वस्त्रों की इतनी रक्षा की जाती है, क्योंकि इनके खो जाने पर हम स्वयं को पहचान भी तो नहीं सकते हैं!
आह! क्या इस भांति वस्त्र ही हमारी आत्मा नहीं बन गए हैं? क्या हम मात्र वस्त्र ही हैं?
मैंने सुना है कि एक बार एक व्यक्ति के सभी वस्त्र खो गए थे तो वह यह भी नहीं पहचान सका था कि वह वही है। वह बेचारा आखिर पहचानता भी कैसे? क्योंकि, वह जिसे जानता था, वह तो खो गए वस्त्रों का जोड़ ही था! और वह स्वयं को तो जानता ही नहीं था, सो पहचानता कैसे? पहचानने के पूर्व जानना तो जरूरी है न?
प्रत्यभिज्ञा तो केवल उसकी ही हो सकती है, जिसका कि पूर्वज्ञान है।
यह हमारी स्थिति है।
लेकिन, इस पर हम हंसेंगे नहीं--क्योंकि यह स्थिति हमारी जो है!
और, अब मैं आपको एक घटना सुनाता हूं, उस पर आप जरूर ही हंसेंगे। क्योंकि वह घटना आपकी जो नहीं हैं!
एक सोए शेखचिल्ली के द्वार पर आधी रात में दो पुलिस के सिपाही दस्तक दे रहे थे। बहुत मुश्किल से घर के वासी ने द्वार खोला। द्वार खुलते ही उन सिपाहियों में से एक ने कहाः ‘मित्र माफ करना। हमने तुम्हें व्यर्थ ही तकलीफ दी। गांव के बाहर एक व्यक्ति की मृत-देह मिली है और हमें शक था कि कहीं वह तुम तो नहीं हो? लेकिन भगवान को धन्यवाद कि तुम कुशल हो। अच्छा, हम जाते हैं।’
लेकिन, शेखचिल्ली ने बहुत घबड़ा कर कहाः ‘ठहरो! क्या तुमने उसे ठीक से देख लिया था? उसकी उम्र कितनी है?’
‘करीब-करीब तुम्हारे जितनी ही।’
‘और उसकी लंबाई?’
‘इतनी ही जितनी कि तुम्हारी है।’
‘और क्या वह लाल टोपी पहने हुए है?’
‘हां’
‘हे भगवान! और क्या नीली कमीज भी?’
‘नहीं।’
‘आह! तब वह मैं नहीं हूं!’
मैं देख रहा हूं कि आप हंस रहे हैं।
लेकिन, मित्र, किस पर हंस रहे हैं? क्या वह शेखचिल्ली आप ही नहीं हैं?
सोचें।
सोचें।
सोचें।


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(11)
ज्ञान क्या है? केवल वही जो कि स्वानुभव है।
वह नहीं है ज्ञान जो कि सीखा जाता है, बल्कि वह है जो कि जाना जाता है।
और सीखने और जानने में आकाश-पाताल का अंतर है। सीखा जाता है औरों से। जाना जाता है स्वयं से। और, औरों से सीखा गया भीतर नहीं जाता। वह बाहर का है और इसलिए बाहर ही रह जाता है। वह स्मृति को तो भरता है लेकिन जीवन उससे अछूता ही रह जाता है। उससे अज्ञान तो मिटता ही नहीं है। उल्टे, अहंकार और फलीभूत हो जाता है। और अज्ञान पर अहंकार वैसे ही है जैसे करेला और वह भी नीम चढ़ा। वह रोग पर और महारोग है।
इसीलिए मैं कहता हूं कि शास्त्र से, शब्द से या अन्य से सीखे गए ज्ञान का कोई भी मूल्य नहीं हैं; क्योंकि वस्तुतः वह ज्ञान ही नहीं हैं।
ज्ञान वह है, जो कि स्वयं के साक्षात से जन्मता है। शेष सब बासे और मृत शब्दों का संग्रह है।
ज्ञान है जीवंत और ताजी अनुभूति, इसलिए वह अनिवार्यतः जीवन को बदलती है। उसके आलोक में जीवन स्वतः ही बदल जाता है। यही उसके स्वयं से जन्मे होने की कसौटी भी है।
जीवन न बदले तो जानना, कि जो जाना है वह ज्ञान नहीं है।
जीवन सत्य न हो उठे तो जानना कि जो जाना है वह स्वयं से नहीं हैं।
जीवन परमात्मा में प्रतिष्ठित न हो जाए तो जानना कि जो जाना है, वह ज्ञान नहीं, अज्ञान ही है।
क्या आपको ज्ञात है कि एक बार नर्क के अंतःवासियों ने स्वर्ग के निवासियों को धर्म-शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी?
नहीं। शायद आपको पता नहीं हैं। और आप आश्चर्य भी कर रहे हैं क्योंकि धर्म-शास्त्र पर नर्क के निवासियों का अधिकार ही क्या है!
शैतान के शिष्यों की इस चुनौती से ऐसा ही आश्चर्य देवताओं को भी हुआ था। और उन्होंने उनसे कहा था ‘क्या पागल हो गए हो? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है कि सभी धार्मिक व्यक्ति स्वर्ग में हैं? और ऐसी किसी भी प्रतिस्पर्धा में तुम्हारी हार पूर्व से ही सुनिश्चित है। हां, राजनीति शास्त्र पर विवाद के लिए तुम्हारे आमंत्रण में कोई अर्थ हो भी हो सकता है!’
‘वह तो ठीक है,’ शैतान के शिष्यों ने कहा ‘लेकिन, क्या आपको पता है कि पंडितगण कहां है? धर्म के जानने वाले होंगे स्वर्ग में लेकिन धर्म शास्त्र के जानकार तो सब हमारे पास हैं।’
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(12)
मैं आपके मन को जीवन के प्रति अत्याधिक शिकायत से भरा देखता हूं। यह चित्त दशा शुभ नहीं हैं। क्योंकि इस भांति जीवन के समस्त आनंदों से आप व्यर्थ ही वंचित रह जाते हैं। जीवन तो प्रत्येक के द्वार पर आनंद की भेंट लाता है लेकिन जो द्वार बंद होते हैं, वे उस भेंट को पाना तो दूर, जान भी नहीं पाते हैं। और ऐसे चित्त के पास अंत में आंसुओं के अतिरिक्त और कुछ भी शेष न रह जाता हो तो आश्चर्य ही क्या है?
एक छोटे से बच्चे ने भोजन करना करीब-करीब बंद कर दिया था। वह सूख कर हड्डी हो गया था। वह हर प्रकार के भोजन में कोई न कोई शिकायत खड़ी कर देता था। अंततः मां-बाप घबड़ा गए। उस बच्चे की अपेक्षाएं पूरी करना कठिन नहीं, असंभव ही हो गया था। सो वे उसे एक मनोचिकित्सक के पास ले गए। उस मनोवैज्ञानिक ने बड़े-बड़े बीमार ठीक किए थे। और पागलों का तो वह सबसे बड़ा चिकित्सक और विशेषज्ञ था। उसने उस बच्चे के मां-बाप को धैर्य बंधाया और कहाः ‘घबड़ाएं न। शीघ्र ही सब ठीक हो जाएगा।’ और फिर उसने बच्चे के सामने अच्छे से अच्छे, स्वादिष्ट से स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ बुलवाए, लेकिन वह बच्चा अद्भुत शिकायतों का धनी था कि उसने चिकित्सक की एक न चलने दी और अपनी हठ पर दृढ़ रहा। अंततः मनोवैज्ञानिक ने उससे ही पूछाः ‘बेटे, तुम्हीं बताओ कि तुम्हें क्या खाना है? वह जहां से भी उपलब्ध होगा, हम लाने को तैयार हैं।’
बच्चे ने शांति से कहाः ‘केंचुए।’
मनोवैज्ञानिक तो हैरान ही रह गया फिर भी वह हार मानने को राजी नहीं था और बगीचे से केंचुए इकट्ठे करके लाया। फिर केंचुओं की प्लेट उस छोटे से भोजन-शत्रु के सामने रख कर उसने कहाः ‘लो! खाओ।’
लेकिन, बच्चे के चेहरे पर मनचाहे केंचुए पा कर भी कोई प्रसन्नता न थी। उसने पुनः कहाः ‘मैं तले हुए केंचुए चाहता हूं।’
वह बेचारा मनोवैज्ञानिक केंचुए तल कर लाया। लेकिन, उस छोटे से आलोचक ने कहाः ‘मुझे केवल एक ही केंचुआ चाहिए।’
मनोवैज्ञानिक ने एक केंचुआ बचाकर, शेष सारे फेंककर उससे कहाः ‘लो! अब खाओ।’
लेकिन बच्चे ने पुनः कहाः ‘आधा आप खाइए।’
मनोवैज्ञानिक के सामने और भी बड़ी कठिनाई आ गई। लेकिन वह किसी भी भांति उस बच्चे को संतुष्ट करना चाहता था ताकि वह अस्वीकारवादी थोड़ा शिथिल पड़ सके और भोजन के लिए राजी हो सके। उसने आंखें बंद करके और परमात्मा का नाम लेकर किसी भांति आधा केंचुआ भी गटक लिया। और शेष आधा केंचुआ बच्चे के सामने रखा इस आशा से कि अब तो वह प्रसन्न होगा और उन दोनों के बीच समझ का कोई सेतु बन सकेगा। लेकिन नहीं, वह भूल में था। क्योंकि, बच्चा आधे केंचुए को देखकर जोर से रोने लगा।
उस मनोचिकित्सक ने घबड़ा कर पूछाः ‘क्यों, अब क्या मामला है?’
वह रोता हुआ बच्चा बोलाः ‘आपने मेरे हिस्से का आधा केंचुआ खा लिया है।’
जीवन में ऐसी दृष्टि दुख लाती है।
यह दुख को--सतत दुख को आमंत्रण है।
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(13)
एक बगीचे में दो युवा धर्म पुरोहित बैठे हुए थे। वे बगीचे में घूमते हुए धूम्रपान करना चाहते थे। और इसके लिए गुरु की आज्ञा लेनी जरूरी थी। सो वे दोनों गए। पहला युवक लौटा तो उसने देखा कि दूसरा पहले ही आ गया है और धूम्रपान कर रहा है। उसने आते ही क्रोध से कहाः ‘मुझे आज्ञा नहीं दी गई है।’
दूसरे युवक ने उसे शांति से देखा और पूछाः ‘तुमने पूछा क्या था?’
उसने कहाः ‘मैंने पूछा था कि क्या मैं ईश्वर-मनन करते हुए धूम्रपान कर सकता हूं?’
इस पर दूसरा युवक हंसने लगा और धुआं उड़ाते हुए बोलाः ‘आह! मैंने पूछा था कि क्य मैं धूम्रपान करता हुआ ईश्वर-मनन कर सकता हूं?’
जीवन जो हमें देता है, वह उससे हमारे लेने की पात्रता पर ही निर्भर है। अंततः प्रत्येक व्यक्ति ही उस सबके लिए जिम्मेवार है, जो कि वह पाता है या कि नहीं पाता है।
और जीवन के प्रति हमारे दृष्टिबिंदु में थोड़ा सा ही भेद, स्वर्ग और नर्क का भेद बन जाता है।
मैं पूछता हूंः ‘क्या यह सत्य नहीं हैं?’
और मेरे मित्र, उत्तर किसी शास्त्र में मत खोजना। उत्तर खोजना स्वयं के जीवन में। वहां उत्तर है। प्रत्येक का जीवन ही क्या उत्तर नहीं है?
मैं स्वर्ग में हूं या नर्क में--क्या यह मुझ पर ही निर्भर नहीं है? और मैंने जीवन से क्या पूछा था, यह नहीं; बल्कि कैसे पूछा था--सभी कुछ इसी पर निर्भर है। उस ‘कैसे’ में ही तो मेरी जीवन-दृष्टि है। वही तो मेरा जीवन-दर्शन है। और वही मेरे लिए दुख या आनंद, अंधकार या आलोक, नर्क या स्वर्ग बन जाता है।
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(14)
एक द्वार पर सुबह से ही बड़ी भीड़ थी। एक आदमी अपने घर के सामने मिट्टी में लोट रहा था। उसे देख कर राह चलते लोग रुक गए थे और पड़ोसी जमा हो गए थे। उसका कार्य ही ऐसा अनूठा और अद्भुत था!
और वह उसे बड़ी धर्मबुद्धि से कर रहा था। जैसे लोग मंदिरों में पूजा करते हैं, ऐसा ही कुछ भाव उसके कार्य में भी था। कुछ लोगों ने उसे रोकने का प्रयत्न भी किया लेकिन वह किसी की भी न सुनता था और मिट्टी में लोटता ही जा रहा था।
उसके इस भांति तड़पने का रहस्य सभी जानना चाहते थे, लेकिन किसी को कुछ भी पता न था। उसकी पत्नी जरूर घर में बैठी रो रही थी, लेकिन उसे भी इस भांति लोटने का कारण ज्ञात न था।
ऐसे वह बड़ा नेक आदमी था और अधिकतर धर्म शास्त्रों में डूबा रहता था।
अंततः दो-तीन व्यक्तियों ने किसी भांति उसे पकड़ कर रोक ही लिया और पूछा कि वह किस मुसीबत में फंसा है?
वह व्यक्ति कभी रोते नहीं देखा गया था लेकिन इस भांति रोके जाने से एकदम रो उठा और बोलाः ‘हे परमात्मा! ये अज्ञानी जीव मुझे क्यों सता रहे हैं?’ और फिर रोकने वाले लोगों से अत्यंत क्रोध में उसने कहाः ‘जाहिलो, तुमने मुझे रोक कर ठीक नहीं किया। मेरी साधना में तुमने बाधा दी है। क्या तुम्हें पता नहीं हैं कि बीज जब मिट्टी में मिल कर एक हो जाता है, तभी उसमें से फूल पैदा होते हैं? क्या कभी तुमने यह नहीं पढ़ा या सुना है कि ‘दाना खाक में मिल कर गुले-गुलजार होता है?’ पागलो, मैं इसी फलसफे पर अमल कर रहा हूं।’
उसने यह कहा था और वह फिर धूल में लोटने लगा था। और लोग धीरे-धीरे हट गए थे, क्योंकि किसी के धर्मकार्य में बाधा देना तो ठीक नहीं है।
और अब उसकी पत्नी ने भी रोना बंद कर दिया था। क्योंकि उसका पति कोई बुरा कार्य तो कर ही नहीं रहा था। धर्म-साधना से अच्छी बात और क्या है?
मैं भी उस भीड़ में था। और अब भी मैं रोज सुबह उस मार्ग से निकलता हूं।
उस व्यक्ति को अब कुछ शिष्य भी मिल गए हैं। वे सब भी भूमि में लोटते रहते हैं। अब वह अकेला नहीं है। उसका सम्प्रदाय खड़ा हो गया है। और अब तो उससे कोई कुछ भी नहीं कह सकता है। उस पर पहले जो लोग हंसे थे, वे ही अब उसे श्रद्धा से देखने लगे हैं।
वह तपस्वी जो हो गया है!
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(15)
क्या सत्य ने आपको पुकारा है? क्या सत्य की प्यास ने आपके प्राणों को आंदोलित किया है? क्या सत्य ने आपके स्वप्नों को झकझोरा है और जागने का आमंत्रण दिया है?
मैं सोचता हूं कि हां--अन्यथा आप मेरे पास क्यों एकत्रित होते? मैं तो स्वप्न-भंजक हूं और केवल वे ही इस द्वार पर आकर्षित होते हैं जिनकी कि खोज सत्य के लिए है।
लेकिन, मित्र, इसके पहले कि कोई सत्य को या परमात्मा को खोज सके, उसे स्वयं के संबंध में बहुत से सत्य जान लेने होते हैं।
और यह कार्य न तो बहुत प्रीतिकर ही है और न ही बहुत आसान। वस्तुतः तो स्वयं के संबंध में सत्यों का उद्घाटन अत्यंत कष्टपूर्ण और कठिन प्रक्रिया है। वह एक तपश्चर्या ही है। क्योंकि, हमने स्वयं को इतने असत्य वस्त्रों से ढांक रखा है कि उनसे मुक्त होना ऐसा ही प्रतीत होता है कि जैसे कोई हमारी चमढ़ी ही उतार रहा है।
लेकिन, इसके पूर्व कि कोई जान सके कि वह कौन है--यह जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि वह क्या है?
‘मैं क्या हूं’--इसे उसकी पूर्ण नग्नता में जानना सत्य की खोज का पहला चरण है।
और तभी ‘मैं कौन हूं?’ इसके अनावरण की यात्रा की जा सकती है।
जो स्वयं के तथ्य को भी नहीं जानता है, वह सत्य को कैसे जान सकता है। लेकिन, हमने तो स्वयं के कटु तथ्यों को सुस्वादु अतथ्यों से ढांक लिया है और यथार्थ की अग्नि को भ्रामक आत्म-प्रवंचनाओं की राख में छिपा दिया है। इस झूठे जाल के अतिरिक्त मनुष्य की न तो कोई अमुक्ति है और न कोई बंधन है।
और, स्वभावतः, जब तथ्यों के दर्शन से अतथ्य गिरते हैं; और सत्यों के आघात से झूठे व्यक्तित्व का ताशों के महल चरमराकर गिर पड़ता है तो हृदय को बहुत चोट पहुंचती है।
सत्य के खोजी के धैर्य की परीक्षा यहीं है।
जो यहां असफल हो जाता है, उसे सत्य के मंदिर की सीढ़ियों के भी दर्शन नहीं हो पाते हैं। उसे तो बाहर से और दूर से ही वापिस लौट आना पड़ता है।
एक सम्राट सत्य की खोज के लिए प्यासा हो गया था। वह साम्राज्य छोड़ कर सत्य की खोज में निकलने का था। उसकी विदाई का समारोह मनाया जा रहा था। देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति अपनी-अपनी शुभकामनाएं और श्रद्धा प्रगट करने राजधानी में उपस्थित हुए थे। राज्य भर के कवियों का भी आगमन हुआ था। और कवियों ने सम्राट की प्रशंसा में क्या-क्या नहीं लिखा था! सम्राट ने प्रत्येक कवि को एक-एक हीरा भेंट किया था। एक वृद्ध कवि ने भी सम्राट के लिए कुछ पंक्तियां लिखी थीं, लेकिन उनमें प्रशंसा नहीं थी। वरन जो सत्य था, वही था। वह सत्य कडुआ भी था।
उस वृद्ध की नासमझी पर सभी हैरान और क्रुद्ध थे। लेकिन जब सम्राट ने एक हीरा उस वृद्ध को भी भेंट किया तो वे सम्राट की नासमझी पर और भी ज्यादा चकित हो गए थे। और दूसरे दिन तो सबके आश्चर्य और शिकायत का ठिकाना ही न रहा था, जबकि ज्ञात हुआ कि शेष सबको दिए गए हीरे नकली थे और असली हीरा केवल उस वृद्ध को ही दिया गया था!
और, इस सबके संबंध में उस वृद्ध ने क्या कहा था?
उसने कहा थाः ‘मैं आश्वस्त हूं कि सम्राट सत्य खोज सकेगा। उसकी यह खोज व्यर्थ नहीं जाएगी। क्योंकि वह स्वयं के संबंध में सत्य सुनने के साहस का धनी है।’
मित्रो, क्या मैं आप सबके संबंध में भी ऐसा ही आश्वस्त हो सकता हूं?
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(16)
समाज रुग्ण है। समाज अस्वस्थ है। लेकिन, मैं इसके लिए किसे दोष दूं--किसे दोषी ठहराऊं? पूरा समाज ही तो सड़-गल गया है।
फिर भी दोषी को खोजता हूं तो क्या आपको ज्ञात है कि अंत में किसे दोषी पाता हूं?
ऊपर-ऊपर खोजता हूं तो कभी यह दोषी मालूम होता है तो कभी वह। लेकिन, जब गहरे खोजता हूं तो अंत में स्वयं को ही दोषी पाता हूं।
आप भी खोजें--हो सकता है कि आप भी अपने को ही दोषी पाएं। यदि न पाएं तो जानना कि खोज ऊपर ही ऊपर कर रहे हैं।
यह असंभव है कि मैं भागीदार न होऊं उस समाज के स्वास्थ्य या अस्वास्थ्य में जिसका कि मैं हिस्सा हूं।
आखिर समाज क्या है? समाज तो व्यक्ति और व्यक्ति का अन्तर्संबंध ही है न? इसलिए, दोषी है तो प्रत्येक व्यक्ति है। और दोषी नहीं है तो कोई भी नहीं है।
और चूंकि समाज रुग्ण है, इसलिए प्रत्येक दोषी है।
समाज दोषी है, इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई भी दोषी नहीं है।
नहीं, समाज दोषी है, इसका यही अर्थ है कि प्रत्येक दोषी है।
लेकिन, जब तक एक को केवल दूसरे का दोष दिखता है, तब तक कोई परिवर्तन नहीं हो सकता है।
क्योंकि, कोई अन्य किसी को कब बदल सका है? बदलाहट तो सदा व्यक्ति ही स्वयं में करने में समर्थ होता है।
वह शक्ति व्यक्ति में ही है। इसलिए, जिस दिन मैं स्वयं के दोष देखना शुरू करता हूं, उसी दिन वह बदलाहट प्रारंभ हो जाती है।
वस्तुतः स्वयं के दोषों को जानना और उन्हें न बदलना असंभव है।
ज्ञान क्रांति है।
असल में हम दूसरों के दोष देखते ही इसलिए है ताकि स्वयं के दोष देखने से बच सकें। यही उन्हें बदलने से बचने का उपाय है।
और क्या यह भी मुझे कहना होगा कि ऐसे उपाय करना समाज को तो रुग्ण करना है ही, साथ ही स्वयं का आत्मघात करना भी है!
एक घटना मुझे याद आती है। एक छोटे से स्कूल की घटना है। सुबह ही सुबह स्कूल खुला ही था कि अचानक ही स्कूल इंस्पेक्टर निरीक्षण के लिए आ पहुंचे थे। उन्होंने पहले ही कक्ष में पहुंचकर अध्यापक से कहाः ‘बताइए कि आपकी कक्षा में तीन सबसे चुस्त लड़के कौन से हैं? मैं उनकी गणित में परीक्षा लेना चाहता हूं।’
इस पर धीरे से उठ कर एक लड़का बोर्ड के पास पहुंचा। इंस्पेक्टर ने उससे जो सवाल पूछा, उसने चटपट हल कर डाला और वापस आकर अपनी जगह पर बैठ गया। फिर दूसरा लड़का उठा। वह भी पूछा गया सवाल हल करके अपनी जगह पर लौट गया। लेकिन तीसरे लड़के के आने में थोड़ी देर हुई। और जो लड़का आया भी, वह भी बहुत झिझकता हुआ बोर्ड के समीप पहुंचा। खड़िया उठा कर वह बोर्ड पर लिखा सवाल हल करने जा ही रहा था कि इंस्पेक्टर ने पहचाना कि यह तो वही लड़का है जो कि सबसे पहले आया था!
‘क्यों यह क्या तमाशा है?’ वे उस लड़के पर बरस पड़े। ‘तू मुझे चराने की कोशिश कर रहा है? क्या तू एक बार सवाल हल नहीं कर चुका है?’
वह लड़का झेंपा और जरा मुस्कुराया भी और बोलाः ‘क्षमा करिए, मैं एक और लड़के के स्थान पर आया हूं।’
‘एक और लड़के के स्थान पर? इसका क्या मतलब है? एक लड़का दूसरे के स्थान पर परीक्षा दे, ऐसी लज्जाजनक बात मैंने आज तक नहीं देखी है।’ इंस्पेक्टर ने लड़के के कान उमेठते हुए पूछाः ‘तू किसकी जगह आया है?’
‘अपने एक मित्र की जगह। वह क्रिकेट का मैच देखने गया है।’ लड़के ने कहा।
इतना सुनना था कि इंस्पेक्टर ने अध्यापक की ओर मुड़कर कहाः ‘महाशय! आपने यह बात कैसे होने दी? आप जानते हैं कि यह लड़का पहले भी सवाल हल कर चुका है। फिर भी आप चुपचाप खड़े हुए मुझे मूर्ख बनाया जाना देख रहे हैं? यह बड़ी शर्म की बात है।’
अध्यापक ने कुछ झिझकते हुए सफाई देने की कोशिश कीः ‘महानुभाव, माफ कीजिए। असल में मैं इन छात्रों को पहचानता नहीं हूं।’
‘क्या? इनके अध्यापक होकर भी आप इन्हें नहीं पहचानते हैं? यह कैसे संभव है भला?’
‘मैं इस कक्षा का अध्यापक नहीं हूं।’
‘तो फिर आप यहां क्यों खड़े हैं?’
‘मैं एक और अध्यापक के बदले यहां आया हूं। वे क्रिकेट का मैच देखने चले गए हैं।’
इस बार तो कक्षा में एकदम मृत-सन्नाटा छा गया। सारी कक्षा दम रोक कर प्रतीक्षा कर रही थी कि न मालूम इंस्पेक्टर साहब अब क्या कहेंगे या करेंगे?
लेकिन, बिल्कुल अनपेक्षित... इंस्पेक्टर महोदय थोड़ी देर तो चुपचाप ही खड़े रह गए और फिर मुस्कुराने लगे और फिर ऐसे बोले कि जैसे कुछ भी न हुआ होः ‘अपने भाग्य को धन्यवाद दीजिए कि आज असली इंस्पेक्टर निरीक्षण को नहीं आए हैं। वे क्रिकेट का मैच देखने गए हैं। मैं उनका मित्र, उनकी जगह आया हूं; वरना आप दोनों की आज खैर नहीं थी।’


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(17)
एक अद्भुत कथा हैः
एक बार उर्वशी के आकर्षण, सौन्दर्य और शक्ति की परीक्षा के लिए इन्द्र ने तीन ऋषियों को आमंत्रित किया था। स्वभावतः उर्वशी ने उस दिन अपने रूप को आकर्षक बनाने में कोई कसर न उठा रखी थी। उसके नृत्य को देख कर सभी देव मुग्ध हो उठे थे। लेकिन वे तीनो ऋषि शांत बैठे थे। सहसा उर्वशी ने अपना उत्तरीय उतार डाला और शरीर के ऊपरी भाग पर जो अलंकरण और वस्त्र थे, धीरे-धीरे उन सभी को उतारने लगी। तब एक ऋषि चिल्लाएः ‘उर्वशी! यह अनैतिकता है। बंद करो यह नाच। मैं इसे नहीं देख सकता हूं।’
लेकिन, इस पर दूसरे ऋषियों ने कहाः ‘नहीं देख सकते हो तो अपनी आंखें बंद कर लो। किन्तु नृत्य कैसे बंद हो सकता है?’
पहले ऋषि ने आंखों पर हाथ रख लिए। उर्वशी प्रसन्न हुई। एक ऋषि हार गए थे। नृत्य ने और गति पकड़ ली। धीरे-धीरे उर्वशी ने अधोवस्त्र भी उतारने शुरू कर दिए। तब दूसरे ऋषि चिल्ला उठेः ‘बंद करो यह नृत्य। ऐसी अश्लीलता असह्य है।’
लेकिन तीसरे ऋषि ने कहाः ‘मित्र, नहीं देख सकते हो तो तुम भी नेत्र मूंद लो। मैं यह नाच पूरा ही देखना चाहता हूं।’
दूसरे ऋषि ने भी आंखें मूंद ली। उर्वशी को एक विजय और मिल गई थी। विजय से उन्मत्त हो वह और भी गति और त्वरा से नाचने लगी। देवताओं ने ऐसा नृत्य कभी न देखा था। वे तो मंत्र मुग्ध हो बैठे थे। उन्हें अपना कोई होश भी न था। और तब उर्वशी ने शरीर के सारे वस्त्र उतार कर फेंक दिए। अंतिम आभूषण भी उतार दिया। तीसरे ऋषि शांति से सब देख रहे थे। फिर तो वह घबड़ा गई। अब उसके पास उतारने को और कुछ भी न रह गया था। वह पूर्ण नग्न थी।
और तभी तीसरे ऋषि ने कहाः ‘उर्वशी! रुक क्यों गईं? उतारो, अपनी इस केंचुल को भी उतार फेंको। मैं अंत तक देखना चाहता हूं। जो कुछ भी है, मैं उसे देखना चाहता हूं। मैं जानना चाहता हूं कि वह आकर्षण कहां है जो कि मनुष्य को खींचता और विक्षिप्त करता है?’
उर्वशी ने कहाः ‘अब आगे और कुछ भी नहीं है। आगे तो मांस और मज्जा है। और आकर्षण उनमें नहीं, मनुष्य के मन में है। लेकिन आपको अब यह आकर्षण नहीं सता सकेगा क्योंकि आपने आंखें नहीं मूंदी हैं। जो आंख खोल कर जीवन के पूर्ण सत्य को देख लेता है, वह समस्त आकर्षणों के पार हो जाता है।’
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(18)
अधर्म क्या है?
पाप क्या है?
अज्ञान क्या है?
आपके प्रश्न तीन हैं। लेकिन मेरा उत्तर एक है। और वह भी एक छोटे से शब्द में। वह शब्द हैः ‘मैं’।
अहंकार अधर्म है।
अहंकार पाप है।
अहंकार अज्ञान है।
अहंकार है चित्त में घिरे अंधकार की शरण स्थल। और इसलिए जो अंधकार से तो मुक्त होना चाहता है लेकिन अहंकार से नहीं; वह एक बिल्कुल ही व्यर्थ प्रयास में संलग्न है।
अहंकार के वस्त्रों में छिपा है सारा अधर्म। इसलिए जो अधर्म से तो मुक्त होना चाहता है लेकिन अहंकार को बचाता है, उसकी निष्फलता सुनिश्चित है।
अहंकार पाप है। लेकिन वह पुण्य के भवनों में निवास करता है और ऐसे उसने अपने लिए बड़ी सुदृढ़ सुरक्षा कर ली है।
अहंकार अपनी रक्षा के लिए धन कमाता है, धर्म कमाता है, ज्ञान जुटाता है, त्याग करता है। उसकी आत्मरक्षा के उपाय बहुत सूक्ष्म हैं। वह प्रत्येक रूप में स्वयं को बचाता है। और अंततः तो वह प्रभु में भी स्वयं को बचाने की कोशिश करता है। वह कहता है ‘मैं ब्रह्म हूं।’
आह! संसार में वह है। संन्यास में भी वह है।
लेकिन सब रूपों में--सब सूक्ष्म प्रक्रियाओं में उसे पहचाना और पकड़ा जा सकता है यदि उसकी आत्मरक्षा की केन्द्रीय विधि ध्यान में रहे तो।
उसकी केन्द्रीय विधि क्या है? अहंकार अपनी रक्षा और अपना पोषण करता हैः स्वयं के दोष न देखने में। इसलिए वह सदा औरों के दोष की ओर ही देखता रहता है।
अधर्म कहां है--और हम दूसरों में खोजने लगते हैं।
पाप कहां है--और हम दूसरों में खोजने लगते हैं।
अज्ञान कहां है--और हम दूसरों में खोजने लगते हैं।
और अहंकार इसी शिल्प से स्वयं को खोजे जाने से बचा होता है। और वह ऐसे न केवल स्वयं को पकड़े जाने से बचा ही लेता है, बल्कि स्वयं को और परिपुष्ट और सुदृढ़ भी कर लेता है। क्योंकि, दूसरे जितने दोषी सिद्ध होने लगते हैं, वह उतना ही निर्दोष दिखाई पड़ने लगता है। निंदा का रस अकारण ही नहीं हैं। वह स्वयं को निर्दोष देखने की ही परोक्ष विधि है।
निर्दोष होने में तो अहंकार की मृत्यु है। लेकिन निर्दोष दिखने में उसकी शक्ति और उसका जीवन है। इसलिए वह निर्दोष होने से बचना चाहता है। और निर्दोष दिखने को परिपुष्ट करता है। और मनुष्य के समक्ष सदा ये दो ही विकल्प हैं। और इन दोनों में से कोई एक ही चुना जा सकता है। जो निर्दोष होने को चुनता है, वह निर्दोष दिखने को नहीं चुन सकता। उसे तो स्वयं के दोष खोज-खोजकर जानने होते हैं। और जो निर्दोष दिखने को चुनता है, उसे स्वयं के दोष छिपाने और औरों के दोष खोजने होते हैं। वह औरों के दोषों को जानने और बड़ा करके देखने में जितना समर्थ हो जाता है, उतना ही उसके स्वयं के दोष छोटे और नगण्य हो जाते हैं। वह जिस क्षण पूर्णरूपेण दोष अन्य पर थोप देता है, उसी क्षण पूर्ण निर्दोष होने की भ्रांति भी स्वयं के लिए खड़ी कर लेता है। यह भ्रांति ही स्वयं के परिवर्तन और आलोकित जीवन की दिशा में जाने के द्वार पर सबसे बड़ा अवरोध बन जाती है।
एक रात्रि किसी चर्च में एक अज्ञात फकीर ठहरा। उस चर्च के धर्मगुरु ने उससे कहाः ‘मैं चाहता था कि आप भी कल हमारी धर्मसभा में बोलें, लेकिन मुझे आपसे कहने में संकोच होता है, क्योंकि यहां के लोगों ने एक बड़ी बुरी आदत सीख ली है कि वे अक्सर बीच सभा में से ही उठ कर चले जाते हैं।’
इस पर वह फकीर हंसा और बोलाः ‘मैं कल बोलूंगा। और तुम देखोगे कि एक भी व्यक्ति उठ कर नहीं जाता है। मैं मनुष्य की कमजोरी को भलीभांति जानता हूं।’
उस चर्च के धर्मगुरु को इस बात पर विश्वास तो नहीं आया क्योंकि वह अपने चर्च के लोगों को भलीभांति जानता था। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं और सोचा कि कल तक प्रतीक्षा करना और देखना ही उचित है।
और आश्चर्य कि कल वही हुआ जो कि उस फकीर ने कहा था। एक भी व्यक्ति सभा से उठ कर नहीं गया। उठ कर जाना तो दूर, कोई अपनी जगह से हिला तक नहीं। क्या उस फकीर ने कोई जादू कर दिया था? नहीं, उसकी तरकीब बड़ी सीधी-सादी थी। वह निश्चय ही मनुष्य की कमजोरी को जानता था; और उसने उस कमजोरी को ही उस दिन स्वयं की शक्ति बना लिया था।
वह अत्यंत साधारण बोलने वाला था। और उसके व्याख्यान में तो कोई भी नहीं रुक सकता था। लेकिन प्रवचन शुरू करने के पूर्व ही उसने कहाः ‘मित्रो, मैं आज दो प्रकार के लोगों से बोलने जा रहा हूं। पहले तो मैं पापियों से कुछ बातें करूंगा और फिर पुण्यात्माओं से। इसलिए जब मैं आधा बोल लूं तो पापी जा सकते हैं।
फिर, आधा बोलने पर उसने कहा भी कि पापी सब जा सकते हैं। वह उनके जाने के लिए थोड़ी देर ठहरा भी। लेकिन, नहीं, एक भी व्यक्ति जाने को उत्सुक नहीं था।
हां, लोग एक-दूसरे की ओर जरूर देख रहे थे--जो जिसे पापी समझता था, वह उसी की ओर देख रहा था और उसके जाने की प्रतीक्षा भी कर रहा था। लेकिन कोई अपनी ओर नहीं देख रहा था। इसलिए उस सभा से किसी के जाने का सवाल ही कहां था? चूंकि वहां कोई भी अपनी ओर देखने वाला नहीं था, इसलिए वहां कोई भी पापी नहीं था।
लेकिन, वह फकीर अद्भुत था। और वह आगे बोला भी नहीं। उसने बस इतना ही और कहाः ‘काश! आप में से कोई उठता और जाने को राजी होता तो उससे ही मैं वे आधी शेष रह गई बातें कहता जो कि मुझे पुण्यात्माओं से कहनी हैं।’
स्वयं के पापों को जानना और पहचानना पुण्यात्मा का पहला लक्षण है। वह एक नयी यात्रा का प्रारंभ है। क्योंकि, वह बोध ही व्यक्ति को अहंकार से अंततः मुक्त होने में समर्थ बनाता है।
और जहां अहंकार नहीं है, वहीं धर्म है, वहीं परमात्मा है।


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(19)
शरीर की निद्रा है और आत्मा की भी।
शरीर का जागरण है और आत्मा का भी।
लेकिन, साधारणतः मनुष्य शरीर की निद्रा और जागरण के अतिरिक्त और किसी निद्रा और जागरण से परिचित नहीं होता है।
एक बार किसी पहाड़ी सराय में मुझे दो साधुओं के साथ एक ही कक्ष में ठहरना पड़ा था। सर्दी की रात थी और बर्फीली हवाएं चल रही थीं। रात्रि के तीन बजे वे दोनों साधु उस कड़कती ठंड में उठ कर नदी स्नान करने जा रहे थे। यह उनका आनंद होता तो भी ठीक था। लेकिन नहीं, यह उसका आनंद नहीं, त्याग था। और त्याग था किसी प्राप्ति की आशा में।
उनके उठते ही मेरी नींद भी खुल गई। लेकिन मैं कम्बल ओढ़े लेटा हुआ था। उ
न्होंने शायद यह नहीं जाना था कि मैं जाग गया हूं। निश्चय ही मेरे सोने से, मेरे सुख से उन्हें ईष्र्या हुई होगी क्योंकि उनमें से एक ने दूसरे से कहाः ‘अंत में कहीं यदि यही सिद्ध हुआ कि हम गलत और ये सोने वाले लोग ही सही थे तो क्या होगा?’
यह सुन कर स्वभावतः मुझे हंसी आ गई थी और मैंने उनसे कहा थाः ‘मित्रो! जिसे तुम सोया समझ रहे हो, वह भी सोया हुआ नहीं हैं। और जिसे तुमने जागना समझा है, क्या वह भी कोई जागना है?’


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(20)
एक व्यक्ति मंदिर जा रहा था। मैंने उससे पूछाः ‘मित्र, मंदिर क्यों जा रहे हो?’
उसने हैरानी से मुझे देखा और कहाः ‘परमात्मा के दर्शन करने।’
मैं हंसने लगा तो उसने कहाः ‘इसमें हंसने की क्या बात है?’
मैंने कहाः ‘परमात्मा मंदिर में है तो फिर शेष जगह कौन है?’
वह व्यक्ति अब भी मुझे कभी-कभी मिला करता है लेकिन मुझसे बच कर निकलता है। उस पर मेरा प्रश्न उधार है। उसने अभी तक उसका उत्तर नहीं दिया है।
मैं आपसे भी यही पूछता हूं। क्योंकि, जब तक परमात्मा ‘कहीं’ है तब तक उसे नहीं पाया जा सकता है। जिस दिन बस ‘वही’ है, वह उसी दिन पा लिया जाता है। क्योंकि, फिर तो उसे खोना ही असंभव है। तब तो वस्तुतः वह सदा पाया ही हुआ है।
एक व्यक्ति आंखें बंद किए बैठा था। मैंने उससे पूछाः ‘मित्र, यह क्या कर रहे हो?’
उसने क्रोध से आंखें खोली और कहाः ‘मैं प्रभु स्मरण कर रहा हूं।’
अब मैं सोचता हूं कि क्या प्रभु का भी स्मरण किया जा सकता है। वह तो हमारा जीवन है। वह तो हमारी श्वांस-श्वांस है। उसका स्मरण कैसे हो सकता है? उसमें और स्वयं में उतना फासला भी कहां है?
यह मैंने उससे कहा था। लेकिन उसने आंखों के साथ-साथ दोनों हाथों से अपने कान भी बंद कर लिए थे। और मुझसे कहा थाः ‘मैं धर्म के विरोध में कुछ भी नहीं सुनना चाहता हूं।’
मैं आपसे पूछता हूं कि आप भी कहीं आंख-कान बंद कर लेने को तो धर्म नहीं समझते हैं?
एक व्यक्ति धर्मतीर्थ जा रहा था। मैंने उससे पूछाः ‘मित्र, तीर्थ किसलिए जा रहे हो?’
उसने कहा ‘पवित्र होने।’
मैंने पूछाः ‘क्या शेष समय अपवित्र होने का ही अभ्यास करते हो? क्या उचित नहीं हैं कि जीवन ही पवित्र हो और पवित्रता और कहीं न खोजनी पड़े? फिर क्या यह संभव भी है कि पवित्रता कहीं मिल सके जबकि जीवन में ही उसे नहीं पा लिया गया है। जीवन की पवित्रता के तीर्थ के अतिरिक्त और कोई तीर्थ कहां है? और जीवन की पवित्रता के मंदिर के अतिरिक्त और कोई परमात्मा का मंदिर कहां है?
वह व्यक्ति यह सुन कुछ सोच में पड़ गया था, तो मैं प्रसन्न हुआ।