Manuscripts ~ Shiksha, Shikshak Aur Samaj (शिक्षा, शिक्षक और समाज)

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Education, Teacher and Society

year
1968
notes
19 sheets
Published as Naye Manushya Ke Janma Ki Disha (नये मनुष्य के जन्म की दिशा) and later as chapter 1 (of 31) of Shiksha Mein Kranti (शिक्षा में क्रांति).
The transcripts below are not true transcripts, but copies from Shiksha Mein Kranti (शिक्षा में क्रांति).
see also
Osho's Manuscripts


sheet no original photo enhanced photo Hindi
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शिक्षा, शिक्षक और समाज
बाबई के शिक्षकों के बीच आचार्य श्री रजनीश के विचारोत्तेजक उद्गार
मेरे प्रिय!
मैं आपके बीच उपस्थित होकर अत्यंत आनंदित हूं। निश्चय ही इस अवसर पर मैं अपने हृदय की कुछ बातें आपसे कहना चाहूंगा। शिक्षा की स्थिति देख कर हृदय में बहुत पीड़ा होती है। शिक्षा के नाम पर जिन परतंत्रताओं का पोषण किया जाता है उनसे एक स्वतंत्र और स्वस्थ मनुष्य का जन्म संभव नहीं है। मनुष्य-जाति जिस कुरूपता और अपंगता में फंसी है, उसके मूलभूत कारण शिक्षा में ही छिपे हैं। शिक्षा ने प्रकृति से तो मनुष्य को तोड़ दिया है लेकिन संस्कृति उससे पैदा नहीं हो सकी है, उलटे पैदा हुई है--विकृति। इस विकृति को ही प्रत्येक पीढ़ी नई पीढ़ियों पर थोपे चली जाती है। और फिर जब विकृति ही संस्कृति समझी जाती हो तो स्वभावतः थोपने का कार्य पुण्य की आभा भी ले लेता हो तो आश्चर्य नहीं है। और जब पाप पुण्य के वेश में प्रकट होता है, तो अत्यंत घातक हो ही जाता है।
इसलिए ही तो शोषण सेवा की आड़ में खड़ा होता है, और हिंसा अहिंसा के वस्त्र ओढ़ती है, और विकृतियां संस्कृति के मुखौटे पहन लेती हैं। अधर्म का धर्म के मंदिरों में आवास अकारण नहीं है। अधर्म सीधा और नग्न तो कभी उपस्थित ही नहीं होता है। इसलिए यह सदा ही उचित है कि मात्र वस्त्रों में विश्वास न किया जाए। वस्त्रों को उघाड़ कर देख लेना अत्यंत ही आवश्यक है।
मैं भी शिक्षा के वस्त्रों को उघाड़ कर ही देखना चाहूंगा। इसमें आप बुरा तो न मानेंगे? विवशता है, इसलिए ऐसा करना आवश्यक है। शिक्षा की वास्तविक आत्मा को देखने के लिए उसके तथाकथित वस्त्रों को हटाना ही होगा। क्योंकि अत्यधिक सुंदर वस्त्रों में जरूर ही कोई अस्वस्थ और कुरूप आत्मा वास कर रही है; अन्यथा मनुष्य का जीवन इतनी घृणा, हिंसा और
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अधर्म का जीवन नहीं हो सकता था।
जीवन के वृक्ष पर कड़वे और विषाक्त फल देख कर क्या गलत बीजों के बोए जाने का स्मरण नहीं आता है? बीज गलत नहीं तो वृक्ष पर गलत फल कैसे आ सकते हैं? वृक्ष का विषाक्त फलों से भरा होना बीज में प्रच्छन्न विष के अतिरिक्त और किस बात की खबर है? मनुष्य गलत है तो निश्चय ही शिक्षा सम्यक नहीं है।
यह हो सकता है कि आप इस भांति न सोचते रहे हों और मेरी बात का आपकी विचारणा से कोई मेल न हो। लेकिन मैं माने जाने का नहीं, मात्र सुने जाने का निवेदन करता हूं। उतना ही पर्याप्त भी है। सत्य को शांति से सुन लेना ही काफी है। असत्य ही माने जाने का आग्रह करता है। सत्य तो मात्र सुन लिए जाने पर ही परिणाम ले आता है।
सत्य का सम्यक श्रवण ही स्वीकृति है।
शिक्षाशास्त्र से भी मेरी दृष्टि भिन्न और विरोधी हो सकती है। मैं न तो शिक्षाशास्त्री ही हूं और न समाजशास्त्री ही। किंतु यह सौभाग्य की बात है। क्योंकि जो जितना अधिक शास्त्र को जानते हैं, उनके लिए जीवन को जानना उतना ही कठिन हो जाता है। शास्त्र सदा ही सत्य के जानने में बाधा बन जाते हैं। शास्त्र से भरे हुए चित्त में चिंतन समाप्त हो जाता है। चिंतन के लिए तो निर्भार और पक्षपात मुक्त चित्त चाहिए न! शास्त्र और सिद्धांत पक्ष पैदा करते हैं। और तब जीवन और उसकी समस्याओं के प्रति निष्पक्ष और निर्दोष दृष्टि नहीं रह जाती है। शास्त्र जिसके लिए महत्वपूर्ण हैं, उसके समक्ष समाधान समस्याओं से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वह समस्याओं के अनुरूप समाधान नहीं, वरन समाधानों के अनुरूप ही समस्याओं को देखने लगता है! इससे जो मूढ़तापूर्ण स्थिति पैदा होती है, उससे समाधानों से समस्याओं का
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अंत नहीं, अपितु और बढ़ती होती है। मनुष्य का पूरा इतिहास ही इसका प्रमाण है।
मनुष्य का विचार और आचार इतना भिन्न, स्व-विरोधी क्यों है? शास्त्रों और सिद्धांतों के आधार पर जीवन पर थोपे गए समाधानों का ही यह परिणाम है। समाधान समस्याओं से नहीं जन्में हैं, उन्हें समस्याओं के ऊपर थोपा गया है। समाधान ऊपर हैं, समस्याएं भीतर हैं। समाधान बुद्धि में हैं, समस्याएं जीवन में हैं। और यह अंतद्र्वंद्व आत्मघाती हो गया है। सभ्यता के भीतर इस भांति जो विक्षिप्तता चलती रही है वह अब विस्फोट की स्थिति में आ गई है। उसके विस्फोट की संभावना से पूरी मनुष्यता भयाक्रांत है। लेकिन मात्र भयभीत होने से क्या होगा? भय की नहीं, वरन साहसपूर्वक पूरी स्थिति को जानने और पहचानने की जरूरत है।
मैं शास्त्रों को बीच में नहीं लूंगा, क्योंकि मैं समाधानों से अंधा नहीं होना चाहता। मैं तो आपसे कुछ ऐसी बातें करना चाहता हूं जो कि समस्याओं को सीधा देखने से पैदा होती हैं।
क्या यह संभव नहीं है कि हम जीवन को सीधा देख सकें? क्या यह संभव नहीं है कि हम जीवन को वैसा देखें जैसे कि पहले आदमी ने उसे देखा होगा? क्या हमारा मन उतनी सरलता और स्वतंत्रता और सहजता से जीवन को नहीं देख सकता है?
शिक्षा के समक्ष इसे मैं सबसे अहम समस्या मानता हूं।
शिक्षा व्यक्ति के चित्त को इतना बोझिल, जटिल और बूढ़ा कर दे कि उसका जीवन से सीधा संपर्क छिन्न-भिन्न हो जाए तो वह शुभ नहीं है। बोझिल और बूढ़ा चित्त जीवन के ज्ञान, आनंद और सौंदर्य, सभी से वंचित रह जाता है। ज्ञान, आनंद और सौंदर्य की अनुभूति के लिए तो युवा चित्त चाहिए। शरीर तो बूढ़ा होने को आबद्ध है, लेकिन चित्त नहीं। चित्त तो सदा युवा रह सकता है। मृत्यु के अंतिम क्षण तक चित्त युवा रह सकता है। और ऐसा चित्त ही जीवन और मृत्यु के रहस्यों को जान पाता है। ऐसा चित्त ही धार्मिक चित्त है।
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लेकिन शिक्षा तो चित्त को बूढ़ा करती है। यह चित्त को जगाती नहीं, भरती है; और भरने से चित्त बूढ़ा होता है। विचार भरने से चित्त थकता, बोझिल होता और बूढ़ा होता है! विचार देना, स्मृति को भरना है। वह विचार या विवेक का जागरण नहीं है। स्मृति विवेक नहीं है। स्मृति तो यांत्रिक है। विवेक है चैतन्य। विचार नहीं देना है, विचार को जगाना है। विचार जहां जाग्रत है, वहां चित्त सदा युवा है। और जहां चित्त युवा है, वहां जीवन का सतत संघर्ष है, वहां चेतन के द्वार खुले हैं और वहां सुबह की ताजी हवाएं भी आती हैं, और नये उगते सूरज का प्रकाश भी आता है। व्यक्ति जब दूसरों के विचारों और शब्दों की कैद में हो जाता है, तो सत्य के आकाश में उसकी स्वयं की उड़ने की क्षमता ही नष्ट हो जाती है। लेकिन शिक्षा क्या करती है? क्या वह विचार करना सिखाती है, या कि मात्र मृत और उधार विचार देकर ही तृप्त हो जाती है? विचार से जीवंत और शक्ति कौन सी है।
लेकिन मात्र दूसरों के विचारों को सीख लेने से जड़, और मृत भी कोई दूसरी जड़ता नहीं है। विचार संग्रह जड़ता लाता है। विचार संग्रह से विचार और विवेक का जन्म नहीं होता है।
विचार और विवेक के आविर्भाव के लिए यांत्रिक स्मृति पर अत्यधिक बल घातक है। उसके लिए तो विचार और विवेक के समुचित अवसर होने आवश्यक हैं। उसके लिए तो श्रद्धा की जगह संदेह सिखाना अनिवार्य है।
श्रद्धा और विश्वास बांधते हैं। संदेह मुक्त करता है।
लेकिन संदेह से मेरा अर्थ अविश्वास नहीं है, क्योंकि अविश्वास तो विश्वास का ही नकारात्मक रूप है--न विश्वास, न अविश्वास वरन संदेह--विश्वास और अविश्वास दोनों ही संदेह की मृत्यु हैं। और जहां संदेह की मुक्तिदायी
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तीव्रता नहीं है वहां न सत्य की खोज है, न प्राप्ति है।
संदेह की तीव्रता खोज बनती है। संदेह है प्यास, संदेह है अभीप्सा। संदेह की अग्नि में ही प्राणों का मंथन होता है और विचार का जन्म होता है। संदेह की पीड़ा विचार के जन्म की प्रसव पीड़ा है। और जो उस पीड़ा से पलायन करता है, वह सदा के लिए विचार के जागरण से वंचित रह जाता है।
क्या हममें संदेह है? क्या हममें जीवन के मूलभूत अर्थों और मूल्यों के प्रति संदेह है? यदि नहीं, तो निश्चय ही हमारी शिक्षा गलत हुई है। सम्यक शिक्षा का सम्यक संदेह के अतिरिक्त और कोई आधार ही नहीं है। संदेह नहीं तो खोज कैसे होगी? संदेह नहीं तो असंतोष कैसे होगा? संदेह नहीं तो प्राण सत्य को जानने और पाने को आकुल कैसे होंगे? इसलिए तो हम सब अत्यंत छिछली तृप्ति के डबरे बन गए हैं, और हमारी आत्माएं सतत सागर की खोज में बहने वाली सरिताएं नहीं हैं।
यह जड़ता किसने पैदा की है? निश्चित ही शिक्षा ने और शिक्षक ने। शिक्षक के माध्यम से मनुष्य के चित्त को परतंत्रताओं की अत्यंत सूक्ष्म जंजीरों में बांधा जाता रहा है। यह सूक्ष्म शोषण बहुत पुराना है। शोषण के अनेक कारण हैं--धर्म हैं, धार्मिक गुरु हैं, राजतंत्र हैं, समाज के न्यस्त स्वार्थ हैं, धनपति हैं, सत्ताधिकारी हैं।
सत्ताधिकारी ने कभी भी नहीं चाहा है कि मनुष्य में विचार हो, क्योंकि जहां विचार है, वहां विद्रोह का बीज है। विचार मूलतः विद्रोह है। क्योंकि विचार अंधा नहीं है, विचार के पास अपनी आंखें हैं। उसे हर कहीं नहीं ले जाया जा सकता। उसे हर कुछ करने और मानने को राजी नहीं किया जा सकता है। उसे अंधानुयायी नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए सत्ताधिकारी विचार के पक्ष में नहीं हैं, वे विश्वास के पक्ष में हैं। क्योंकि विश्वास अंधा है। और मनुष्य अंधा हो तो ही उसका शोषण हो सकता है। और मनुष्य अंधा हो तो ही उसे स्वयं उसके ही अमंगल में संलग्न किया जा सकता है।
मनुष्य का अंधापन उसे सब भांति के शोषण की भूमि बना देता है। इसलिए विश्वास सिखाया जाता है, आस्था सिखाई जाती
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है, श्रद्धा सिखाई जाती है। धर्मों ने यही किया है। राजनीतिज्ञों ने यही किया है। विचार से सभी भांति के सत्ताधिकारियों को भय है। विचार जाग्रत होगा तो न तो वर्ण हो सकते हैं, न वर्ग हो सकते हैं। धन का शोषण भी नहीं हो सकता है। और शोषण को पिछले जन्मों के पाप-पुण्यों के आधार पर भी नहीं समझाया और बचाया जा सकता है।
विचार के साथ आएगी क्रांति--सब तलों पर और सब संबंधों में--राजनीतिज्ञ भी उसमें नहीं बचेंगे और राष्ट्रों की सीमाएं भी नहीं बचेंगी। मनुष्य को मनुष्य से तोड़ने वाली कोई दीवाल नहीं बच सकती है। इससे विचार से भय है, पूंजीवादी राजनीतिज्ञों को भी, साम्यवादी राजनीतिज्ञों को भी। और इस भय से सुरक्षा के लिए शिक्षा के ढांचे की ईजाद हुई है। यह तथाकथित शिक्षा सैकड़ों वर्षों से चल रहे एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है। धर्म पुरोहित पहले इस पर हावी थे, अब राज्य हावी है।
विचार के अभाव में व्यक्ति निर्मित ही नहीं हो पाता है। क्योंकि व्यक्तित्व की मूल आधारशिला ही उसमें अनुपस्थित होती है। व्यक्तित्व की मूल आधारशिला क्या है? क्या विचार की स्वतंत्र क्षमता ही नहीं? लेकिन स्वतंत्र विचार की तो जन्म के पूर्व ही हत्या कर दी जाती है। गीता सिखाई जाती है, कुरान और बाइबिल सिखाए जाते हैं, कैपिटल और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो सिखाए जाते हैं--उनके आधार पर, उनके ढांचे में विचार करना भी सिखाया जाता है! ऐसे विचार से ज्यादा मिथ्या और क्या हो सकता है? ऐसे अंधी पुनरुक्ति सिखाई जाती है और उसे ही विचार करना कहा जाता है!
जहां आधार है, ढांचा है, विश्वास और श्रद्धा है, वहां विचार असंभव है। विचार के लिए तो समस्त ढांचों से मुक्त चित्त चाहिए। शिक्षा मन को ढांचे दे और पटरियां दे तो उचित नहीं है। उसे तो ढांचों में मन न ढल पाए ऐसी सावधानी और सजगता देनी चाहिए। उसे तो ऐसा बोध देना चाहिए कि
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संस्कारों में चित्त परतंत्र न हो पाए और व्यक्ति की स्वतंत्र चिंतन धारा का आविर्भाव भी हो सके।
ध्यान दिया जाए तो यह अवश्य ही हो सकता है। स्वतंत्र चिंतन के बीज तो प्रत्येक व्यक्ति में है। अनुकूल सुविधाओं में वे विकसित भी हो सकते हैं। स्वतंत्रता कौन नहीं चाहता है? स्वयं का विवेक और विचार कौन नहीं चाहता है? लेकिन यदि शिक्षा का पूरा यंत्र ही मनुष्य की स्वतंत्रता की जगह परतंत्रता के लिए तैयारी करता हो तो बात ही दूसरी है। तब तो वे थोड़े से व्यक्ति ही आश्चर्य का कारण हैं जो इस यंत्र से गुजर कर भी यंत्र बनने से स्वयं को बचा लेते हैं।
शिक्षालयों से गुजर कर स्वयं की प्रतिभा को बचा लेने से अधिक दुरूह कार्य और कोई भी नहीं है। विश्वविद्यालयों ने मौलिक प्रतिभाओं को नष्ट करने में अपनी कुशलता का चरम बिंदु तो बहुत पहले ही उपलब्ध कर लिया है।
मनुष्य की परतंत्रता के लिए ही अनुशासन पर अत्यधिक बल दिया जाता है। विवेक के अभाव की पूर्ति अनुशासन से करने की कोशिश की जाती है। विवेक हो तो व्यक्ति में और उसके जीवन में एक स्वतःस्फूर्त अनुशासन अपने आप ही पैदा होता है। उसे लाना नहीं पड़ता है। वह तो अपने आप ही आता है। लेकिन जहां विवेक सिखाया ही न जाता हो, वहां तो ऊपर से थोपे अनुशासन पर ही निर्भर होना पड़ता है। यह अनुशासन मिथ्या तो होगा ही। क्योंकि वह व्यक्ति के अंतस से नहीं जागता है और उसकी जड़ें उसके स्वयं के विवेक में नहीं होती हैं। व्यक्ति का अंतःकरण तो सदा भीतर ही भीतर उसके विरोध में सुलगता रहता है।
ऐसे अनुशासन की प्रतिक्रिया में ही स्वच्छंदता पैदा होती है। स्वच्छंदता सदा ही परतंत्रता की प्रतिक्रिया है। वह उसकी ही अनिवार्य प्रतिध्वनि है। स्वतंत्रता से भरी चेतना कभी भी स्वच्छंद नहीं होती है। मनुष्य को स्वच्छंदता के रोग से बचाना हो तो उसकी आत्मा को परिपूर्ण स्वतंत्रता का वायुमंडल मिलना चाहिए। लेकिन हम तो दो ही विकल्प जानते हैं--परतंत्रता या स्वच्छंदता। स्वतंत्रता के लिए तो हम अब तक तैयार ही नहीं हो सके हैं। अनुशासन--दूसरों से आया हुआ अनुशासन भी परतंत्रता है। ऐसा अनुशासन जगह-जगह टूट रहा है तो
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बहुत चिंता व्याप्त हो गई है। यह अनुशासन तो टूटेगा ही। यह तो टूटना ही चाहिए। उसके होने के कारण ही गलत हैं। उसकी मृत्यु तो उसमें ही छिपी हुई है। वह तो अराजकता को बलपूर्वक स्वयं में ही छिपाए हुए है। और बलपूर्वक जो भी दमन किया जाता है, एक न एक दिन उसका विस्फोट अवश्यंभावी है।
ऐसा अनुशासन हो तो व्यक्ति चेतना की सारी सहजता और आनंद छीन लेता है; और टूटे तो भी व्यक्ति को खंडहर कर जाता है। बाहर से आया हुआ अनुशासन सब भांति मनुष्य के अहित में है। शिक्षा बाह्यानुशासन से मुक्त होनी चाहिए। उसे तो व्यक्ति में प्रसुप्त विवेक को जगाना चाहिए।
फिर वह विवेक ही आत्मानुशासन बन जाता है। वैसी चर्या में न दमन होता है, न दबाव होता है। वैसी चर्या तो फूलों जैसी सहज और सरल होती है। और जीवन जब स्व-विवेक के प्रकाश में गति करता है तो अराजकता और स्वच्छंदता की संभावनाएं ही समाप्त हो जाती हैं। जहां दमन ही नहीं है, वहां अराजकता और स्वच्छंदता के विस्फोट भी असंभव हैं।
मैं पूछता हूं कि क्या हम मनुष्य को स्वतंत्र नहीं बना सकते हैं? स्वतंत्रता में स्वच्छंदता का भय मालूम होता है। क्योंकि हमने मनुष्य को परतंत्रताओं से दबा रखा है, और उसकी आत्मा सदा से ही उन परतंत्रताओं से छूटने को तड़फड़ाती रही है। और जब भी संभव हुआ है, उसने बंधन तोड़े हैं। लेकिन बंधन तोड़ने के प्रयास में वह जिस कटुता, कठोरता और विरोध से भर जाती है, उसके ही कारण स्वतंत्र तो नहीं होती, स्वच्छंद हो जाती है। स्वतंत्रता सृजनात्मक है, स्वच्छंदता विध्वंसात्मक। लेकिन यदि स्वच्छंदता से बचना हो तो स्वतंत्रता के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है।
शिक्षा निश्चय ही ऐसे आधार रख सकती है जो कि मनुष्य को स्वतंत्र बनाए। अनुशासित व्यक्ति अब नहीं चाहिए। स्वतंत्र और स्वयं के विवेक को उपलब्ध व्यक्ति चाहिए। उनमें ही आशा है और उनमें ही भविष्य है।
अनुशासन की प्रणालियों ने क्या किया है? मनुष्य में जड़ता और बुद्धिहीनता लाई है। अनुशासित व्यक्ति जड़ तो होगा ही। असल में जो जितना जड़ है उतना ही अनुशासित हो जाएगा। देखें, यंत्र कितने अनुशासित हैं? विवेक सदा ही ‘हां’ नहीं कह सकता है।
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उसे ‘नहीं’ कहना भी आना चाहिए। उसके ‘हां’ में भी तभी मूल्य और अर्थ है अब, जब वह ‘नहीं’ कहना भी जानता हो। लेकिन अनुशासन ‘नहीं’ कहना नहीं सिखाता है। वह तो सदा ‘हां’ ही की अपेक्षा करता है। कहा जाए--गोली चलाओ तो गोली चलाएगा। ऐसी जड़ता की शिक्षा के कारण ही तो दुनिया में युद्ध और हिंसा और भांति-भांति की मूर्खताएं चलती रही हैं और चल रही हैं।
क्या इस दुष्टचक्र को अब भी नहीं तोड़ना है? क्या अणु युद्ध के बाद ही अनुशासन लाने वाली शिक्षा बंद होगी? लेकिन तब तो बंद करने की कोई जरूरत ही नहीं होगी। क्योंकि तब न तो अनुशास्ता ही बचेंगे और न अनुशासित ही। मनुष्य के भविष्य के लिए अनुशासित बुद्धि के लोगों से जितना खतरा है, उतना किसी और से नहीं। क्योंकि वे केवल आज्ञाएं मानना ही जानते हैं। अणु-अस्त्रों को चलाने के लिए भी वे आज्ञाशील व्यक्ति सदा तैयार और तत्पर हैं! काश! अनुशासन की जगह विवेक सिखाया गया होता, आज्ञाकारिता की जगह विचार सिखाया गया होता! तो निश्चय ही दुनिया बिलकुल दूसरी ही हो सकती थी।
शिक्षा अनुशासन देने को नहीं, आत्म-विवेक देने को है। उससे ही जो अनुशासन फलित होगा, वही शुभ और मंगलदायी हो सकता है। क्योंकि उस अनुशासन का फिर शोषण नहीं किया जा सकता। धर्म पुरोहितों और राजनीतिज्ञों के हाथ में हिंसा और युद्ध के लिए उसे उपकरण नहीं बनाया जा सकता। उसके आधार पर हिंदू को मुसलमान से नहीं लड़ाया जा सकता है। और न राष्ट्रों की झूठी और कल्पित सीमाओं पर ही रक्तपात के तांडव-नृत्य किए जा सकते हैं। अनुशासन और आज्ञाकारिता के नाम पर मनुष्य से क्या नहीं कराया गया है?
समाज, शिक्षक के द्वारा नई पीढ़ी को इसी भांति अनुशासित करने का काम लेता रहा है। शिक्षक बहुत से शोषणों का औजार रहा है। वह बहुत से रोगों को संक्रमित करने वाला उपकरण है। और शायद उसे इसका पता भी नहीं है। क्योंकि वह स्वयं भी ऐसी ही शिक्षा का शिकार है! प्रत्येक पीढ़ी अपनी ईष्र्याएं,
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अपने द्वेष, अपने वैमनस्य, अपनी शत्रुताएं, अपनी मूढ़ताएं, सभी शिक्षक के द्वारा नई पीढ़ी को वसीयत में दे जाती है। अपने अनुभवों और ज्ञान के साथ ही साथ वे अपने रोग और जड़ताएं भी सौंप जाती हैं। और ज्ञान और अनुभव से भी ज्यादा आग्रह और सचेतता वे अपने रोगों को देने में बरतती हैं। क्योंकि उनकी शत्रुताएं और उनके अंधविश्वास उनके अहंकार ही होते हैं। हिंदू बाप अपने बच्चों को हिंदू होना सिखा जाता है, और जैन अपने बच्चों को जैन, और मुसलमान अपने बच्चों को मुसलमान। और मनुष्य विरोधी जिन संप्रदायों में वह पला था, उसी विष को वह अपने बच्चों को भी सौंप जाना चाहता है।
शिक्षा के अनेक-अनेक माध्यमों से यह विष फैलाया जाता है। और ऐसी विषाक्त सिखावन के कारण मनुष्यता एक नहीं हो पाती है। और उस धर्म के प्रति भी हमारी आंखें नहीं उठ पाती हैं जो कि एक है, और एक हो सकता है।
ऐसे ही राष्ट्रीयताएं सिखाई जाती हैं। और राष्ट्रीय अहंकारों को गौरवान्वित किया जाता है। एक देश को दूसरे देशों के विरोध में पाला-पोसा और खड़ा किया जाता है। परिणाम में हिंसा फलती-फूलती है और युद्धों की अग्नि जलती है।
जहां अहंकार हैं--वहां हिंसा है, वहां युद्ध हैं। ऐसे ही और भी बहुत से रोग हैं जिनके कीटाणु शिक्षक अबोध बच्चों में संक्रमित करते रहते हैं। मनुष्य के साथ किए जाने वाले जघन्य से जघन्य अपराधों में से एक यह है। शिक्षक अत्यंत जागरूक हो तो ही इस लांछना से वह बच सकता है।
समाज में जो सत्ताधिकारी हैं, वे समाज के ढांचे को कभी भी बदलना नहीं चाहते हैं। क्योंकि उनकी सत्ता, स्वार्थ और शोषण उस ढांचे पर ही निर्भर होता है। इस ढांचे को भी शिक्षक नये बच्चों के मनों में बैठाता रहता है। वह उन्हें गतानुगतिक बनाता रहता है और मृत परंपराओं से बांधता रहता है। वह उन्हें विद्रोह नहीं सिखाता है। और जहां विद्रोह नहीं है, वहां विकास नहीं है। शिक्षक का कर्तव्य क्या है? उसका कर्तव्य है विद्रोह सिखाना--जिस दिन भी शिक्षा
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विद्रोह होगी, उसी दिन एक बिलकुल ही नई मनुष्यता का जन्म हो सकता है।
विद्रोह से क्या अर्थ है?
विद्रोह से अर्थ है--मूल्यों में क्रांति! निश्चय ही जीवन मूल्य गलत हैं अन्यथा मनुष्य के जीवन में यह अशांति, यह अर्थहीनता, यह विभ्रांति क्यों होती? यह कुरूपता, यह हिंसा, यह ईष्र्या, यह अधर्म--यह सब क्या अकारण हैं? नहीं, जीवन मूल्य गलत हैं और उसका ही यह सहज परिणाम है!
जीवन मूल्य बदलने होंगे। मनुष्य के लिए नये मूल्य चाहिए। और उसके लिए एक बड़े विद्रोह की तैयारी आवश्यक है।
शिक्षक को निद्रा से जागना ही होगा। उसके अतिरिक्त और कोई भागीरथ नहीं है जो कि विद्रोह की गंगा को पृथ्वी पर ला सके। लेकिन शिक्षक बड़े भ्रमों में है। समाज उसे भूखा भले मारे लेकिन उसके प्रति आदर खूब दिखाता है। शिक्षक को सदा से ही आदर और सम्मान दिया गया है। वह गुरु है, सम्माननीय है, ऐसे उसके अहंकार को पोषित किया जाता है, और उसे भ्रम में डाला जाता है। और फिर उसके द्वारा नई पीढ़ियों को पुराने ढांचों में ढालने का कार्य लिया जाता है। ऐसे बड़े आदरपूर्वक शिक्षक का शोषण होता है। समाज शिक्षक को व्यर्थ ही आदर नहीं देता है। इस आदर के बदले बड़े सस्ते में वह बहुत महंगा काम उससे लेता है। मैं पूछता हूं कि क्या शिक्षकों को इसका बोध है?
मनुष्य का इतिहास मूर्खताओं से भरा है। अंधविश्वासों और अज्ञानों से सब कहीं डेरे डाल रखे हैं। लेकिन शिक्षक उस शृंखला से नई पीढ़ियों को अलग नहीं होने देता है। वह उसी शृंखला से ये नये आगंतुकों को बांधता चला जाता है। वह अतीत का चाकर है और इस भांति भविष्य का दुश्मन सिद्ध होता है। क्या यह उचित नहीं है कि अतीत का भार हमारे सिर पर न हो? वह पैरों के तले की भूमि बने यह तो ठीक, लेकिन सिर का बोझ बने यह तो ठीक नहीं है। भविष्य के निर्माण के लिए अतीत से मुक्त चित्त चाहिए।
अतीत के अनुभव मनुष्य के ज्ञान को बढ़ाएं लेकिन वे उसे बांधें नहीं। क्योंकि उसे उनसे भी आगे जाना है। अतीत उसकी यात्रा का प्रारंभ है, अंत नहीं। विगत पीढ़ी ने जहां उसे छोड़ा है, उसे उससे आगे जाना है। हर पीढ़ी को, पिछली पीढ़ी को, सब भांति पीछे छोड़ देना है। भौतिक दृष्टि से ही नहीं, मानसिक और आत्मिक दृष्टि से भी। निश्चय ही
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विदा होती पीढ़ी के अहंकार को इससे चोट लगती है। और इसी अहंकार के कारण वह अपने से आगे कोई भी यात्रा और विकास नहीं देखना चाहती है।
शायद प्रत्येक व्यक्ति में जो अहंता और ईष्र्या होती है वही अहंता और ईष्र्या पूरी पीढ़ी को भी पकड़ लेती है। पहले धर्मगुरु, आगे और धर्म संस्थापकों के जन्म मना ही कर गए हैं। प्रत्येक पैगंबर अपने आपको अंतिम बता गया है। और प्रत्येक ने स्वयं के सर्वज्ञ होने की भी घोषणा कर रखी है, और इस भांति ज्ञान के आगे और विकास के सब द्वार अवरुद्ध कर दिए हैं। स्वर्ण-युग तो पीछे थे! आगे तो सब पतन और ह्वास है। मनुष्य को अतीत के खूंटों से बांधना अत्यंत अकल्याणकर है। लेकिन पुरानी पीढ़ी तो अपने शास्त्र, अपने सिद्धांत, अपने गुरु सभी नई पीढ़ी पर थोप जाना चाहती है। सैकड़ों वर्षों से यह होता ही रहा है। और परिणाम में मनुष्य की आत्मा जितनी विकसित हो सकती थी वह नहीं हो पाई। उसे जो प्रौढ़ता मिल सकती थी वह नहीं मिल पाई। वह अतीत के पाषाणों के नीचे दबी है, और अतीत से इतनी भारग्रस्त है कि उसका सभी ऊध्र्वगमन बंद हो गया है।
शिक्षा को मनुष्य की आत्मा को निर्भार करना है। क्योंकि निर्भार आत्माएं ही परमात्मा के शिखरों तक गति कर सकती हैं। जड़ संस्कारों का भार चेतना के बीज को अंकुरित ही नहीं होने देता, और वह भूमि में दबा-दबा ही नष्ट होता रहता है। अतीत से निर्भार हुए बिना व्यक्ति के स्वयं के व्यक्तित्व का अंकुरण हो ही नहीं सकता है। अतीत की जकड़ ढीली हो तो ही मनुष्य में विकास होता है। अतीत तो सीढ़ी है जिस पर से गुजर जाना है। उसे सिर पर लिए फिरना समझदारी नहीं है।
संसार में भौतिक समृद्धि तो बढ़ती है, क्योंकि हर पीढ़ी उसे पिछली पीढ़ी से आगे ले जाती है। लेकिन आत्मिक समृद्धि नहीं बढ़ती, क्योंकि हमारे मन उस दिशा में अतीत से अत्यधिक बंधे हुए हैं। पिता ने जो मकान बनाया था, उसे और बनाने में पुत्र संकोच नहीं करता है। लेकिन राम, कृष्ण या बुद्ध या महावीर या क्राइस्ट जो वसीयत छोड़ गए हैं, उसके आगे बढ़ाने में कोई बहुत-बहुत गहरा भय हमारे प्राणों को रोक लेता है। यह सिखाया हुआ है, यह भय आरोपित किया हुआ है।
गीता पर टीका लिखी जा सकती है। लेकिन गीता से आगे विचार
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नहीं किया जा सकता। कुरान से आगे कुछ है ही नहीं। इससे मनुष्य-जाति अत्यधिक पंगु और आत्मिक दृष्टि से दीन-हीन हो गई है। बाप से बेटा आगे जाए इसमें उसका असम्मान या अपमान नहीं है। वस्तुतः इसमें ही उसका सम्मान है। यही उसका गौरव है।
प्रत्येक पीढ़ी को, हर नई पीढ़ी को इस भांति तैयार करना चाहिए कि वह उसे सब भांति पीछे छोड़ दे। वह उससे ही बंधी रहे और उसके दायरे में ही घूमती रहे यह इच्छा रुग्ण है और उससे स्वस्थ मन की सूचना नहीं मिलती है। यह विचार करना जरूरी है कि क्या शिक्षा इन रुग्ण लक्ष्मण-रेखाओं को खींचने में सहयोगी नहीं रही है?
मैं तो इस पागलपन को समझ ही नहीं पाता हूं। मेरा प्रेम तो यही कहता है कि जो मेरे पीछे जगत में आ रहे हैं, वे सब भांति मेरे आगे बढ़ें। वे एक ऐसी दुनिया बनाएं जिसकी कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उनकी आत्मा हम से उज्जवल हो, उनके विचार हमसे निर्मल हों। उनकी आंखें उन सत्यों का साक्षात्कार करें जो हम नहीं कर सके, और उनके चरण उन अज्ञात पथों का स्पर्श करें जो कि हमें स्वप्न में भी ज्ञात नहीं थे। प्रेम तो ऐसी ही प्रार्थनाएं कर सकता है। मैं न तो बच्चों को अपने ज्ञान से बांधना चाहूंगा और न अपने अनुभवों से ही। मैं तो उन्हें मुक्त करना चाहूंगा। प्रेम तो सदा मुक्त करता है। जो बांधता है, वह प्रेम ही नहीं है--वह तो हिंसा ही है।
शिक्षा भविष्योन्मुख होनी चाहिए, अतीतोन्मुख नहीं, तभी विकास हो सकता है। कोई भी सृजनात्मक प्रक्रिया भविष्योन्मुख ही हो सकती है। क्या यह उचित नहीं है कि हम भविष्य के लिए प्रेम और आदर सिखाएं? अतीत की अर्थहीन पूजा बहुत हो चुकी। क्या अब यह उचित नहीं है कि हम भविष्य के सूर्योदयों के लिए हमारे हृदयों में प्रार्थनाएं हों? लेकिन हम तो अतीत से बंधे हैं। अतीत यानी जो बीत गया है और अब सिवाय स्मृति के और कहीं भी नहीं है। हमारे सारे सिद्धांत, सारी धारणाएं, सारे आदर्श अतीत से ही लिए हुए हैं। इस भांति मृत का जीवित पर शासन है। मृत के प्रति सम्मान एक बात है, उसका शासन बिलकुल ही दूसरी बात है। बल्कि शासन के कारण ही स्वस्थ सम्मान भी संभव नहीं हो पाता है। शासन के प्रति तो भीतर ही भीतर प्रतिरोध भी संग्रहीत होता रहता है। अतीत के प्रति हार्दिक सम्मान तो तभी होगा जब कि अतीत का कोई भी शासन न हो; वह सम्मान अत्यंत आत्मिक होगा। और उस सम्मान में अनुग्रह होगा और कृतज्ञता होगी। वह कृतज्ञता हमें बांधेगी नहीं बल्कि और निर्भार और हल्का करेगी। हृदय उनके प्रति सहज ही कृतज्ञता से भर उठता है जो मुक्त करते हैं।
जो बांधते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता अस्वाभाविक है और असंभव है।
शिक्षा को ज्ञान का प्रसार कहा जाता है। निश्चय ही उसे ज्ञान का प्रसारक होना चाहिए। लेकिन जो बंधनों को भी प्रसारित करती हो वह ज्ञान की प्रसारक नहीं हो सकती है।
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ज्ञान तो वहां है, जहां मन मुक्त है। मन जहां बंधनों में है, वहां ज्ञान कहां? ज्ञान तो स्वयं ही मुक्ति है।
शिक्षा भय सिखाती है। शिक्षा प्रलोभन सिखाती है। शिक्षा ईष्र्या और प्रतिस्पर्धा सिखाती है। शिक्षा महत्वाकांक्षा के ज्वर में दीक्षा देती है। ऐसी शिक्षा ज्ञान की प्रसारक कैसे होगी? ऐसी शिक्षा मुक्तिदायी कैसे होगी? ऐसे मनुष्य स्वस्थ कैसे होगा? यह तो घातक रोगों का प्रसार है। मित्र, यह ज्ञान प्रसार तो नहीं है, यह तो अज्ञान का ही प्रसार है।
मैं देखता हूं तो पाता हूं कि भय से अधिक भयानक और कोई बीमारी नहीं है। जीवन में भय से अधिक भयभीत होने को और क्या है? भय तो प्राणों को लकवा ही मार देता है। भय तो विद्रोह की समस्त क्षमता को ही नष्ट कर देता है। भय तो परिवर्तन को असंभव ही बना देता है। भय ज्ञात से बांध देता है और अज्ञात की सब यात्रा बंद हो जाती है। जब कि जीवन में जो भी जानने और पाने योग्य है वह सब अज्ञात है।
परमात्मा अज्ञात है। सत्य अज्ञात है। सौंदर्य अज्ञात है। प्रेम अज्ञात है। किंतु भयभीत चित्त तो भय के कारण ज्ञात से ही चिपटा रहता है। वह तो लीक को कभी छोड़ता ही नहीं। वह तो परिचित पटरियों पर ही दौड़ता रहता है। वह तो यंत्रवत हो जाता है और उसकी गति कोल्हू के बैल से भिन्न नहीं होती है। धर्म भय सिखाते हैं--नरकों का भय, पापों का भय, दंडों का भय। समाज भय सिखाता है--असम्मान का भय। शिक्षा भी भय सिखाती है--असफलता का भय।
और साथ ही प्रलोभन हैं--स्वर्ग का प्रलोभन, पुण्य फलों का प्रलोभन, सम्मान, पद का प्रलोभन, प्रतिष्ठा का प्रलोभन, सफलताओं, पुरस्कारों का प्रलोभन। प्रलोभन भी भय के सिक्के के ही दूसरे पहलू हैं। इस भांति व्यक्ति-चेतना, भय से और लोभ से भर-भर जाती है। ईष्र्या और प्रतिस्पर्धा की अग्नि जलाई जाती है, महत्वाकांक्षा का ज्वर जगाया जाता है। फिर इन सब विवर्तों में जीवन नष्ट हो जाता हो तो कोई आश्चर्य नहीं है!
ऐसी शिक्षा खतरनाक है। ऐसे धर्म खतरनाक हैं। शिक्षा तो वह है जो अभय सिखाए, अलोभ में प्रतिष्ठा दे, साहस दे और विद्रोह की शक्ति दे--अज्ञात की चुनौती को मानने की हिम्मत दे। ईष्र्या, प्रतिस्पर्धा नहीं, प्रेम सिखाए। महत्वाकांक्षा की ज्वरग्रस्त गति नहीं, वरन सहज, स्वस्फूर्त विकास दे।
लेकिन यह तो तभी होगा जब हम प्रत्येक व्यक्ति की निजता की अद्वितीयता को स्वीकार करेंगे। किसी की किसी से तुलना आधारभूत भूल है। तुलना से स्पर्धा होती है। न कोई किसी से आगे है, न पीछे; न कोई किसी से ऊपर है, न नीचे। प्रत्येक वही है जो वह है और प्रत्येक को वही होना है। आदर्शों की सिखावन यह नहीं होने देती है। बच्चों को कहा जाता है, राम जैसे बनो, बुद्ध जैसे बनो, गांधी जैसे बनो। इससे भूल भरी बात और क्या होगी? क्या कोई किसी और जैसा बन सकता है या कि कभी बन सका है?
राम तो बनना असंभव है। हां, रामलीला के राम जरूर बन सकते हैं। इसी कारण तो संसार में इतना पाखंड
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है। पाखंड आदर्श की छाया है। जब तक आदर्श थोपे जाएंगे तब तक पाखंड भी रहेंगे। पाखंड को मिटाना है तो आदर्शों को छोड़ना आवश्यक है।
वस्तुतः कोई भी मनुष्य किसी दूसरे जैसा होने को पैदा नहीं हुआ है। प्रत्येक को स्वयं जैसा ही होना है। प्रत्येक को, उस बीज को ही वृक्ष तक पहुंचाना है जो कि उसमें ही छिपा है, और मौजूद है।
शिक्षा जिस दिन भी व्यक्ति की अद्वितीय और बेजोड़ निजता के सत्य को स्वीकार करेगी, उस दिन ही एक बड़ी क्रांति का सूत्रपात हो जाएगा। फिर हम किसी के ऊपर किसी और के ढांचे को नहीं थोपेंगे। वरन उस व्यक्ति के बीज में ही जो प्रसुप्त है उसके जागरण के लिए ही चेष्टारत होंगे। आदर्शों के कारण बहुत हिंसा होती रही है और व्यक्ति को वही होने का अवसर नहीं दिया जा सका है जो कि वह हो सकता है। और अन्य होने के प्रयास में अन्य तो कोई हो ही नहीं पाता है। हां, वह होने से जरूर वंचित रह जाता है जो कि वह हो सकता था।
मैं अत्यंत विनम्रता से यह निवेदन करना चाहता हूं कि मनुष्य को वही होने दें जो कि होने को वह पैदा हुआ है। गुलाब गुलाब है, और चमेली चमेली, और जुही जुही। और कोई किसी से न छोटा है, न बड़ा है। गुलाब को चमेली नहीं होना है और चमेली को जुही नहीं होना है। यह छोटे-बड़े और ऊंचे-नीचे का मूल्यांकन एकदम झूठा और बेहूदा है। इस मूल्यांकन को नष्ट करें। कवि चमार से बड़ा नहीं है और न राजनेता ही किसी से बड़ा है।
एक अध्यापक राष्ट्रपति होने से बड़ा नहीं हो जाता है। जीवन एक सहयोग है। उसमें सबका अपना-अपना स्थान है और सबकी आवश्यकता है और अनिवार्यता है। कार्यों के साथ पद और प्रतिष्ठा जोड़ने से सारी दुनिया जिस महत्वाकांक्षा की विक्षिप्तता में पड़ गई है, क्या यह आपको दिखाई नहीं पड़ रही है?
यह मूर्खतापूर्ण है कि गुलाब को जुही होने का उपदेश दिया जाए या कि घास के फूल को कमल होने के लिए उकसाया जाए। अर्थपूर्ण बात इतनी ही है कि गुलाब पूरा विकसित हो और घास का फूल भी पूरा विकसित हो। उनकी पंखुड़ियां अविकसित न रह जाएं और उनकी सुवास उनमें ही बंद न रह जाए। स्वयं की संभावनाएं पूरी विकसित हों, इसके अतिरिक्त जीवन का और कोई आनंद नहीं है। और शिक्षा के कार्य की सम्यक दिशा यही है।
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आदर्श सिखाने की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी का अनुसरण सिखाने की जरूरत है। व्यक्ति का निज व्यक्तित्व पूर्णता को कैसे प्राप्त हो, इस ओर ही सारे प्रयास केंद्रित होने चाहिए। और तब ही महत्वाकांक्षा से मुक्ति होगी और ईष्र्या के ज्वर से छुटकारा होगा। और एक ऐसा समाज निर्मित हो सकेगा जो कि समता और शांति को उपलब्ध हो सके। महत्वाकांक्षा से मुक्त समाज ही वर्गहीन और शोषण-शून्य हो सकता है।
क्या ऐसी शिक्षा नहीं हो सकती है जो कि महत्वाकांक्षा पर आधारित न हो? क्या गणित या संगीत इसलिए सीखा जा सकता है कि उन्हें सीखने वाले दूसरे साथियों से आगे निकलना है? क्या गणित के प्रेम से ही गणित और संगीत के आनंद से ही संगीत नहीं सीखा जा सकता है? मैं तो देखता हूं कि वस्तुतः संगीत तभी सीखा जा सकता है और उसकी गहराइयां तभी स्पर्श की जा सकती हैं, जब संगीत से ही प्रेम हो और किसी अन्य से प्रतिस्पर्धा नहीं।
प्रतिस्पर्धापूर्ण मन क्या संगीत को जानेगा? प्रतिस्पर्धा तो विसंगीत ही है। उन्होंने ही संगीत को जाना है जो संगीत में डूबे हैं, प्रतिस्पर्धा में दौड़े नहीं। दौड़ने और डूबने में विरोध है। दौड़ना तनाव है, डूबना विश्रांति है। दौड़ ज्वर है, वह स्वयं के बाहर ले जाती है। डूबना स्वास्थ्य है, क्योंकि डूब कर व्यक्ति स्वयं की ही आत्यंतिक गहराइयों में प्रतिष्ठा पाता है। विद्या तो डूबने की कला है। और जो दौड़ना ही सिखाती है, उसे मैं अविद्या कहता हूं।
एक दिन शिक्षकों की सभा में गया था। शिक्षक-दिवस का समारोह था। वहां मैंने उनसे कहा--एक शिक्षक राष्ट्रपति हो जाए तो इसमें शिक्षक का सम्मान क्या है? क्या शिक्षक नीचे और राष्ट्रपति ऊपर है? यदि ऐसा है तब तो यह शिक्षक या शिक्षा की प्रतिष्ठा नहीं, राजपद और राजनीति की ही प्रतिष्ठा है। हां, एक राष्ट्रपति अपना पद छोड़ शिक्षक हो तब शायद शिक्षक के लिए सम्मान की बात हो भी सकती है।
राजपदों को हम जब तक ऊपर रखते हैं, तब तक हम बच्चों को जाने-अनजाने राजनीति ही सिखाते हैं। हालांकि राजनीतिज्ञ कहते हैं कि शिक्षकों और विद्यार्थियों को राजनीति से कोई वास्ता नहीं रखना चाहिए। राजपदों की प्रतिष्ठा दूसरों में भी आकांक्षा को जगाती है। और यदि दूसरे शिक्षक होना छोड़ शिक्षामंत्री और उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति होने के सपने देखते हों, उन स्वप्नों को पूरा करने के लिए दौड़-धूप करते हों, तो आश्चर्य कैसा? यह तो स्वाभाविक ही है। और अन्य शिक्षक भी यदि शिक्षक-जाति को सम्मानित कराने में लगे हों तो
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कुछ बुरा तो नहीं है!
शिक्षा को महत्वाकांक्षा से मुक्त होना ही चाहिए। महत्वाकांक्षा ही तो राजनीति है। महत्वाकांक्षा के कारण ही तो राजनीति सबके ऊपर, सिंहासन पर विराजमान हो गई है। सम्मान वहां है, जहां पद है। पद वहां है, जहां शक्ति है। शक्ति वहां है, जहां राज्य है।
इस दौड़ से जीवन में हिंसा पैदा होती है। महत्वाकांक्षी चित्त हिंसक चित्त है। अहिंसा के पाठ पढ़ाए जाते हैं। साथ ही महत्वाकांक्षा भी सिखाई जाती है। इससे ज्यादा मूढ़ता और क्या हो सकती है?
अहिंसा प्रेम है। महत्वाकांक्षा प्रतिस्पर्धा है। प्रेम सदा पीछे रहना चाहता है। प्रतिस्पर्धा आगे होना चाहती है। क्राइस्ट ने कहा हैः ‘धन्य हैं वे जो पीछे होने में समर्थ हैं।’ मैं जिसे प्रेम करूंगा, उसे आगे देखना चाहूंगा और यदि मैं सभी को प्रेम करूंगा तो स्वयं को सबसे पीछे खड़ा कर आनंदित हो उठूंगा। लेकिन प्रतिस्पर्धा प्रेम से बिलकुल उलटी है। वह तो ईष्र्या है। वह तो घृणा है। वह तो हिंसा है। वह तो सब भांति सबसे आगे होना चाहती है।
इस आगे होने की होड़ की शुरुआत शिक्षालयों में ही होती है और फिर कब्रिस्तान तक चलती है। व्यक्तियों में यही दौड़ है। राष्ट्रों में भी यही दौड़ है। युद्ध इस दौड़ के ही तो अंतिम फल हैं। यह दौड़ क्यों है? इस दौड़ के मूल में क्या है? मूल में है--अहंकार! अहंकार सिखाया जाता है, अहंकार का पोषण किया जाता है।
छोटे-छोटे बच्चों में अहंकार को जगाया और जलाया जाता है। उनके निर्दोष और सरल चित्त अहंकार से विषाक्त किए जाते हैं। उन्हें भी प्रथम होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। स्वर्ण-पदक और सम्मान और पुरस्कार बांटे जाते हैं। फिर यही अहंकार जीवनभर प्रेत की भांति उनका पीछा करता है और उन्हें मरते दम तक चैन नहीं लेने देता।
विनय के उपदेश दिए जाते हैं और सिखाया अहंकार जाता है। क्या वह दिन मनुष्य-जाति के इतिहास में सबसे बड़े सौभाग्य का दिन नहीं होगा जिस दिन हम बच्चों को अहंकार सिखाना बंद कर देंगे? अहंकार नहीं, प्रेम सिखाना है। और प्रेम वहीं होता है, जहां अहंकार नहीं है।
इसके लिए शिक्षण की आमूल पद्धति ही बदलनी होगी। प्रथम और अंतिम की कोटियां तोड़नी होंगी। परीक्षाओं को समाप्त करना होगा। और इन सबकी जगह जीवन के उन मूल्यों की स्थापना करनी होगी जो कि अहंशून्य और प्रेमपूर्ण जीवन को सर्वोच्च जीवन-दर्शन मानने से पैदा होते हैं।
प्रेम जब प्रतिस्पर्धा की जगह लेता है तब सहज ही सफलता की जगह सत्य की प्रतिष्ठा हो जाती है। सफलता ही जिस जीवन-व्यवस्था में एकमात्र मूल्य है, वहां सत्य
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नहीं हो सकता है। सफलता की केंद्रीय महत्ता ने सफलता के प्राण ही ले लिए हैं। नहीं, सफल हो जाना ही सब कुछ नहीं हैं। मात्र सफलता कोई मूल्य ही नहीं है। एक बुरे काम में सफल होने की बजाय एक शुभ कार्य में असफल होना भी ज्यादा मूल्य की और गौरव की बात है। प्रतिस्पर्धा में सफल होने की बजाय प्रेम में असफल होना ही कहीं ज्यादा शुभ है। धन में सफल होने की बजाय धर्म में असफल होना भी क्या ज्यादा मूल्यवान नहीं है?
मैं जीवन का मूल्य, मात्र सफलता में ही नहीं देखता हूं। मैं उसे देखता हूं सत्य में, शिवत्व में, सौंदर्य में; लेकिन सफलता ही जब तक हर बात का मापदंड है तब तक सत्य की, शिव की और सौंदर्य की और मनुष्य की आत्मा गतिमान नहीं हो सकती है। सत्य के लिए, शिवत्व के लिए, सौंदर्य के लिए, असफलता को भी सीखा जाना चाहिए। उस दिशा में असफलता भी गौरव है, यही दृष्टि पैदा होनी चाहिए। सत्य के लिए हार जाना भी जीत है। क्योंकि उसके लिए हारने के साहस में ही आत्मा सबल होती है और उन शिखरों को छू पाती है, जो कि परमात्मा के प्रकाश से आलोकित हैं।
विजय और पराजय अर्थहीन हैं। अर्थ है मोर्चे का, किस मोर्चे पर विजय या पराजय--सत्य के या असत्य के, प्रेम के या घृणा के, मनुष्य के या दानवता के?
और मैं कहता हूं कि धन्य हैं वे लोग जो कि असत्य की विजय को छोड़ते हैं और सत्य के साथ पराजय को आलिंगन करते हैं, क्योंकि इस भांति हार कर भी वे जीत जाते हैं और मिट कर भी उसे पा लेते हैं जो कि अमृत है। लेकिन यह सब तभी संभव है जब शिक्षा में आमूल क्रांति हो और मात्र सफलता और विजय के वे मूल्य अपदस्थ हों जिन्होंने कि सदियों से मनुष्य को पीड़ित कर रखा है।
सत्य की दिशा में सबसे बड़ा अपराध तो तब हो जाता है, जब हम सत्य के संबंध में रूढ़ धारणाओं को बच्चों के ऊपर थोपने का आग्रह करते हैं। यह आग्रह अत्यंत घातक दुराग्रह है।
परमात्मा और आत्मा के संबंध में विश्वास या अविश्वास बच्चों पर थोपे जाते हैं। गीता, कुरान, कृष्ण, महावीर उन पर थोपे जाते हैं। इस भांति सत्य के संबंध में उनकी जिज्ञासा पैदा ही नहीं हो पाती है। वे स्वयं के प्रश्नों को ही उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, और तब स्वयं के समाधानों को खोज लेने का तो सवाल ही नहीं है।
बने-बनाए तैयार समाधानों को ही वे फिर जीवन भर
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दोहराते रहते हैं। उनकी स्थिति तोतों के जैसी हो जाती है। पुनरुक्ति चिंतन नहीं है। पुनरुक्ति तो जड़ता है। सत्य किसी और से नहीं पाया जा सकता है, उसे तो स्वयं ही खोजना और पाना होता है।
क्या यह उचित नहीं है कि बच्चों की जिज्ञासा जगाई जाए लेकिन उन्हें समाधानों से न जकड़ा जाए? उनमें प्रश्न पैदा किए जाएं, लेकिन उन्हें उधार उत्तरों से न भरा जाए? शिक्षा यदि उन्हें जीवन सत्य के अनुसंधान की महत यात्रा पर ही भेज सके तो उसका कार्य पूरा हो जाता है।
मेरी दृष्टि में शिक्षक वही है जो प्रसुप्त समस्याओं को जगा देता है, और जिज्ञासा को जाग्रत कर देता है, और बच्चों को उनके स्वयं के अनुसंधान के लिए साहस और अभय से भर देता है। लेकिन कोई भी व्यक्ति इस अर्थ में शिक्षक तभी हो सकता है, जब वह स्वयं आग्रहों और पक्षपातों से मुक्त हो।
इसलिए शिक्षक होना बड़ी साधना है। शिक्षक होने के लिए अत्यंत विद्रोही, सजग और सचेत आत्मा चाहिए। जिस शिक्षक में विद्रोह की अग्नि नहीं है, वह जाने या अनजाने किसी स्वार्थ, किसी नीति, किसी धर्म, या किसी राजनीति का दलाल हो ही जाएगा। क्योंकि तब वह उन पक्षपातों को और उन धारणाओं को बच्चों पर आरोपित करेगा जिनमें कि वह स्वयं ही कैद है।
शिक्षक स्वयं स्वतंत्र हो तभी वह विद्यार्थी के लिए भी स्वतंत्रता का संदेशवाहक हो सकता है। इसलिए मैंने कहा कि शिक्षक होना बड़ी साधना है। वह बड़ा विद्रोह है। शिक्षक के भीतर-भीतर एक ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए--चिंतन की, विचार की, विद्रोह की। उसे बहुत कुछ विध्वंस भी करना है ताकि वह सृजन कर सके। उसे बहुत कुछ मिटाना है ताकि वह कुछ बना सके। उसे परंपराओं से छोड़ा गया बहुत सा कूड़ा-करकट जलाना है और व्यर्थ के घासपात से मनुष्य के मन की भूमि को साफ करना है, ताकि उस पर प्रेम के और सौंदर्य के फूलों की खेती हो सके।
यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है। यदि शिक्षक इसे पूरा कर सकेगा तो ही एक नये मनुष्य का और एक नई मनुष्यता का जन्म हो सकता है।