Patanjali Yog-Sutra, Bhag 4 (पतंजलि योग-सूत्र, भाग चार)

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मुक्ति की कला क्या है? मुक्ति की कला और कुछ नहीं बल्कि सम्मोहन से बाहर आने की कला है; मन की इस सम्मोहित अवस्था का परित्याग कैसे किया जाए; संस्कारों से मुक्त कैसे हुआ जाए; वास्तविकता की ओर बिना किसी ऐसी धरणा के जो वास्तविकता और तुम्हारे मध्य अवरोध् बन सकती है, कैसे देखा जाए; आंखों में कोई इच्छा लिए बिना कैसे बस देखा जाए, किसी प्रेरणा के बिना कैसे बस हुआ जाए। यही तो है जिसके बारे में योग है। तभी अचानक जो तुम्हारे भीतर है और जो तुम्हारे भीतर सदैव आरंभ से ही विद्यमान है, प्रकट हो जाता है।
translated from
English: Yoga: The Alpha and the Omega, Vol 7 and Yoga: The Alpha and the Omega, Vol 8
notes
The fourth of five volumes of twenty discourses each on Patanjali's Yoga Sutras. Other Hindi volumes in this series can be found at Patanjali Yoga-Sutra (पतंजलि योग-सूत्र). Diamond has published all five volumes; it is not known whether this volume was published prior to that by Rebel.
time period of Osho's original talks/writings
Jan 1, 1976 to Jan 10, 1976 and Apr 11, 1976 to Apr 20, 1976 : timeline
number of discourses/chapters
20


editions

Patanj-4D.jpg

Patanjali Yog-Sutra, Bhag 4 (पतंजलि योग-सूत्र, भाग चार)

बुलाते हैं फिर तुम्हे (Bulate Hain Phir Tumhe)

Year of publication : 2012
Publisher : Diamond Books
ISBN 9788184191349 (click ISBN to buy online)
Number of pages : 470
Hardcover / Paperback / Ebook : P
Edition notes :