Talk:Ishavashya Upanishad (ईशावास्य उपनिषद)

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Venue was corrected for this camp. According to Neeten's Osho Source Book (Bombay section), the "Bikaner Palace Hotel" was not used until later camps. And this name is also a small misnomer. If you search for the hotel, it is actually the "Palace Hotel, Bikaner House", where "Bikaner House" is used only optionally. -- doofus-9 17:14, 22 February 2017 (UTC)

An audiobook TOC from Osho World. How well it aligns with book titles is not known:

1. वह पूर्ण है
2. वह परम भोग है
3. वह निमित्त है
4. वह अतिक्रमण है
5. वह समत्व है
6. वह स्वयंभू है
7. वह अव्याख्य है
8. वह चैतन्य है
9. वह ज्योतिर्मय है
10. वह ब्रह्म है
11. वह शून्य है
12. असतो मा सद्गमय
13. ओम् शांतिः शांतिः शांतिः

In an extensive correspondence, Sw Shailendra Saraswati has looked into the compliance of audio with the book. This turns out to be correct: hearing from the instructions for meditation, the order of the dates/am/pm is correct.

Shailendra has added the following note about the text of the book:

The following part is missing at the end of second chapter in the Book:
सक्रिय ध्यान का प्रयोग कराने के बाद ओशो ने समझाया-
अब उठ आएं और अपनी अपनी जगह शांति से बैठ जाएं। दो बातें आपसे दोपहर के मौन के लिए कह दूं। अपनी जगह शांति से बैठ जाएं। बैठ जाएं अपनी-अपनी जगह शांति से। बैठ जाएं, अपनी जगह बैठ जाएं।
इसके बाद की बैठक दोपहर में होगी, साढ़े-तीन से साढ़े-चार। साढ़े-तीन से साढ़े-चार मौन बैठक है। मैं आपके बीच में मौन चुपचाप बैठा रहूंगा। आप भी मौन में आकर चुपचाप बैठ जाएंगे।
दोपहर की बैठक तक जितनी ज्यादा आंख बंद रख सकें, कान बंद रख सकें, बंद रखें। जितने मौन और चुप रह सकें, मौन और चुप रहें। ज्यादा समय बंद आंख बिताएं। तो दोपहर के मौन में बहुत गति बढ़ जाएगी। जितनी गति अभी हुई, दोपहर के मौन में उससे भी ज्यादा गति हो जाएगी।
दोपहर के मौन में तो सिर्फ मेरे पास घंटे भर बैठे रहना है- मौन। नाचने का मन हो मौन में तो नाचें, हंसने का मन हो हंसें, रोने का मन हो रोएं, डोलने का मन हो डोलें, कूदने का मन हो कूदें; लेकिन अपनी जगह चुपचाप। दोपहर को मैं बोलूंगा नहीं, सिर्फ आपके पास :::चुपचाप बैठा रहूंगा। मेरे पास कोई नहीं आएगा, अपनी जगह ही बैठकर चुपचाप। अपनी आंख पर पट्टी रखें, कान बंद रखें, चुपचाप बैठे रहें।
सुबह की बैठक हमारी पूरी हुई।यहां से जाएंगे तो भी आंख की पट्टी थोड़ी सी ऊपर कर लें, ताकि थोड़ा सा आपको नीचे दिखाई दे। कम से कम आंख का उपयोग करना पड़े। इस तरह जाएं। इसी तरह बाकी काम करें। इसी तरह दोपहर को आएं तब भी पट्टी थोड़ी सी ऊपर उठाकर आएं।
पट्टी ज्यादातर बांधे ही रखें। जब भी फुरसत मिले, पट्टी बांधकर रखें। प्रभु का स्मरण करें और शांत बैठें।
सुबह की बैठक हमारी पूरी हुई।
English summary:
After conducting dynamic mediation, Osho is giving instructions for the silent sitting in afternoon from 3.30 to 4.30. Everybody will be in silence, closing ears with cotton, and using blind folds. I will not talk, I will remain present there in silence. You may dance, jump, laugh and cry if you wish, but remain silent. Don't come close to me, remain seated at your own place.
Ears and eyes should be used as minmum as possible during the activities in whole day. Whenever you find time Remember God and be silent.

One peculiar thing is the order of the sutras. (See for the Ishavasya Upanishad on-line e.g. here or here.) My conclusion is that in discourse #9 Osho talks about sutras 15 and 16, and in discourse #10 he talks about sutra 14. See Osho Timeline 1971.

(In the English translation, The Heartbeat of the Absolute, the order of the chapters has been changed to comply with the order of the Ishavasya Upanishad sutras, see that talk page.)

--Sugit (talk) 05:29, 14 June 2018 (UTC)


Changed first edition. Now first edition of this series is Ishavasyopanishad (ईशावास्योपनिषद), which published in the same year as talks were been.

Because of this change of the first edition from "Ishavashya Upanishad" to "Ishavasyopanishad" we should change event title also. Do you agree?--DhyanAntar 07:51, 19 February 2019 (UTC)


Yes, seems correct to me. --Sugit (talk) 10:45, 19 February 2019 (UTC)


It is ready.--DhyanAntar 11:38, 19 February 2019 (UTC)